आज हम जिस मंदिर के विषय में बात करने वाले हैं वह मंदिर प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। यह मंदिर प्राचीन काल में अपने ऊपर हुए अनेक आक्रमणों से कई बार ध्वस्त हुआ, परंतु फिर भी कई बार पुनर्निर्माण होकर आज भी अपने अस्तित्व में है। साथ ही इस मंदिर का निर्माण हर युग में हुआ और हर युग में इसका नाम भी बदलता रहता है। यह मंदिर है सोमनाथ का मंदिर।
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रविवार, 21 दिसंबर 2025
सोमनाथ मंदिर : वह मंदिर जिस पर 17 बार आक्रमण हुआ।
मंगलवार, 16 दिसंबर 2025
बेंजामिन नेतनयाहू: फिलिस्तीन के सबसे बड़े दुश्मन जिसने अपने कंधे पर अपने राष्ट्र के लिए गोली खाई और अपने देश के लिए सबसे लंबे समय तक राष्ट्रपति बने
यह कहानी है उस व्यक्ति की जो फिलिस्तीन का सबसे बड़ा कट्टर दुश्मन माना जाता है, उसने न सिर्फ अपने राष्ट्र के लिए गोली खाई बल्कि देश के लिए कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनों में हिस्सा लिया और अपने राष्ट्र का सबसे लंबे समय तक के प्रधानमंत्री बने। यह कहानी है भारत के सबसे अच्छे मित्र इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू की।
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहूबेंजामिन नेतन्याहू का जन्म 21 अक्टूबर 1949 को तेल अवीव, इजराइल में हुआ था। वह एक इसराइली प्रधानमंत्री और एक राजनायिक हैं। उन्हें बचपन में 'बीबी' बुलाया जाता था। उनके पिता का नाम बेंजियन नेतनयाहू था जो एक इतिहासकार थे और यहूदियों के इतिहास के बारे में लिखते थे। उनकी माता का नाम त्ज़िला सेगल था।
उनका बचपन कुछ समय पश्चिमी जेरूसेलम और फिर संयुक्त राज्य अमेरिका में बीता। वह शेल्टनहम हाई स्कूल से ग्रेजुएट हुए। वह 1967 में इसराइल वापस आकर इजरायली डिफेंस फोर्स में शामिल हो जाते हैं।उन्होंने 1967 से लेकर 1972 तक आर्मी में अपनी सेवा दी। युद्ध के दौरान उन्हें गोली भी लगी।इसके बाद वह 1972 में आर्किटेक्चर की पढ़ाई के लिए MIT , संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए। फिर वह 1973 के योम कीपर युद्ध में अपनी सेवा देने के लिए वापस इसराइल आ गए। अपनी सेवा देने के बाद वह वापस अमेरिका गए और बेन नीते के नाम से आर्किटेक्चर में बैचलर की डिग्री1975 में पुरी की। फिर उन्होंने 1976 में MIT स्लोन स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट अपनी मास्टर डिग्री पुरी की। 1976 में एक ऑपरेशन के दौरान उनके बड़े भाई योनातन नेतन्याहू की मृत्यु हो जाती है, वह भी इजरायली आर्मी में शामिल थे। इसका बेंजामिन नेतन्याहू पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने 1976 से 1978 तक बोस्टन कंसलटिंग ग्रुप में इकोनामिक कंसल्टेंट के रूप में काम किया। इसके बाद वह सब कुछ छोड़ के 1978 में इसराइल वापस आ गए। उन्होंने 1978 से 1980 के बीच जोनाथन नेतन्याहू एंटी टेरर संस्था को चलाया। वह 1984 से 1988 तक यूनाइटेड नेशंस के लिए इजरायली एंबेसडर के रूप में कार्यरत थे। वह 1988 में भी शामिल हए और लिकुड पार्टी को ज्वाइन किया। उन्हें शुरू में डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर बनाया गया। उन्हें लिकुड पार्टी की ओर से 1996 के इजरायली