रविवार, 21 दिसंबर 2025

सोमनाथ मंदिर : वह मंदिर जिस पर 17 बार आक्रमण हुआ।

 आज हम जिस मंदिर के विषय में बात करने वाले हैं वह मंदिर  प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। यह मंदिर प्राचीन काल में अपने ऊपर हुए अनेक आक्रमणों से कई बार ध्वस्त हुआ, परंतु फिर भी कई बार पुनर्निर्माण होकर आज भी अपने अस्तित्व में है। साथ ही इस मंदिर का निर्माण हर युग में हुआ और हर युग में इसका नाम भी बदलता रहता है। यह मंदिर है सोमनाथ का मंदिर। 


सोमनाथ मंदिर
सोमनाथ मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में बेरावल बंदरगाह में स्थित भगवान शिवजी का एक प्रमुख ज्योतिर्लिंग है। यह शिवजी के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है। यह हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्थल है। यह मंदिर कपिला, हिरण्या और सरस्वती नदियों के त्रिवेणी संगम पर है। इस मंदिर पर विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा कई बार आक्रमण करके इसे धस्त किया गया, परंतु इस मंदिर को भारतीयों द्वारा फिर से कई बार पुनर्निर्माण कर लिया गया। ऐसा मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण हर युग में किया गया है। शास्त्रों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण स्वयं चंद्र देव ने किया था। साथ ही श्रीकृष्ण ने इसी स्थान पर अपना देह त्याग किया था और यह एक ऐसा स्थान है जहां भगवान शिव जी प्रकाश के एक उग्र स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे।

सोमनाथ मंदिर की पौराणिक कथा

शास्त्रों‌ के अनुसार, सतयुग में दक्ष प्रजापति नामक एक महान और तेजस्वी राजा थे। उनकी 27 सुंदर पुत्रियां थीं। उन्होंने 27 नक्षत्रों के नाम पर उनका नाम रखा था। वे चाहते थे कि उनकी सभी पुत्रियां प्रसन्न रहें। इसलिए वे अपने सभी पुत्रियों का विवाह चंद्रदेव से करवा देते हैं। चंद्र देव बहुत ही सुंदर और आकर्षक थे। उनके तेज से पूरा आकाश अलौकिक हो जाता था। विवाह के बाद चंद्र देव सभी के साथ रहने लगते हैं, परंतु उनका ध्यान केवल उनकी एक ही पत्नी रोहिणी पर ही केंद्रित होता है। वे रोहिणी को ही सबसे प्रिय मानते हैं। जैसे-जैसे समय बीतने लगता है, चंद्र देव अपने बाकी सभी 26 पत्नियों का उपेक्षा करने लगते हैं। वे केवल रोहिणी को ही अपना समय देते हैं। इससे उनकी अन्य सभी पत्नियां उनसे दुखी हो जाती हैं। वे सभी अपने पिता दक्ष प्रजापति के पास जाती हैं और चंद्रदेव का उनके प्रति अनुचित व्यवहार के विषय में शिकायत करती हैं। दक्ष प्रजापति चंद्र देव को समझने का प्रयास करते हैं, परंतु उनमें कोई भी परिवर्तन न होने के कारण वे क्रोधित हो जाते हैं। वे चंद्र देव को श्राप दे देते हैं कि उनका तेज धीरे-धीरे क्षीण होकर निस्तेज हो जाएगा और वे कुरूप हो जाएंगे। इस श्राप के कारण चंद्र देव की आभा मुरझाकर शरीर दुर्बल हो जाता है और उनका सौंदर्य लुप्त होने लगता है। इससे समुद्र की लहरें, औषधियों की शक्ति और नक्षत्र की चाल प्रभावित होने लगता है। इससे चंद्र देव चिंतित होकर ब्रह्मा देव जी के पास मार्गदर्शन के लिए जाते हैं। ब्रह्मा देव जी उन्हें प्रभास तीर्थ के तट पर जाकर शिवजी का तपस्या करने को कहते हैं। प्रभास तीर्थ को ही आज सोमनाथ के नाम से जाना जाता है। चंद्र देव प्रभास तीर्थ के तट पर जाकर शिवलिंग स्थापित करके कठोर तपस्या में लीन हो जाते हैं। उनके कठोर तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी उन्हें दर्शन देते हैं। शिवजी उन्हें श्राप से मुक्त होने का वरदान तो देते हैं, परंतु श्राप कठोर होने के कारण वे उनसे कहते हैं कि उनका तेज महीने में 15 दिन घटेगा और 15 दिन बढ़ेगा। शिवजी के इसी वरदान के कारण ही हम चंद्रमा को कृष्ण पक्ष में घटते और शुक्ल पक्ष में बढ़ते हुए देखते हैं। चंद्र देव शिवजी से एक और वरदान मांगते हैं। वे शिवजी को अपने स्थापित किए हुए शिवलिंग में सदेव ही निवास करने के लिए कहते हैं। शिवजी उन्हें यह वरदान भी दे देते हैं। तभी से यह शिवलिंग सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध होता है। चंद्र देव शिव जी के कृपा से सोने से पहला भव्य मंदिर बनाते हैं। यह एक ऐसा मंदिर था जो आगे चलकर भारत का पहला ज्योतिर्लिंग बना और अनगिनत भक्तों के आस्था का केंद्र भी।
          पुराणों के अनुसार, यह मंदिर केवल एक बार नहीं, बल्कि हर युगों में अलग-अलग रूपों में निर्मित हुआ। सतयुग में इसे चंद्रदेव ने सोने से बनाया था। त्रेता युग में शिवजी के परम भक्त रावण ने इसे चांदी से बनाया था और द्वापर युग में स्वयं श्रीकृष्ण इसे चंदन की लकड़ी से बनाया था।

सोमनाथ मंदिर का इतिहास 

इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन मंदिर का समय 649 ई पूर्व से पता लगाया जाता है। परंतु ऐसा माना जाता है कि यह उससे भी ज्यादा पुराना है। सातवीं सदी में दूसरी बार 'वल्लभी' के मैत्रक राजाओं ने इसका निर्माण किया था। आठवीं सदी में अरबी गवर्नर जुनायद इसे नष्ट करवाया था। फिर उसी सदी में  गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ई में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण कराया।                                                                    अरब यात्री अल बरूनी अपनी पुस्तक 'तारीख ए हिंद' में इस मंदिर के बारे में उल्लेख करता है। इस पुस्तक से प्रभावित होकर अफगानिस्तान के क्रूर शासक महमूद गजनवी 1026 ई में अपने सैनिकों के साथ सोमनाथ मंदिर में आक्रमण करता है। उस समय वहां मंदिर की रक्षा के लिए हजारों हिंदू योद्धा खड़े होते हैं। वे सभी योध्दा मंदिर की रक्षा के लिए पूरा डटकर युद्ध करते हैं, परंतु गजनवी की सेना उन पर भारी पड़ जाती है और युद्ध में 50000 से ज्यादा हिंदू रक्षक मारे जाते हैं। इसके बाद महमूद गजनवी गर्भगृह में पहुंच जाता है। जब वह अपने सैनिकों के साथ गर्भगृह में पहुंचता है, तो सभी सैनिक चिल्लाने लगते हैं। वे सभी देखते हैं कि एक सफेद शिवलिंग बिना किसी सहारे के हवा में उड़ रहा है। तब एक सैनिक अपने मियान से तलवार निकलता है, तो वह छत से चिपक जाता है। उन्हें पता चलता है कि मंदिर का गुंबद चुंबकीय पत्थरों से और शिवलिंग लोहे का बना हुआ था। इसी कारण शिवलिंग हवा में संतुलित रहता था। यह प्राचीन भारत के विज्ञान और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण था। महमूद गजनवी चुंबकीय गुंबद को तोड़कर हटाने का आदेश देता है। जैसे ही उसके सैनिक गुंबद के पत्थरों को तोड़ना शुरू करते हैं वैसे ही मंदिर का संतुलन बिगड़ जाता है। अंत में हवा में उड़ने वाला पवित्र शिवलिंग ज़मीन पर गिर जाता है। मंदिर के पुजारी महमूद गजनवी से शिवलिंग को न तोड़ने के लिए प्राथना करते हैं। वे उससे मंदिर की सारी संपत्ति ले जाने के लिए कहते हैं और शिवलिंग को न तोड़ने के लिए। परंतु गजनवी पुजारियों का बात नहीं मानता है और शिवलिंग को तोड़ देता है। गजनवी कुछ टुकड़ा अपने जमा मस्जिद के सीढ़ियों पर लगवा देता है ताकि हर नवाजी के पांव से हिंदू आस्था को रौंदा जा सके। वह कुछ टुकड़ों को मक्का और मदीना भिजवा कर वहां मस्जिदों के फर्श पर दफनवा देता है। कुछ टुकड़ों को ब्राह्मण पुजारियों द्वारा छिपा लिया जाता है। उनका यह मानना था कि वो टुकड़े नहीं बल्कि सनातन धर्म की आत्मा है। गजनवी अपने साथ लगभग 1 लाख स्त्रियों और बच्चों को बंधक बनाकर गजनी ले जाता है और वहां उन्हें गुलाम बाजारों में जानवरों की तरह बेचता है। साथ ही वह अपने साथ सैकड़ों करोड़ों की कीमती खजानों और संपत्तियों को लूटकर गजनी ले जाता है। 
          13वीं शताब्दी के प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता और साहित्यकार जकरिया अल काजिनी ने सोमनाथ मंदिर के विषय में लिखा है कि मंदिर के अंदर गर्भगृह के बीचों-बीच एक विशाल पत्थर था जो बिना किसी सहारे के हवा में लटक रहा था। न ही उसके ऊपर कोई रस्सी थी, न ही नीचे कोई आधार था। वह बिना किसी स्पष्ट कारण के हवा में स्थिर था जो सभी के लिए आश्चर्य का विषय था।
           कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार शिवलिंग में एक और विशेष तत्व उपस्थित था जिसे श्यामंतक मणि कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार इसे स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने शिवलिंग के भीतर स्थापित किया था। ऐसा कहा जाता है कि यह मणि हर दिन 77 किलो सोना उत्पन्न करती थी। इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया था।
            महमूद गजनवी के बाद 1299 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी अपने मंत्री उलूग खान को मंदिर पर आक्रमण करने के लिए भेजता है। उस समय सौराष्ट्र के 16 वर्षीय हमीरजी गोहिल अपने भील साथियों के साथ मंदिर का मोर्चा संभालते हैं। हमीर जी और उनके साथी लगभग 9 दिन तक युद्ध लड़ते हैं, परंतु धीरे-धीरे उनके सारे साथी मारे जाते हैं। हमीरजी का सर लड़ते-लड़ते धड़ से अलग हो जाता है, परंतु वे फिर भी कुछ समय तक शत्रुओं से लड़ते रहे। यह दृश्य देखकर उनके शत्रु भी उनसे डर जाते हैं। अंत में मुस्लिम सेना मंदिर में कब्जा करने में सफल हो जाती है और हमीरजी शहीद हो जाते हैं। उनका बलिदान मंदिर को बचा तो नहीं सका, परंतु उनका बलिदान आज भी अमर है। सोमनाथ मंदिर में आज भी उनके सम्मान में एक परंपरा निभाई जाती है। मंदिर के शिखर में लगने वाली धर्म ध्वजा पहले हमीरजी के स्मारक से स्पर्श कराया जाता है और फिर मंदिर के ऊपर लहराया जाता है।
          मंदिर को ध्वस्त करने का सिलसिला यहीं नहीं रुकता है। आगे इसे और भी कई आक्रमणकारी लूटकर तोड़ने का प्रयास करते हैं। 1326 ईस्वी में मोहम्मद बिन तुगलक बचे हुए संरचना को ध्वस्त करता है ।                                                         1395 ईस्वी में गुजरात का अंतिम गवर्नर जफर खान(मुजफ्फर शाह प्रथम) मंदिर को लूट कर ध्वस्त करता है।
           1451 ई में गुजरात का सुल्तान महमूद बेगड़ा मंदिर पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त करता है
            फिर अंत में 1665 ई और 1706 ई में औरंगज़ेब मंदिर को बुरी तरह से लूटकर उसे तोड़ देता है और वहां मस्जिद बनाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर पर कुल 17 बार आक्रमण हुआ।
             कई सालों बाद जब अहिल्याबाई होलकर सोमनाथ पहुंचती है, तो वे मंदिर की दुर्दशा देखकर बहुत ही दुखी हो जाती है। उन्हें विश्वास नहीं होता है कि वह प्राचीन सोमनाथ मंदिर है। अहिल्याबाई मूल मंदिर से कुछ दूरी पर महादेव का एक नया सोमनाथ मंदिर बनवाती है। इस छोटे मंदिर में वे नियमित पूजा अर्चना करवाती है।

आज के मंदिर का निर्माण

भारत के स्वतंत्र होने के बाद इस मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभाई पटेल लेते हैं। 12 नवंबर 1947 को सरदार पटेल जूनागढ़ पहुंचते हैं। वे वहां पहुंचकर एक बड़ी जनसभा में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का घोषणा करते हैं। लेकिन इसका निर्णय लेना सरदार पटेल के लिए भी आसान नहीं था। राष्ट्रीय स्वतंत्र हो चुका था, परंतु कुछ लोगों का मानना था कि मंदिर का पुनर्निर्माण भारत की धर्मनिरपेक्षता की छवि को ठेस पहुंचा सकता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में सरकारी खर्चे से मंदिर के पुनर्निर्माण करने की बात होती है, परंतु इस बात की जानकारी पंडित नेहरू को होने पर वे नाराज हो जाते हैं। वे कन्हैया लाल को निर्देश देते हैं कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य अपने राजकोष से अपने ऐतिहासिक प्रतिशोध के लिए इस कार्य को फंड नहीं दे सकता है। गांधीजी कहते हैं कि मंदिर का निर्माण सरकारी खर्चे से नहीं, बल्कि लोगों से धन एकत्रित करके किया जाएगा। सरदार पटेल गांधी जी की इस सलाह को स्वीकार कर लेते हैं ताकि धर्मनिरपेक्ष सरकार पर कोई प्रत्यक्ष बोझ न पड़े। 1949 में कन्हैया लाल की उपस्थिति में श्री सोमनाथ ट्रस्ट का स्थापना होता है और मंदिर निर्माण का जिम्मेदारी इसी ट्रस्ट को सौंपा जाता है। जब 1950 में सरदार पटेल का निधन हो जाता है, तब नव निर्मित सोमनाथ मंदिर में देवता के प्राण प्रतिष्ठा का समय आता है। कन्हैयालाल मुंशी भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद से संपर्क करके उनसे अनुरोध करते हैं कि वह इस ऐतिहासिक समारोह में सम्मिलित हो। डॉ राजेंद्र प्रसाद उनका यह आमंत्रण प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करते हैं। जब प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को इस बात की जानकारी होती है, तो वे इस पर आपत्ति जताते हैं। इन सबके बावजूद 11 में 1951 को डॉ राजेंद्र प्रसाद विधिवत रूप से 'सोमनाथ जतिर्लिंग' का प्राण प्रतिष्ठा करते हैं।

सोमनाथ मंदिर के रहस्य 

बाण स्तंभ - सोमनाथ मंदिर में एक बाण स्तंभ है। यह बहुत ही प्राचीन माना जाता है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस स्तंभ का उल्लेख 6 वीं शताब्दी है, परंतु इसका कोई प्रमाण नहीं है कि इसका निर्माण कब हुआ था और इसका निर्माण किसने किया था। जानकारों के अनुसार बाण स्तंभ एक दिशा दर्शक है। इसके ऊपरी हिस्से पर एक तीर है जिसका मुख समुद्र की ओर है। इस स्तंभ में एक बात लिखा हुआ है 'आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग'। इसका हिंदी में अर्थ यह है कि सोमनाथ मंदिर के इस बिंदु से लेकर दक्षिण ध्रुव तक एक सीधी रेखा खींचने पर एक भी पहाड़ या भूखंड का टुकड़ा नहीं है। यहां 100% सही है। प्राचीन भारत में हमारे पूर्वजों ने बिना किसी विकसित तकनीक के यह बात कैसे इतना सटीक कहा, एक अद्भुत और आश्चर्यजनक है।


मंदिर के नीचे छिपी इमारत - इस मंदिर के विषय में कोई नहीं जानता है कि इसका निर्माण कब हुआ। 2020 में इस मंदिर के नीचे आज के आधुनिक तकनीक द्वारा मंदिर के जमीन के नीचे से कुछ ऐसा पता लगाया गया जिसे देखकर सभी दंग रह गए। खोजकर्ताओं को पता चला कि मंदिर के नीचे तीन मंजिला इमारत है जिसकी इमारत की पहली गहराई ढाई मीटर, दूसरी गहराई 5 मी और तीसरी मंजिल की गहराई 7 मीटर है और इस बड़े मंदिर का डिजाइन L अकार में बना हुआ है। इस खोज से सभी दंग रह गए कि आखिर यह इमारत किसने बनाई होगी। 

मंदिर का नाम बदलना - स्कंद पुराण के अनुसार जब दुनिया का पुनर्निर्माण होगा तब सोमनाथ मंदिर का नाम बदल जाएगा। सतयुग में इसे सोमनाथ कहा गया, त्रेता युग में प्राणनाथ, और द्वापर युग में भैरवनाथ और कलयुग में फिर से इसे सोमनाथ कहा गया। पुराणों के अनुसार इसे भविष्य में प्राणनाथ कहा जाएगा।

मंदिर के पास उपस्थित नदी - इस मंदिर के पास गोमती नदी है। सूर्यास्त होते ही इस मंदिर का जलस्तर अचानक घटने लगता है। सुबह के समय करीब 1 से 2 फिट रहता है, परंतु सूर्योदय होने पर अचानक ही नदी का जलस्तर बढ़ने लगता है। 

मंदिर के पास उपस्थित अरब सागर - हजारों वर्षों से सोमनाथ मंदिर अरब सागर के पास है, परंतु कभी भी इस सागर ने मंदिर को कोई क्षति नहीं पहुंचाया। अनेकों तूफान आने पर भी यह मंदिर अपनी जगह पर अडिग रहा। यहां जब भी कोई तूफान आता है, तो समुद्र का जल मंदिर के पास आकर थम जाता है। लोग इसे शिवजी के रक्षा का चमत्कार मानते हैं।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

बेंजामिन नेतनयाहू: फिलिस्तीन के सबसे बड़े दुश्मन जिसने अपने कंधे पर अपने राष्ट्र के लिए गोली खाई और अपने देश के लिए सबसे लंबे समय तक राष्ट्रपति बने