लेजिसलेटिव इलेक्शन में प्रधानमंत्री के पद के लिए दावेदार बनाया गया। वह चुनाव जीते और इजराइल के प्रधानमंत्री बन गए। प्रधानमंत्री नेतन्याहू 1997 में मोसाद को हमास लीडर खालिद मशाल को मारने का अधिकार दे दिया। वहां 1999 में इलेक्शन चुनाव हार गए और कुछ समय के लिए उन्होंने राजनीति छोड़ दिया। वह वर्ष 2000 में राजनीति में वापस आ गए। उन्हें वर्ष 2002 में उस समय के प्रधानमंत्री एरियल शेरान द्वारा विदेश मंत्रालय के पद के लिए नियुक्त किया गया। पूर्व इजराइली प्रधानमंत्री एरियल शेलोन
फिर 2003 में विदेश मंत्रालय का पद को सेल्वन शेलोम को और बेंजामिन नेतन्याहू को वित्त मंत्री का पद दिया गया। पूर्व इजरायली विदेश मंत्री सेल्वन शेलोम
उन्होंने इस पद को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार किया। 2007 में उन्हें लिकुड पार्टी का चेयरमैन और प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदार बनाया गया। उन्होंने 2009 के चुनाव को जीता और 2009 से 2021 तक वह दूसरी बार इजराइल के प्रधानमंत्री बने। फिर वह 2022 से अभी तक तीसरी बार इसराइल के प्रधानमंत्री हैं। तो यह थी इसराइल के वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हो की कहानी।
एपीजे अब्दुल कलाम: एक साधारण लड़के की अखबार बेचने से लेकर भारत को मिसाइल तकनीकी के क्षेत्र में मजबूत बनाने और देश का प्रथम नागरिक बनने तक की यात्रा
यह कहानी है उस एक सधारण लड़के की जिसने कभी अपना घर चलाने के लिए बचपन में अखबार बांटा, रात दिन कई वर्षों तक अपने कठोर परिश्रम से भारत को मिसाइल तकनीकी के क्षेत्र में शक्तिशाली बनाया और देश का प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति बने। हम जिसके विषय में बताने जा रहे हैं देश के मिसाइल मैन के नाम से जाना जाने वाले हमारे देश के 11वें राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम।
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| APJ Abdul Kalam |
डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम, तमिलनाडु में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनका पुरा नाम अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम था। उनके पिता का नाम जैनुलाब्दीन मराकायार एक नाविक थे और माता का नाम आशियम्मा एक गृहणी थी। कलाम का परिवार आर्थिक रूप से बहुत ही गरीब था। उनके पिता का एक छोटा सा नाव था जिसे वह मछुआरों को किराए पर दते थे और तीर्थ यात्रियों को अपने नाव से सैर कराते थे। उनके पिता बहुत ही अनुशासित व्यक्ति थे और वह स्थानीय मस्जिद के इमाम भी थे। उनकी बातों में गहरी आध्यात्मिकता थी। कलाम के मन में उनके अपने पिता के बातों का बहुत प्रभाव पड़ता था। बचपन उन्हीं के बातों को सुनकर उनके मन में विज्ञान और अध्यात्म की जड़ें जमने लगी। उनका घर एक संयुक्त परिवार वाला था जिसमें अनेक सदस्य थे। उनकी माता बहुत ही दयालु स्वभाव की थी।