 यह कहानी है उस व्यक्ति की जो फिलिस्तीन का सबसे बड़ा कट्टर दुश्मन माना जाता है, उसने न सिर्फ अपने राष्ट्र के लिए गोली खाई बल्कि देश के लिए कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनों में हिस्सा लिया और अपने राष्ट्र का सबसे लंबे समय तक के प्रधानमंत्री बने। यह कहानी है भारत के सबसे अच्छे मित्र इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू की।

                    प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू 

बेंजामिन नेतन्याहू का जन्म 21 अक्टूबर 1949 को तेल अवीव, इजराइल में हुआ था। वह एक इसराइली प्रधानमंत्री और एक राजनायिक हैं। उन्हें बचपन में 'बीबी' बुलाया जाता था। उनके पिता का नाम बेंजियन नेतनयाहू था जो एक इतिहासकार थे और यहूदियों के इतिहास के बारे में लिखते थे। उनकी माता का नाम त्ज़िला सेगल था।

उनका बचपन कुछ समय पश्चिमी जेरूसेलम और फिर संयुक्त राज्य अमेरिका में बीता। वह शेल्टनहम हाई स्कूल से ग्रेजुएट हुए। वह 1967 में इसराइल वापस आकर इजरायली डिफेंस फोर्स में शामिल हो जाते हैं।

उन्होंने 1967 से लेकर 1972 तक आर्मी में अपनी सेवा दी। युद्ध के दौरान उन्हें गोली भी लगी।इसके बाद वह 1972 में आर्किटेक्चर की पढ़ाई के लिए MIT , संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए। फिर वह 1973 के योम कीपर युद्ध में अपनी सेवा देने के लिए वापस इसराइल आ गए। अपनी सेवा देने के बाद वह वापस अमेरिका गए और बेन नीते के नाम से आर्किटेक्चर में बैचलर की डिग्री1975 में पुरी की। फिर उन्होंने 1976 में MIT स्लोन स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट अपनी मास्टर डिग्री पुरी की। 1976 में एक ऑपरेशन के दौरान उनके बड़े भाई योनातन नेतन्याहू की मृत्यु हो जाती है, वह भी इजरायली आर्मी में शामिल थे। इसका बेंजामिन नेतन्याहू पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने 1976 से 1978 तक बोस्टन कंसलटिंग ग्रुप में इकोनामिक कंसल्टेंट के रूप में काम किया। इसके बाद वह सब कुछ छोड़ के 1978 में इसराइल वापस आ गए। उन्होंने 1978 से 1980 के बीच जोनाथन नेतन्याहू एंटी टेरर संस्था को चलाया। वह 1984 से 1988 तक यूनाइटेड नेशंस के लिए इजरायली एंबेसडर के रूप में कार्यरत थे। वह 1988 में भी शामिल हए और लिकुड पार्टी को ज्वाइन किया। उन्हें शुरू में डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर बनाया गया। उन्हें लिकुड पार्टी की ओर से 1996 के इजरायली लेजिसलेटिव इलेक्शन में प्रधानमंत्री के पद के लिए दावेदार बनाया गया। वह चुनाव जीते और इजराइल के प्रधानमंत्री बन गए। प्रधानमंत्री नेतन्याहू 1997 में मोसाद को हमास लीडर खालिद मशाल को मारने का अधिकार दे दिया। वहां 1999 में इलेक्शन चुनाव हार गए और कुछ समय के लिए उन्होंने राजनीति छोड़ दिया। वह वर्ष 2000 में  राजनीति में वापस आ गए। उन्हें वर्ष 2002 में उस समय के प्रधानमंत्री एरियल शेरान द्वारा विदेश मंत्रालय के पद के लिए नियुक्त किया गया।
              पूर्व इजराइली प्रधानमंत्री एरियल शेलोन
फिर 2003 में विदेश मंत्रालय का पद को सेल्वन शेलोम को और बेंजामिन नेतन्याहू को वित्त मंत्री का पद दिया गया।
               पूर्व इजरायली विदेश मंत्री सेल्वन शेलोम
उन्होंने इस पद को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार किया। 2007 में उन्हें लिकुड पार्टी का चेयरमैन और प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदार बनाया गया। उन्होंने 2009 के चुनाव को जीता और 2009 से 2021 तक वह दूसरी बार इजराइल के प्रधानमंत्री बने। फिर वह 2022 से अभी तक तीसरी बार इसराइल के प्रधानमंत्री हैं। तो यह थी इसराइल के वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हो की कहानी।

एपीजे अब्दुल कलाम: एक साधारण लड़के की अखबार बेचने से लेकर भारत को मिसाइल तकनीकी के क्षेत्र में मजबूत बनाने और देश का प्रथम नागरिक बनने तक की यात्रा

 यह कहानी है उस एक सधारण लड़के की जिसने कभी अपना घर चलाने के लिए बचपन में अखबार बांटा, रात दिन कई वर्षों तक अपने कठोर परिश्रम से भारत को मिसाइल तकनीकी के क्षेत्र में शक्तिशाली बनाया और देश का प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति बने। हम जिसके विषय में  बताने जा रहे हैं देश के मिसाइल मैन के नाम से जाना जाने वाले हमारे देश के 11वें राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम।

APJ Abdul Kalam

डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम, तमिलनाडु में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनका पुरा नाम अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम था। उनके पिता का नाम जैनुलाब्दीन मराकायार एक नाविक थे और माता का नाम आशियम्मा एक गृहणी थी। कलाम का परिवार आर्थिक रूप से बहुत ही गरीब था। उनके पिता का एक छोटा सा नाव था जिसे वह मछुआरों को किराए पर दते थे और तीर्थ यात्रियों को अपने नाव से सैर कराते थे। उनके पिता बहुत ही अनुशासित व्यक्ति थे और वह स्थानीय मस्जिद के इमाम भी थे। उनकी बातों में गहरी आध्यात्मिकता थी। कलाम के मन में उनके अपने पिता के बातों का बहुत प्रभाव पड़ता था। बचपन उन्हीं के बातों को सुनकर उनके मन में विज्ञान और अध्यात्म की जड़ें जमने लगी। उनका घर एक संयुक्त परिवार वाला था जिसमें अनेक सदस्य थे। उनकी माता बहुत ही दयालु स्वभाव की थी।

उनके घर में गरीबी होने के बावजूद खाने वालों की तादाद ज्यादा होती थी। उनके घर में मेहमान नवाजी बहुत ही अच्छे से होती थी। कोई भी उनके घर से भूखा नहीं जाता था। उनकी माता का कहना था कि खाना हमेशा बांटने ही बढ़ता है। उनकी माता की यही करुणा और सादगी कलाम के भीतर नींव बनी। कलाम सुबह 4:00 उठकर गणित का ट्यूशन पढ़ने के लिए जाते । यह ट्यूशन उसे मुफ्त में मिलती थी। इसके बाद वह अपना घर चलाने के लिए रामेश्वरम रोड जाकर वहां से अखबार का ढेर उठाकर बांटने जाते थे। यह काम करते हुए वह पसीने से भीग जाते थे परंतु उनके चेहरे पर एक मुस्कान होती थी। यही से उन्होंने आत्मनिर्भरता का पाठ सिख लिया। काम छोटा हो या बड़ा वह उसे पूरे दिल से करते थे। कलाम के जीवन को आकार देने में उनके शिक्षकों का भी बहुत बड़ा योगदान था।
विशेषकर श्री शिवा सुब्रह्मण्या अय्यर जो कलाम को केवल अपना शिष्य ही नहीं बल्कि उसे भविष्य का सितारा मानते थे। एक बार उन्होंने उसे अपने घर खाना खाने के लिए बुलाया तो उनकी पत्नी ने उसे खाना खिलाने से मना कर दिया क्योंकि कलाम एक मुस्लिम परिवार से थे। इससे अय्यर गुस्सा हो जाते हैं और कलाम को अपने हाथों से खाना खिलाते हैं। उसके अगले हफ्ते अय्यर की पत्नी ने कलाम को अपने रसोई में बुलाकर बैठाया और उसे खाना खिलाया। यह घटना कलाम के मन में हमेशा लिए बैठ गया और उन्होंने यह सीख लिया की कि अगर किसी का इरादा पक्का हो वह समाज की दीवारें ढह सकता है।
उन्हें आसमान का सपना हमेशा अपनी ओर खींचना था। वह समुद्र किनारे घंटे बैठकर पक्षियों को दखते और कहते एक दिन मैं भी इनके जैसा उड़ुगा। यह उनके भीतर एक जुनून था। यही सपना उनके भीतर दिशा तय करती है। भौतिक और गणित उनका सबसे पसंदीदा विषय था। वह जानते थे की यही विषय उनके उड़ान का सपना पुरा कर सकता है। उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि उनकी मंजिल जमीन नहीं आसमान है । थोड़े बड़े होने पर 1950 में जब वह 19 वर्ष के हुए तो उनका सपना उन्हें समुद्र से उठाकर आसमान की ओर ले जा रहा था। सेंट जोसेफ कॉलेज से भौतिक का पढ़ाई करने के बाद उन्होंने मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी MIT मैं दाखिला लेने का सोचा।

यह उनके लिए आसान नहीं था। उनके परिवार के पास उन्हें दाखिला दिलाने के लिए पैसे नहीं थे। उनकी बड़ी बहन ने कलाम की पढ़ाई करने की तीव्र इच्छा को देखकर अपने सोने की चूड़ियां और हार गिरवी रख दिया और उन पैसों से कलम को पढ़ने के लिए कहा। उन्होंने उसे कहा- तुम्हारा सपना मेरा सपना है। उनकी आवाज में प्रेम और प्रेम की गहराई थी। उनके बहन का यह बलिदान कलाम के कंधों पर एक भारी जिम्मेदारी डाल देते हैं। कलम ठान लेते है कि वह अपने बहन का कर्ज जरुर चुकाएंगे। इसके बाद वह MIT में एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में दाखिला ले लेते हैं। यह विषय उनके बचपन का फाइटर पायलट बनने का सपना पूरा करने का था।MIT में उनका प्रतिभा चमक उठा और अपने परिश्रम और लगन से सभी को प्रभावित किया। एक बार कलाम के एक प्रोजेक्ट को उनके प्रोसेसर ने अधूरा बता दिया और कठोरता भरे वचनों  से उसे 3 दिन में पूरा करने को कहा। उस रात उन्होंने न खाना खाया और न सोया। वह 72 घंटे तक अपने ड्राइंग बोर्ड के सामने डटे रहे। उनकी उंंगलियांं थक गई और आंख लाल हो गई, परंतुु उनका हौसला डगमगाया नहीं। जब तीसरेेेेेेे दिन वह अपना प्रोजेक्ट अपने प्रोफेसर को दिखाने गए, तो दंग रह गए। उनकेे आंखों में आंसु थे। उन्होंनेे उससे कहा-कलाम मैंं यह जानता था कि तुम यह कर लोगे और उसेे गले लगा लिया। कलाम को यह एहसास हो गया कि मेहनत और लगन से कोई भी मंजिल संभव है। 1958 को MIT सेे अपनी इंजीनियरिंग पूरी करनेेे के बाद वह पल आ ही गया जिसका कलाम को बेसब्री से इंतज़ार था।उन्हें दो इंटरव्यू केेे लिए बुलावा आया। एक था दिल्ली रक्षा मंत्रालय केे तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय से और दूसरा भारतीय वायु सेना देहरादून से। वह एक फाइटर पायलट बनना चाहतेे थे इसलिए उन्होंने देहरादून को चुना। जब इटरव्यू का दिन आया , तो 8 की आवश्यकता थी और 25 उम्मीदवार थे। उन्होंनेे स्वयं को पूरी तरह झोंक दिया और पूरे आत्मविश्वास से अपना इंटरव्यू दिया। लेकिन जब परिणाम आया तो एक-एक करके 8 नाम पुकारे गए, तोोो उनका नाम 9वें स्थान पर था। वह अपनेे सपने से केवल एक कदम की दूरी पर थे। उनका सपना चूर चूर हो जाता है और पूरी तरह से टूट जातेे हैं। अपनेेे टूटे हुए मन को लेकर शिवानंद आश्रम, ऋषिकेश पहुंचते हैं जहांं वह स्वामी शिवानंद से मिलते हैं। स्वामी शिवानंद उनसेे कहते हैं-यह तुम्हारी नियति नहीं थी, अपनी असफलता को गले लगाओ। उनकेे शब्दों ने कलाम केेे दिल पर मरहम लगानेे का कार्य किया। उन्होंनेेे सोचा शायद आसमान ने मेरेेे लिए दूसरा रास्ता चुना है। उन्होंनेे हार न मानने की ठानी। वह अपनेेे दूसरे इंटरव्यू केेे लिए दिल्ली गए और रक्षा मंत्रालय का नौकरी जॉइन किया। परंतुु यह केवल नौकरी नहींं थी। यह उस यात्रा की शुरुआत थी, जो उन्हें यहां से पोखरण की रेगिस्तान तक लेे जाती है। यह वह नई कहानी की शुरुआत थी जिसनेे भारत को एक नई ताकत दी। रक्षा मंत्रालय में कुछ समय काम करने के बाद उन्हेंं 1979 में अंतरिक्षष कार्यक्रम केेेे जनक डॉ विक्रम साराभाई ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधन संगठन (ISRO) में भेज दिया।
उस समय भारत का अंतरिक्ष सपना अपनी शुरुआती कदम की ओर बढ़ रहा था। केरल की थुंबा में वैज्ञानिकों द्वारा साइकिलों पर रॉकेट के पुर्जे ढोए जा रहे थे, वहां एक नया सूरज उग रहा था। डॉ विक्रम साराभाई ने कलाम की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें भारत के पहले स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल SLV-3 का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बना दिया। यह डॉ कलाम को बहुत बड़ी जिम्मेदारी मिली थी। उन्हें अगले 10 साल के भीतर 40 किलो के रोहिणी नामक सैटेलाइट को पृथ्वी के कक्षा में स्थापित करने का लक्ष्य दिया गया। कलाम और उनके साथी वैज्ञानिकों ने दिन रात एक कर थुंबा और श्रीहरिकोटा में रातें जागकर, पसीना बहाकर असंभव को संभव बनाने की जिद में डुबे रहे। यह केवल एक रॉकेट नहीं था। यह भारत का राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के साथ-साथ भारत का गर्व था। कलाम की अगुवाई में यह भारत का राष्ट्रीय जुनून बन गया था। उनकी आवाज में ऐसा प्रभाव था जो पुरी टीम को एकजुट कर सकती थी। आखिरकार वह दिन आ ही जाता है जब 10 अगस्त 1979 श्रीहरिकोटा के लॉन्च पैड SLV-3 आसमान की ओर खड़ा था। पूरा देश सांसे थामें इस ऐतिहासिक पल का इंतजार कर रहा था। कंट्रोल रूम में सन्नाटा था, परंतु तनाव हवा में तैर रहा था। जैसे ही काउंटडाउन शुरू हुआ लॉन्च से ठीक पहले कंप्यूटर में लाल बत्ती जल गई गई। यह सिस्टम में कुछ गड़बड़ी होने का संकेत था। डायरेक्टर के रूप में अंतिम फैसला उन्हें लेना था। उनके विशेषज्ञों ने उन्हें कहा की कैलकुलेशन सही है और लॉन्च के साथ आगे बढ़ सकते हैं। कलाम ने उन पर भरोसा किया और लॉन्च का बटन दबा दिया। SLV-3 आसमान की ओर आगे बड़ा और कंट्रोल रूम में लोग खुशी से तालियां बजाने लगे। परंतु यह खुशी कुछ ही पल के लिए थी।

दूसरे चरण में वह रोकेट लड़खड़ाया और नियंत्रण खो बैठा। 317 सेकंड बाद वह बंगाल की खाड़ी में गिरकर समा गया। पूरे कंट्रोल रूम में दुख का माहौल छा गया। 10 साल का परिश्रम और लगन सब समुद्र में समा गया। इससेेे कलाम पूरी तरह से निराश होकर टूट जातेे हैं। वह अपनी नज़रें किसी से नहींं मिला पाते हैं और स्वयंं को इसकेेे लिए जिम्मेदार मानते हैं। इसकेे बाद उन्हें दुनिया को जवाब देना था। मीडिया उनका प्रतीक्षा कर रही थी। कलाम समझ नहींं पा रहे थे कि वह क्या कहें। तभी ISRO केे चेयरमेन प्रोफेसर सतीश धवन कलाम के पास आकर उनका कंधा थपथपाते हैं और अपनेे साथ चलने को कहतेे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में धवन माइक केे आगे और कलम उनकेेे पीछे होते हैं। धवन कहते हैं -आज हम असफल हुए हैं, इसकी पुरी जिम्मेदारी मेरी है, मुझे अपनी पूरी टीम पर गर्व है, उनकी मेहनत बेमिसाल है। वह उनसेे वादा करते हैं कि अगले साल हम जरुर सफल होंगे। प्रोफेसर धवन का यह नेतृत्व का पाठ था जो किसी पुस्तक में नहीं पढ़ाया जाता है। उन्होंनेेेेेे असफलता का सरा जिम्मा अपनेेेे ऊपर लेे लिया और अपनी टीम को आलोचना से बचा लिया। इस बात नेे उनके पुरेे टीम में एक नई जान फूंक दी और दुगनी ऊर्जा के साथ फिर सेे काम में जुट गए। इससेे कलाम में भी एक नई ऊर्जा आ गई। ठीक 1 साल बाद 18 जुलाई 198को श्रीहरिकोटा केे उसी लॉन्च पैड पर SLV-3 फिर से तैयार था।