उनके घर में गरीबी होने के बावजूद खाने वालों की तादाद ज्यादा होती थी। उनके घर में मेहमान नवाजी बहुत ही अच्छे से होती थी। कोई भी उनके घर से भूखा नहीं जाता था। उनकी माता का कहना था कि खाना हमेशा बांटने ही बढ़ता है। उनकी माता की यही करुणा और सादगी कलाम के भीतर नींव बनी। कलाम सुबह 4:00 उठकर गणित का ट्यूशन पढ़ने के लिए जाते । यह ट्यूशन उसे मुफ्त में मिलती थी। इसके बाद वह अपना घर चलाने के लिए रामेश्वरम रोड जाकर वहां से अखबार का ढेर उठाकर बांटने जाते थे। यह काम करते हुए वह पसीने से भीग जाते थे परंतु उनके चेहरे पर एक मुस्कान होती थी। यही से उन्होंने आत्मनिर्भरता का पाठ सिख लिया। काम छोटा हो या बड़ा वह उसे पूरे दिल से करते थे। कलाम के जीवन को आकार देने में उनके शिक्षकों का भी बहुत बड़ा योगदान था।
यह उनके लिए आसान नहीं था। उनके परिवार के पास उन्हें दाखिला दिलाने के लिए पैसे नहीं थे। उनकी बड़ी बहन ने कलाम की पढ़ाई करने की तीव्र इच्छा को देखकर अपने सोने की चूड़ियां और हार गिरवी रख दिया और उन पैसों से कलम को पढ़ने के लिए कहा। उन्होंने उसे कहा- तुम्हारा सपना मेरा सपना है। उनकी आवाज में प्रेम और प्रेम की गहराई थी। उनके बहन का यह बलिदान कलाम के कंधों पर एक भारी जिम्मेदारी डाल देते हैं। कलम ठान लेते है कि वह अपने बहन का कर्ज जरुर चुकाएंगे। इसके बाद वह MIT में एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में दाखिला ले लेते हैं। यह विषय उनके बचपन का फाइटर पायलट बनने का सपना पूरा करने का था।MIT में उनका प्रतिभा चमक उठा और अपने परिश्रम और लगन से सभी को प्रभावित किया। एक बार कलाम के एक प्रोजेक्ट को उनके प्रोसेसर ने अधूरा बता दिया और कठोरता भरे वचनों से उसे 3 दिन में पूरा करने को कहा। उस रात उन्होंने न खाना खाया और न सोया। वह 72 घंटे तक अपने ड्राइंग बोर्ड के सामने डटे रहे। उनकी उंंगलियांं थक गई और आंख लाल हो गई, परंतुु उनका हौसला डगमगाया नहीं। जब तीसरेेेेेेे दिन वह अपना प्रोजेक्ट अपने प्रोफेसर को दिखाने गए, तो दंग रह गए। उनकेे आंखों में आंसु थे। उन्होंनेे उससे कहा-कलाम मैंं यह जानता था कि तुम यह कर लोगे और उसेे गले लगा लिया। कलाम को यह एहसास हो गया कि मेहनत और लगन से कोई भी मंजिल संभव है। 1958 को MIT सेे अपनी इंजीनियरिंग पूरी करनेेे के बाद वह पल आ ही गया जिसका कलाम को बेसब्री से इंतज़ार था।उन्हें दो इंटरव्यू केेे लिए बुलावा आया। एक था दिल्ली रक्षा मंत्रालय केे तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय से और दूसरा भारतीय वायु सेना देहरादून से। वह एक फाइटर पायलट बनना चाहतेे थे इसलिए उन्होंने देहरादून को चुना। जब इटरव्यू का दिन आया , तो 8 की आवश्यकता थी और 25 उम्मीदवार थे। उन्होंनेे स्वयं को पूरी तरह झोंक दिया और पूरे आत्मविश्वास से अपना इंटरव्यू दिया। लेकिन जब परिणाम आया तो एक-एक करके 8 नाम पुकारे गए, तोोो उनका नाम 9वें स्थान पर था। वह अपनेे सपने से केवल एक कदम की दूरी पर थे। उनका सपना चूर चूर हो जाता है और पूरी तरह से टूट जातेे हैं। अपनेेे टूटे हुए मन को लेकर शिवानंद आश्रम, ऋषिकेश पहुंचते हैं जहांं वह स्वामी शिवानंद से मिलते हैं। स्वामी शिवानंद उनसेे कहते हैं-यह तुम्हारी नियति नहीं थी, अपनी असफलता को गले लगाओ। उनकेे शब्दों ने कलाम केेे दिल पर मरहम लगानेे का कार्य किया। उन्होंनेेे सोचा शायद आसमान ने मेरेेे लिए दूसरा रास्ता चुना है। उन्होंनेे हार न मानने की ठानी। वह अपनेेे दूसरे इंटरव्यू केेे लिए दिल्ली गए और रक्षा मंत्रालय का नौकरी जॉइन किया। परंतुु यह केवल नौकरी नहींं थी। यह उस यात्रा की शुरुआत थी, जो उन्हें यहां से पोखरण की रेगिस्तान तक लेे जाती है। यह वह नई कहानी की शुरुआत थी जिसनेे भारत को एक नई ताकत दी। रक्षा मंत्रालय में कुछ समय काम करने के बाद उन्हेंं 1979 में अंतरिक्षष कार्यक्रम केेेे जनक डॉ विक्रम साराभाई ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधन संगठन (ISRO) में भेज दिया।