इस बार रोकेट आसमान को छू गया और रोहिणी सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो गया। इसके बाद भारत उन देशों में शामिल हो जाता है जिनके पास अपनी स्वयं की सेटेलाइट लॉन्च करने की ताकत थी। उनके कंट्रोल रूम में खुशी का ठिकाना नहीं था। तालियां, आंसू और गर्व एक साथ उमड़ने लगा। इस बार जब मीडिया आया कलम को आगे कर माइक थमाया और कलाम को कहने लिए कहा। अपने इस घटना का जिक्र करते हुए कलाम ने कई बार कहा है कि मैंने उस दिन नेतृत्व का सबसे बड़ा पाठ सिखा। जब असफलता आती है तो एक सच्चा लीडर उसकी जिम्मेदारी लेता है और जब सफलता मिलती है, तो अपनी सफलता का श्रेय अपनी टीम को देता है। यह सबक के सथ-साथ एक विरासत थी जो धवन ने कलाम को सौंपे थे। SLV-3 की सफलता कलम को देश का नायक बना देता है। इसके बाद कलम का दिल नए सपना के लिए धड़क रहा था। वह भारत को आत्मनिर्भर बनना चाहते थे जो अपनी सुरक्षा के लिए किसी पर भी निर्भर न हो। वह 1982 में ISRO मैं इसरो छोड़कर रक्षा अनुसंधान और विकास(DRDO) में फिर से शामिल हो गए। उस समय भारत मिसाइल तकनीकी के लिए विदेशों पर निर्भर रहता था। पश्चिमी देशों ने मिसाइल तकनीकी जैसे जरूरी चीजें देने से प्रतिबंध लगा दिया था। कलाम ने उसे समय के प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के सामने एक योजना रखी जिसका नाम था-Integrated Guided Missile Development Program (IGMDP)। इसका उद्देश्य भारत को मिसाइल तकनीकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना था।
26 जुलाई 1983 को भारत सरकारने ने इस ऐतिहासिक कार्यक्रम को अपनी मंजूरी दी। IGMDP के तहत एक साथ पांच मिसाइलों को विकसित करने का काम शुरू हुआ। इन पांच मिसाइलों को'भारत का पांच दिव्यास्त्र' कहा गया। इन्हें याद रखने क लिए PATNA एक्रोनीम का उपयोग किया गया। जहां उनके अर्थ कुछ इस प्रकार है- P-पृथ्वी,  A-अग्नि,  T-त्रिशूल, N-नाग और A-आकाश। यह काम आसान नहीं था। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध होने के कारण भारत को रिंग लेज़र, जायरोस्कोप, कंपोजिट राकेट मोटर और माइक्रो नेविगेशन जैसी मुश्किल तकनीकें खुद विकसित करनी पड़ी। यह रक्षा परियोजना के साथ साथ भारत की तकनीकी स्वतंत्रता की घोषणा थी। कलम इस तकनीक संप्रभुत्वा के वास्तुकार बन गया थे। वह अपनी टीम को राष्ट्रीय मिशन के लिए तैयार करते थे। उनकी रात दिन की मेहनत और अनगिनत चुनौतियों के बाद वह दिन आ ही गया 22 मई 1989 को उड़ीसा के तट पर अग्नि मिसाइल लॉन्च के लिए तैयार थी। कंट्रोल रूम में सन्नाटा के साथ सबके मन में यही प्रश्न था इस बार सफलता मिल जाए। ऐसे ही अग्नि मिसाइल आसमान को चीर धरती कांप उठी। यह एक भारत की हुंकार थी दुनिया के कानों तक पहुंची। इस कार्यक्रम के सफलता के बाद उन्हें 'मिसाइल मेन 'कहा गया। फिर 25 जुलाई 2002 को उन्होंने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। यह पहली बार था जब कोई वैज्ञानिक राष्ट्रपति के पद तक पहुंचा। वह अब देशक प्रथम नागरिक थे। उनके लिए यह पद सत्ता का प्रतीक न हीहीं बल्कि सेवा का सबसे बड़ा अवसर था। वह राष्ट्रपति भवन तो गए परंतु अपनी सादगी अपने साथ ले गए। उन्होंने राष्ट्रपति भवन बच्चों, युवाओं और आम लोगों के लिए खोल दिए। उनका मानना था कि भारत का भविष्य इन्हीं के हाथों है। वह एक ऐसे राजा थे जिनके भीतर संत बसा था। राष्ट्रपति के पद से मुक्त होने पर भी वहां रुके नहीं , वह देश विदेश विदेश के विश्वविद्यालयों में जाकर जाकर छात्रों को प्रेरित करते। 27 जुलाई 2015 में वह ऐसे ही कार्यक लिए IIM शिलांग गए। लेक्चर हॉल पूरी तरह से भरा हुआ था‌, सभी छात्र उनका स्वागत थालियों से करते हैं। उन्होंने अपना लेक्चर शुरू ही किया था कि मंच पर ही गिर गये । उन्हें पास के बेतानी अस्पताल ले जाया गया गया। शाम 7:45 में उन्होंने अपनी अंतिम सांसें लीं। उनका जीवन ज्ञान से ही शुरू हुआ और अंत भी ज्ञान देते हुए हुआ। उन्होंने कहा था सपना वह नहीं है जो आप सोते हुए देखते हैं, सपना तो वह है जो आपको सोने नहीं देती। तो यहां थी हमारे मिसाइल मैन भारत के 11 राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की।

सरदार वल्लभभाई पटेल: भारत को एक सूत्र में पिरोनेवाले लोह पुरुष

 आज हम एक ऐसे महान व्यक्ति के विषय में बात करने वाले हैं जिन्होंने हमारे देश को एकजुट किया और हमारे राष्ट्र के अस्तित्व को विश्व में बचा कर रखा।

            15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों ने हमारे देश को आजाद तो किया, परंतु भारत से एक अलग राष्ट्र पाकिस्तान का भी निर्माण करके चले गए। इसके साथ ही भारत 562 अलग-अलग देसी रियासतों में बांटा हुआ था। इन रियासतों को यह विकल्प दिया गया था कि वे चाहे तो भारत में विलय हो जाए या अपना स्वतंत्र राष्ट्र बना लें। इससे सभी राजाओं में अपना स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की मंशा ने जन्म लिया। यह एक बहुत बड़ी समस्या थी और इससे हमारे भारतवर्ष का अस्तित्व खतरे में हो सकता था। इस दौर में भारत के इन 562 देसी रियासतों को एक सूत्र में बांधकर एकीकरण करने का कार्य एक व्यक्ति को दिया गया जिसे उन्होंने बहुत अच्छे से पूरा किया और हमारे राष्ट्र को एक किया। वह महान व्यक्ति हैं लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल। आज हम जानने वाले हैं उनके जीवन के विषय में।

                       सरदार वल्लभभाई पटेल 

        सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1975 में नाडियाड ,गुजरात में हुआ था। उनका पूरा नाम वल्लभभाई झवेरभाई पटेल था। उनके पिता झवेरभाई पटेल एक सच्चे, ईमानदार और सख्त अनुशासन वाले किसान और माता लाडबाई ममता और धार्मिकता की मूर्ति थी। उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव के छोटे स्कूल हुई। वह बचपन से ही आत्मनिर्भर और साहसी लड़के थे। एक बार उनके हाथ में एक फोड़ा हो जाता है। उनका वह फोड़ा पूरी तरह से पस से भरा हुआ होता है। जब डॉक्टर वह फोड़ा देखते हैं तो कहते हैं कि इसे तो गर्म लोहे से फोड़ना होगा। जब डॉक्टर आग से तपी गर्म लोहा लाकर फोड़ने जाता है, तो उसके भी हाथ कांपने लगा जाते हैं। तभी सरदार पटेल उस लोहे को ले लेते हैं और अपने हाथों से उस फोड़े को फोड़ देते हैं। वह पढ़ाई के साथ-साथ खेल में भी बहुत अच्छे थे। 1893 में 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह झवेरबा पटेल से कर दिया गया। कम आयु में विवाह होने के कारण ही उन्होंने 22 वर्ष की आयु दसवीं कक्षा पास किया। वे वकालत का पढ़ाई करना चहते थे, परंतु अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्होंने कानून का पढ़ाई करने से मना कर देते हैं। कुछ समय बाद वे घर छोड़कर अपनी पत्नी के साथ गोधरा चले जाते हैं। 1909 में उनकी पत्नी का कैंसर होने से मृत्यु हो जाती है जिससे उन्हें बहुत ही गहरा धक्का लगता है। सरदार पटेल अपने बैरिस्टर बनने के सपने के लिए कई वर्षों तक अपने परिवार से दूर रहे और पढ़ाई करने के अपने दोस्तों से किताबें उधार लेते। इन सब परेशानियों के बावजूद उन्होंने 36 वर्ष की आयु में Middle Temple Inn of Court,London,England से 36 वर्ष के बैरिस्टर के कोर्स को केवल 30 में पूरा किया। अपना डिग्री प्राप्त करने के बाद वह गोधरा में बैरिस्टर के रूप में प्रैक्टिस करते हैं और जल्द ही उनकी प्रैक्टिस भी पूरी हो जाती है। इसके बाद उन्हें एक बीमारी संक्रमण बीमारी का सामना करना पड़ता है। जब वह इंग्लैंड में कानून की पढ़ाई कर रहे होते हैं, तो उन्हें अंग्रेजी जीवन शैली बहुत प्रभावित करता है। इंग्लैंड से भारत आने के बाद उनका जीवन शैली पूरी तरह बदल जाता है। वे अंग्रेजी में बात करने के साथ-साथ सूट और टाइ पहनना भी शुरू कर देते हैं। उस समय वे अहमदाबाद के प्रसिद्ध वकीलों में से एक बन जाते हैं और आपराधिक मामलों को जीतने के लिए प्रसिद्ध हो जाते हैं।

             सरदार पटेल का शुरू में राजनीति में कोई रुचि नहीं होता है। वे अपने मित्रों के आग्रह करने पर 1917 में नगरपालिका का चुनाव लड़ते हैं और जीत हासिल करते हैं। शुरुआत में सरदार पटेल गांधी जी के विचारों को पसंद नहीं करते हैं, परंतु जब गांधी जी ने नील क्रांति को शुरू किया, तो वे उनसे बहुत प्रभावित हुए।

1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में सूखा पड़ जाता है और  खेती नहीं हो पाती। किसान अंग्रेजों से भारी छूट की मांग करते हैं, परंतु अंग्रेज सरकार उनके मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं होती है। तब वल्लभभाई पटेल किसानों को एकत्रित कर उनका नेतृत्व करते हैं और अहिंसात्मक खेड़ा आंदोलन का  संचालन करते हैं। इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज सरकार को उनके आगे झुकना पड़ा और करो में छूट देना पड़ा। यह वल्लभ भाई पटेल की पहली जन आंदोलन सफलता थी। 1928 में बारडोली में इसी तरह सूखा पड़ता है और अंग्रेज 22% तक कर बढ़ा देते हैं। बारडोली के किसानों को भी सरदार पटेल का सहारा मिलता है। वे इसके आंदोलन का भी सफलतापूर्वक संचालन करते हैं। वे किसानों के साथ मिलकर सत्याग्रह करते हैं। अंग्रेज सरकार को उनके आगे विवश होना पड़ता है और किसनों को करों से मुक्त करना पड़ता है। इस आंदोलन के कारण अंग्रेज सरकार को किसानों हथियाए जमीन और जानवरों को वापस करना पड़ता है। इस आंदोलन से ही वल्लभभाई पटेल को सरदार के नाम से सम्मानित किया जाता है इसके बाद उन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम से जाना जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को शुरू किया, तब सरदार पटेल गांधी जी को संपूर्ण समर्थन करते हैं। वे अपने सभी अंग्रेज शैली के कपड़ों को फेंक देते हैं और खादी के वस्त्रों का प्रयोग करना शुरू कर देते हैं। 1920 में उन्हें गुजरात में कांग्रेस के अध्यक्ष रूप में चुना जाता है। वे 3 बार 1922, 1924 और 1927 में इस पद के लिए चुने जाते हैं और इस पद को 1945 तक संभालते हैं। 1940 के आस-पास भारत में आजादी की गतिविधियां तेजी से बढ़ने लगती है और अन्य क्रांतिकारियों के साथ सरदार वल्लभभाई पटेल को भी कई बार जेल जाना पड़ता है। लेकिन आजादी का संघर्ष चलता रहा और परिणाम स्वरूप 15 अगस्त 1947 में अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ता है। वे आजादी के बाद पहले गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री बनते हैं। उसे समय भारत आजाद तो हो गया था, परंतु समस्याएं कम नहीं थी। भारत अलग-अलग 562 देसी रियासतों में बंटा हुआ था। सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से सभी रियासतें भारत में शामिल हो जाते हैं और भारत को एक सूत्र में पिरोते हैं। वह भारत को एकजुट कर हमारे भारत के अस्तित्व को बचा लेते हैं। 
                हमारे भारत देश को जीवन भर सेवा देने के बाद 15 दिसंबर 1950 को हार्ट अटैक से उनका मृत्यु हो जाता है। आज उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय एकता के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2018 में उन्ही के सम्मान में उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा बनाई जाती है। यह विश्व में सबसे ऊंची मर्ति है। वे आज हमारे देश के सभी लोगों के लिए बहुत बड़े प्रेरणा है।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम‌ की सफलता

 आज की कहानी है हमारे पूरे भारत देश और हमें गौरवान्वित करने वाली और हमें सबसे बड़ी जीत दिलाने वाली भारतीय महिला क्रिकेट टीम की।

अब हमारी भारतीय महिला क्रिकेट टीम ICC Women's World Cup 2025 की फाइनल मैच जीतकर विश्व चैंपियन बन गई है। यह केवल एक जीत नहीं है, बल्कि एक नए युग की शुरुआत है। 2 नवंबर 2025 यह वह तारीख है जब महिला क्रिकेट टीम ने एक इतिहास रच दिया है और अपना एक नया अध्याय का शुरुआत किया है। यह देश के 146 करोड़ लोगों की सोच बदलने वाली जीत है। पूरे 52 वर्षों के लंबे प्रतिक्षा के बाद भारत की बेटियों ने वह कार्य कर दिया है जिसे लोग एक बहुत दूर का सपना मानते थे। अपने संघर्ष, आंसु, हिम्मत की आग और आलोचनाओं से बनी इस टीम ने पहली बार ODI वर्ल्ड कप जीता है। इस जीत के बाद पूरे देश में एक बार फिर से दिवाली मनाया गया। यह जीत केवल भारत की 15 महिला क्रिकेट टीम की नहीं, बल्कि यह हर उस लड़की की जीत है जिसने अपने जीवन में कुछ अलग करने का सब सपना देखा है। साथ ही यह देश के उन 70 करोड़ महिलाओं की भी जीत है जीने लोगों की रूढ़िवादी बातों का भी सामना करना पड़ता है।
           पहली बार महिला क्रिकेट 1973 में इंग्लैंड में खेला गया था और इंग्लैंड ने ही जीता था।
उस समय कुल 7 टीमें शामिल थी और भारत उस समय इसका हिस्सा नहीं था। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार 1978 में भाग लिया था। यह भारत में ही खेला गया था, परंतु दुर्भाग्यपूर्ण भारत एक भी मैच नहीं जीत पाया। इसे ऑस्ट्रेलिया ने जीता था।
              1978 ऑस्ट्रेलिया महिला क्रिकेट टीम 
1982 में भारत ने फिर से भाग लिया और थोड़ा अच्छा प्रदर्शन कर कुछ मैच जीते। यह न्यूजीलैंड में हुआ था। ऑस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को हराकर दूसरी बार अपने नाम जीत को दर्ज किया।
                   1982 ऑस्ट्रेलिया महिला क्रिकेट टीम
1988 में भारत के लिए वर्ल्ड कप फिर से मुश्किल रहा। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ग्रुप स्टेज से ही बाहर हो गई। इसकी मेजबानी ऑस्ट्रेलिया में हुई और इसे भी ऑस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को हराकर लगातार तीसरी बार जीता।
               1988 ऑस्ट्रेलिया महिला क्रिकेट टीम
1993 में भारत फिर से शामिल हुआ और सेमीफाइनल तक पहुंचकर सबको चौंका दिया। इसका मेजबानी इंग्लैंड में हुआ और इंग्लैंड ने न्यूजीलैंड को हराकर दूसरी बार अपने नाम जीत दर्ज किया।
                   1993 इंग्लैंड महिला क्रिकेट टीम 
1997 में भारत दूसरी बार सेमीफाइनल में पहुंची। जिसका मेजबानी भारत में ही हुआ, परंतु दुर्भाग्यवश भारत सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया से हार गई। यह ऑस्ट्रेलिया ने न्यूजीलैंड को हराकर जीता और चौथी बार विश्व चैंपियन बनी।
                 1997 ऑस्ट्रेलियाई महिला क्रिकेट टीम
फिर आया 2000 का वर्ल्ड कप जिसका मेजबानी न्यूजीलैंड में हुआ। इसमें भी भारत सेमीफाइनल तक पहुंची। इसमें न्यूजीलैंड ने ऑस्ट्रेलिया को हराकर पहली बार चैंपियन बनी।
                 2000 न्यूजीलैंड महिला क्रिकेट टीम
2005 में Women's World Cup का मेजबानी साउथ अफ्रीका में हुआ। इसमें भारत पहली बार फाइनल में पहुंचा, परंतु दुर्भाग्यवश ऑस्ट्रेलिया से हार गई और ऑस्ट्रेलिया पांचवीं बार विश्व चैंपियन बना।
                2005 ऑस्ट्रेलिया महिला क्रिकेट टीम 
2009 में वर्ल्ड कप ऑस्ट्रेलिया द्वारा मेजबानी हुआ। इसमें भारत का प्रदर्शन कुछ विशेष नहीं रहा। इसमें इंग्लैंड ने न्यूजीलैंड को हराकर तीसरी बार अपने नाम जीत दर्ज किया।
                    2009इंग्लैंड महिला क्रिकेट टीम
फिर वर्ल्ड कप 2013 का मेजबानी भारत द्वारा किया गया। इसमें भी भारत का प्रदर्शन कुछ विशेष नहीं होता है। इसका फाइनल ऑस्ट्रेलिया वूमेन और वेस्टइंडीज वूमेन के बीच खेला गया जिसे ऑस्ट्रेलिया ने अपने नाम कर लिया और छठी बार विश्व विजेता बना।
                     2013 ऑस्ट्रेलिया महिला टीम 
फिर आया वर्ल्ड कप 2017 जिसे इंग्लैंड द्वारा मेजबानी कया गया। इस बार भारत दूसरी बार फाइनल तक पहुंचा। इसमें दुर्भाग्यवश भारतीय महिला क्रिकेट टीम इंग्लैंड क्रिकेट टीम से केवल 9 रनों से हार गई और इंग्लैंड चौथी बार विश्व चैंपियन बन गई।
                   2017 इंग्लैंड महिला क्रिकेट टीम
 फिर आया 2022 वर्ल्ड कप जिसे न्यूजीलैंड द्वारा मेजबानी किया गया। इस वर्ल्ड कप में भारत 7 में से केवल 3 ही मैच जीत पाई और सेमीफाइनल तक भी नहीं पहुंच पाई। इसका फाइनल मैच ऑस्ट्रेलिया वूमेन और इंग्लैंड वूमेन के बीच हुआ। ऑस्ट्रेलिया वूमेन ने 71 रन से इंग्लैंड वूमेन को हरा दिया और वर्ल्ड कप अपने नाम कर लिया।
                  2022 ऑस्ट्रेलिया महिला क्रिकेट टीम 
फिर वह घड़ी आया जब भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने भी वर्ल्ड कप के इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया यानी वर्ल्ड कप 2025 की। इसका मेजबानी भारत द्वारा ही किया गया। इस वर्ल्ड कप में भारतीय महिला क्रिकेट टीम अत्यंत प्रयासों के बाद फाइनल तक पहुंचे जाती है और फाइनल में साउथ अफ्रीका महिला टीम टकराती है। तारीख होती है 2 नवंबर 2025 यानी फाइनल मैच का दिन। इस दिन भारतीय महिला साउथ अफ्रीका महिला को 52 रनों से हराकर इतिहास रच देती है और वर्ल्ड कप अपने नाम कर विश्व विजेता बन जाती है।
                  2025भारतीय महिला क्रिकेट टीम 
        यह केवल एक जीत नहीं है, बल्कि हर उस लड़की के लिए एक प्रेरणा है जो  कुछ करने का सपना देखती हैं। यह उन लोगों के सोच को बदलने का जीत है जिन्हें लगता है कि लड़कियां केवल घर के चूल्हे तक ही सीमित है। इस जीत से पूरे देश में खुशी के लहर दौड़ गई है और इस जीत को दूसरी दिवाली के रूप में मनाया जा रहा है। यह जीत हमारे लिए बहुत ही गौरव की जीत है। 

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

सनी देओल: कैसे एक भोले शक्ल वाले लड़के ने अपने पहले से ही फिल्म से 80 के दशक में रोमांस के सेंसेशन से उभरा और 90 का दशक आते आते भारतीय सिनेमा में एक्शन फिल्मों की परिभाषा को ही बदल दिया

 आज हम जिस व्यक्ति के विषय में बात करने वाले हैं उसने न केवल अपने पहले ही डेब्यू फिल्म से लोगों के दिलों में राज किया बल्कि 90 का दशक आते-आते भारतीय सिनेमा में एक्शन फिल्मों की परिभाषा को ही बदल दिया, उनकी फिल्में लोगों के दिलों में राज करने साथ साथ बॉक्स ऑफस में गदर मचाया जिसने अपने करियर में फिल्म के सभी दौरों का अनुभव किया। हम बात करने जा रहे हैं सनी देओल की।

सनी देओल


 सनी देओल का जन्म 19 अक्टूबर 1957 में साहनेवाल ,पंजाब में हुआ था। उनका पूरा नाम अजय सिंह देओल है। उनके पिता का नाम धर्मेंद्र है जो बहुत ही प्रसिद्ध अभिनेता हैं और उनकी माता का नाम प्रकाश कौर है। जब उनके पिता धर्मेंद्र को 1960 में अपनी पहली फिल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे'से कम मिल गया, तो सनी देओल अपनी माता के साथ पंजाब छोड़ बंबई(अब मुंबई) आ गए। यहीं से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। यहां रहते हुए उनका खेलों में रुचि बढ़ाने लगा था। वह बचपन में अपने स्कूल के प्रत्येक खेलों में भाग लेते थे। उन्होंने बचपन में 12 वर्ष की उम्र में है अपने पड़ोस से चुपके से कार लेकर ड्राइविंग सीख लिया था। जब उनका कॉलेज खत्म हुआ, तो उनके परिवार द्वारा उनको खेल-कूद दूरी बनाने को
कहा गया। तब वह फिल्मों में जाने का मन बनाते हैं। इसके लिए वह बर्मिंघम, इंग्लैंड एक्टिंग सीखने चले गए। यहां आकर उन्होंने पहली बार शराब और सिगरेट को हाथ लगाया। उनको यह पसंद नहीं था इसलिए अपना काम जारी रखते हुए अपनी एक्टिंग कोर्स पर ध्यान केंद्रित किया। कुछ सालों बाद अपना एक्टिंग कोर्स बंबई(अब मुंबई) वापस आ गए। उन्हें अपना पहला फिल्म डायरेक्टर राहुल रावेल से मिला जो कई प्रसिद्ध फिल्में दे चुके थे। उन्होंने सनी देओल के लिए शेक्सपियर पर आधारित कहानी बनाई। यह कहानी फिल्म 'बेताब' के रूप में बनाई गई जो वर्ष 1983 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई और बहुत ही सफल फिल्म सिद्ध हुआ।

सनी देओल का फिल्म में बहुत ही अच्छा प्रदर्शन था जो लोगों के दिलों म छा गया। उन्हें इसके लिए बेस्ट एक्टर का नॉमिनेशन मिला। इसके बाद उन्होंने कई रोमांटिक फिल्में जैसे -'सनी,मंजिल मंजिल और सोनी महावील' मैं काम किया। जिनके साथ कुछ बड़े-बड़े नाम जुड़े हुए थे। वर्ष 1985 में उन्होंने राहुल रावेल के साथ फिल्म 'अर्जुन' में काम किया। यह फिल्म भी सुपरहिट साबित हुआ।

इस फिल्म मैं उन्हें एक एक्शन हीरो के तौर पर देखा गया। वह उस समय फिल्म इंडस्ट्री में बहुत ही तेजी से उभर रहे थे और इंडस्ट्री भी एक्शन की ओर झुक रही थी। वर्ष 1986 में आई फिल्म 'सल्तनत' में उन्होंने पहली बार अपने पिता धर्मेंद्र के साथ स्क्रीन शेयर किया। वह अलग-अलग फिल्मोंं के साथ लगातार आगे बढ़ रहे थे। इसकेेेे बाद उन्होंने 1989 में फिल्म 'त्रिदेव' में काम किया।
इस फिल्म में वह जैकी श्रॉफ और नसीरुद्दीन शाह के साथ लीड रोल में थे। यह फिल्म भी बहुत ही सफल रहा। फिर उन्होंने एक ऐसे फिल्म में काम किया जिसकी कहानी हीरोइन के लिए लिखी गई थी। यह फिल्म थी 'चालबाज' जिसमें उन्होंने श्रीदेवी और रजनीकांत के साथ काम किया।
यह फिल्म भी बहुत ही सफल रहा। यह फिल्म उन्होंने अपने पिता के द्वारा गया फिल्म 'सीता और गीता' को देख कर किया था। इतने सारे फिल्में करने के बाद उन्हें एक 'एक्शन हीरो' का पहचान तो मिल गया था लेकिन उन पर इसका टैग लगना बाकी था। ऐसे में डायरेक्टर राजकुमार संतोषी उनके जीवन में आए।
राजकुमार संतोषी

उन्होंने फिल्म घायल को कमल हसन को एक लीड एक्टर के रुप में ध्यान रखते हुए लिखा था। परंतु बाद में यह फिल्म किसी कारणवश सनी देओल को मिल गया। फिल्म बनने के बाद वर्ष 1990 में यह रिलीज़ हुआ और यह फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुआ। यह सनी देओल के लिए मिल का पत्थर साबित हुआ और उन्हें अपना पहला फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला। इसके बाद उन्होंने कई एक्शन फिल्मों में काम करने के बाद अपने ऊपर एक 'एक्शन हीरो' के टैग को मजबूत कर दिया। वर्ष 1993 में फिल्म 'दामिनी' रिलीज हुई जिसमें सनी देओल के कुछ डायलॉग जैसे 'तारीख पे तारीख' और 'ढाई किलो का हाथ'पूरे फिल्म पर भारी पड़ गया।

दर्शकों के लिए इस फिल्म का मतलब ही सनी देओल बन गया। उनका शानदार आवाज और प्रदर्शन आज भी याद किए जाते हैं। वर्ष 1996 में उनकी और राजकुमार संतोषी की जोड़ी फिल्म 'घातक' के जरिए दिखा।
यह फिल्म बहुत ही सुपरहिट रही। इस फिल्म का प्रत्येक सीन यादगार बन गया। उसके अगले वर्ष ज़िद्दी रिलीज़ हुई और यह भी बहुत बड़ी हिट हुई। कुछ वर्षों बाद इतने सारे सफल फिल्में देने के बाद भी उन्हें किसी बड़े फिल्म मे काम करने का मौका नहीं मिलता है। ऐसे में उन्होंने स्वयं फिल्म निर्माण करने का निश्चय किया। उन्होंने 1999 में फिल्म 'दिल्लगी' से एक नए सफर की शुरुआत की। यह फिल्म ज्यादा सफल नहीं हुई। ऐसे में उन्हें एक बड़े फिल्म की आवश्यकता थी। इसके बाद डायरेक्टर अनिल शर्मा उनके साथ आए। 
अनिल शर्मा 
उन्होंने सनी देओल को लेकर फिल्म 'गदर' बनाई। इस फिल्म ने सनी देओल के करियर को संवारने का काम किया। यह फिल्म बहुत बड़ी सफल सिद्ध हुई। फिल्म के टिकट कलेक्शन और दर्शकों के भीड़ ने एक नया रिकॉर्ड बना दिया। इसी समय उनकी 'इंडियन' और 'मां तुझे सलाम' जैसी फिल्म रिलीज हुई। लोगों ने इन दोनों फिल्मों को भी बहुत पसंद किया। इन फिल्मों के बाद उनका करियर फिर से पटरी पर लौटता हुआ नजर आया। सनी देओल ने उसे 2019 में BJP में शामिल होकर राजनीति में कदम रखा। वह गुरदासपुर के लिए लोकसभा का चुनाव लड़े और जीता। दर्शकों के प्यार और मांग को देखते हुए अनिल शर्मा और सनी देओल फिर से एक साथ आए और उन्होंने 'गदर 2' बनाया।

यह फिल्म वर्ष 2023 में रिलीज़ हुई और इसके फर्स्ट पार्ट की तरह ही इसको भी दर्शकों ने बहुत ही पसंद किया। इस फिल्म ने भी बहुत अच्छा रिकॉर्ड बनया।
                      सनी देओल की निजी जीवन की बात करें, तो उनका विवाह पूजा देओल के साथ हुआ है और उनके दो बच्चे हैं-करण देओल और राजवीर देओल।
सनी देओल और उनकी पत्नी 
सनी देओल और उनके दोनों बेटे 
सनी देओल अपने फिल्मों के शानदार शानदार प्रदर्शन और काम के लिए आज भी लोगों दिलों में राज करते हैं। तो यह थी हमारे सबके चहिते अभिनेता सनी देओल की जिसने फिल्म इंडस्ट्री के सभी दौरों को दिखा।

असरानी: हमारे प्रिय हास्य कलाकार

 आज हम जिस व्यक्ति की बात करने जा रहे हैं, वह न केवल एक बेहतरीन हास्य कलाकार , बल्कि  एक बहुत अच्छे संगीतकार भी थे। इन्होंने अपने संघर्ष के दौरान अपने जिस संस्था में एक्टिंग सिखा उसी में एक्टिंग सीखने का काम भी किया। यहां बात होने जा रही है हम सबको हंसाने वाले हास्य कलाकार असरानी जी की।

        
असरानी जी का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर, राजस्थान  में एक सिंधी परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम गोवर्धन असरानी था। वह वह चार बहनें और तीन भाइयों में से एक थे। उनके पिताजी वर्ष 1936 में कराची से जयपुर आ गए थे। यहां उन्होंने इंडियन आर्ट कारपेट फैक्ट्री में नौकरी किया और बाद में अपना बिज़नेस करने लगे। असरानी के पढ़ाई सेंट जे़वियर स्कूल और राजस्थान कॉलेज से हुई थी। असरानी के माता-पिता चाहते थे कि वह अच्छे से पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी करें। लेकिन वहां एक अभिनेता बनने का मन बना चुके थे। उनके पिता ने इसके लिए उन्हें कभी इजाजत नहीं दी। असरानी को लगता था कि शायद उनका सपना पूरा नहीं होगा। वह बचपन से ही जयपुर में रेडियो के कार्यों से जुड़े हुए थे और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कई वर्षों तक वह रेडियो के क्षेत्र में काम करते रहे। वह अपना सपना पूरा करने के लिए मुंबई जाना चहते थे परंतु उनके पास पैसे नहीं थे। उनके एक मित्र ने जयपुर में दो नाटक किए। इन दो नाटकों के टिकट से जो पैसे मिले, मुंबई जाने के लिए उनमें से कुछ असरानी को दिया गया। मौका देखकर एक दिन असरानी अपने घर से मुंबई (तब बंबई) के लिए निकल गए।
वह 1962 में मुंबई आ गए। यहां उनकी मुलाकात निर्माता, निर्देशक किशोर साहू और लेखक, निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से हुई।
                        निर्माता किशोर साहू
                       डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी
उन्होंने उसे पहले पुणे के फिल्म संस्था भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्था सेटिंग का कोर्स करने की सलाह दी।
असरानी ने वर्ष 1964 मैं वहां दाखिला ले लिया और 1966 में अपना कोर्स पूरा कर लिया। इसके बाद वह काम की तलाश में मुंबई आ गए। वह संघर्ष कर ही रहे थे कि उनके परिवार वाले उन्हें ढूंढते हुए वहां आ गए और असरानी को जबरदस्ती अपने साथ ले गए। परंतु असरानी का मन वहां लगा नहीं और वह मुंबई वापस आ गए। यहां आ कर वह काम की तलाश में लग गए। जब उन्हें काम ढूंढने पर भी काम नहीं मिला, तो वह वापस उसी संस्था में आ गए जहां से उन्होंने एक्टिंग सीखा था यानी भारतीय फिल्म और टेलिविजन संस्थान पुणे और  बतौर एक्टिंग टीचर यहां नौकरी करने लगे। इसी दौरान ऋषिकेश मुखर्जी लेखक और डयरेक्टर गुलज़ार के साथ वहां आ पहुंचे।
                   कवि और लेखक गुलज़ार 
असरानी उन्हें देखकर बहुत खुश हुआ। उन्होंने मुखर्जी से पूछा कि आपने मुझे काम के लिए कहा था। इस पर मुखर्जी कहते हैं मैं काम दूंगा और उनसे पूछते हैं कि जया भादुड़ी कौन है। असरानी भादुड़ी को बुलाते हैं।
                                जया भादुड़ी 
असरानी ने गुलजार साहब से यह पूछा कि मुखर्जी साहब यहां क्यों आए हैं,वह जवाब देते हैं कि गुड्डी को ढुंढने आए हैं। उस समय जया भादुड़ी असरानी जी की छात्रा हुआ करती थीं। गुड्डी फिल्म को बनने में अभी समय था लेकिन जया भादुड़ी को इसके लिए सिलेक्ट कर लिया गया। इस बीच असरानी को अपना पहला फिल्म 1967 में मिला। इस फिल्म का नाम था 'हरे कांच की चूड़ियां'। इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता विश्वजीत का भूमिका निभाया था।
इस फिल्म से उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं मिला। उस समय असरानी  अपने परफॉर्मेंस के रील उस जमाने के मशहूर डायरेक्टर एलवी प्रसाद के पास दिखाने ले गए।
          ‌                  डायरेक्टर एलवी प्रसाद
उन्होंने उसे देखकर असरानी को कहा-हम तुम्हें कैसा रोल दें, हीरो हमारे पास बहुत है, विलेन तुम लगते नहीं, कॉमेडियन का सवाल ही पैदा नहीं होता और रोमांस तुमसे होगा नहीं। इस पर असरानी अपने रील का डब्बा उठाते हैं और बोलते हैं कोई बात नहीं, मुझे माफ कीजिए, मैं चलता हूं। हालांकि बाद में प्रसाद जी ने उन्हें आगे अपने बहुत सारे फिल्मों में काम करने का मौका दिया। इस दौरान असरानी ने 1967 से 1972 चार गुजराती फिल्मों में भी काम किया जिसमें उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाया। डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी जी ने असरानी के करियर में बहुत बड़ा योगदान दिया। उन्होंने वर्ष 1969 में उन्हें फिल्म 'सत्यकाम' में काम दिया जिसमें उन्होंने एक सपोर्टिंग एक्टर की भूमिका निभाई।
बाद में ऋषिकेश मुखर्जी जी ने उन्हें 'गुड्डी' में एक बेहतरीन भूमिका दिया जिसे उन्होंने बहुत अच्छे से किया।

असरानी ने अपने एक्टिंग से इस फिल्म में सभी का दिल जीत लिया। बाद में मुखर्जी जी ने असरानी को अपने बहुत सारे फिल्मों में मौका दिया। जिनमें 'बावर्ची, नमक हराम, अभिमान और चुपके चुपके'जैसे फिल्में शामिल हैं। असरानी ऋषिकेश मुखर्जी से अपने संबंध को लेकर कहते हैं -मैं आखिरी दिनों में अस्पताल उनके पास गया, तो वह एक कागज पर असरानी मुखर्जी लिखकर उन्हें देते हैं। वह उन्हें कहना चाहते थे कि तुम मेरे बेटे हो। धीरे-धीरे असरानी हर निर्देशक और निर्माता के पसंदीदा अभिनेता बन गए। इसके बाद असरानी मैं साउथ फिल्मों की ओर भी अपना रुख किया और और वहां का बहुत सारे निर्माता और निर्देशकों के साथ काम किया। उन्होंने साउथ की हिंदी रीमेक फिल्मों में भी विशेष भूमिका निभाया। धीरे-धीरे वह हिंदी फिल्मों के चाहिते कलाकार बन गए। इसके बाद निर्देशक और निर्माता बी आर चौपड़ा ने उन्हें फिल्म 'निकाह' के लिए साइन कर लिया।

इसमें उनका किरदार नेगेटिव था। बी आर चोपड़ा को कई लोगों ने असरानी को नेगेटिव रोल देने से मना किया था लेकिन वह अपने फैसले पर अड़े रहे। बाद में यह फिल्म सुपरहिट रही। उन्होंने लगभग सभी कामयाब लोगों के साथ काम किया। उन्होंने लगभग 400 फिल्मों में काम किया है। उन्होंनेेे कुछ फिल्में जैसे-अलाप, फूल खिलेेेेेे हैं गुलशन गुलशन, यह कैसा इंसाफ और हमारेे तुम्हारे में गानेे भी गए हैं। वह राजनीति में भी शामिल हुए और 2004 में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। उन्होंनेेे चुनावों में काफी बढ़ चढ़ हिस्सा लिया। उन्हेंं फिल्म  'शोले'  में निभाए गए अपने किरदार 'अंग्रेज जमानेेेे के जेलर' के लिए हमेशा याद किया जाता है।

इसमेंं उन्होंने हमें हंसाने का काम किया था। हम सबको अपने परफॉर्मेंस से हंसाने और हमारे दिलों में राज करने के बाद 20 अक्टूबर 2025 दिवाली के दिन जुहू के आरोग्य निधि अस्पताल में अपनी अंतिम सांसें लीं।तो यह थी हमें हंसने वाले हमारे प्रिय हास्य कलाकार असरानी की कहानी।

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