उस समय भारत का अंतरिक्ष सपना अपनी शुरुआती कदम की ओर बढ़ रहा था। केरल की थुंबा में वैज्ञानिकों द्वारा साइकिलों पर रॉकेट के पुर्जे ढोए जा रहे थे, वहां एक नया सूरज उग रहा था। डॉ विक्रम साराभाई ने कलाम की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें भारत के पहले स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल SLV-3 का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बना दिया। यह डॉ कलाम को बहुत बड़ी जिम्मेदारी मिली थी। उन्हें अगले 10 साल के भीतर 40 किलो के रोहिणी नामक सैटेलाइट को पृथ्वी के कक्षा में स्थापित करने का लक्ष्य दिया गया। कलाम और उनके साथी वैज्ञानिकों ने दिन रात एक कर थुंबा और श्रीहरिकोटा में रातें जागकर, पसीना बहाकर असंभव को संभव बनाने की जिद में डुबे रहे। यह केवल एक रॉकेट नहीं था। यह भारत का राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के साथ-साथ भारत का गर्व था। कलाम की अगुवाई में यह भारत का राष्ट्रीय जुनून बन गया था। उनकी आवाज में ऐसा प्रभाव था जो पुरी टीम को एकजुट कर सकती थी। आखिरकार वह दिन आ ही जाता है जब 10 अगस्त 1979 श्रीहरिकोटा के लॉन्च पैड SLV-3 आसमान की ओर खड़ा था। पूरा देश सांसे थामें इस ऐतिहासिक पल का इंतजार कर रहा था। कंट्रोल रूम में सन्नाटा था, परंतु तनाव हवा में तैर रहा था। जैसे ही काउंटडाउन शुरू हुआ लॉन्च से ठीक पहले कंप्यूटर में लाल बत्ती जल गई गई। यह सिस्टम में कुछ गड़बड़ी होने का संकेत था। डायरेक्टर के रूप में अंतिम फैसला उन्हें लेना था। उनके विशेषज्ञों ने उन्हें कहा की कैलकुलेशन सही है और लॉन्च के साथ आगे बढ़ सकते हैं। कलाम ने उन पर भरोसा किया और लॉन्च का बटन दबा दिया। SLV-3 आसमान की ओर आगे बड़ा और कंट्रोल रूम में लोग खुशी से तालियां बजाने लगे। परंतु यह खुशी कुछ ही पल के लिए थी।
दूसरे चरण में वह रोकेट लड़खड़ाया और नियंत्रण खो बैठा। 317 सेकंड बाद वह बंगाल की खाड़ी में गिरकर समा गया। पूरे कंट्रोल रूम में दुख का माहौल छा गया। 10 साल का परिश्रम और लगन सब समुद्र में समा गया। इससेेे कलाम पूरी तरह से निराश होकर टूट जातेे हैं। वह अपनी नज़रें किसी से नहींं मिला पाते हैं और स्वयंं को इसकेेे लिए जिम्मेदार मानते हैं। इसकेे बाद उन्हें दुनिया को जवाब देना था। मीडिया उनका प्रतीक्षा कर रही थी। कलाम समझ नहींं पा रहे थे कि वह क्या कहें। तभी ISRO केे चेयरमेन प्रोफेसर सतीश धवन कलाम के पास आकर उनका कंधा थपथपाते हैं और अपनेे साथ चलने को कहतेे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में धवन माइक केे आगे और कलम उनकेेे पीछे होते हैं। धवन कहते हैं -आज हम असफल हुए हैं, इसकी पुरी जिम्मेदारी मेरी है, मुझे अपनी पूरी टीम पर गर्व है, उनकी मेहनत बेमिसाल है। वह उनसेे वादा करते हैं कि अगले साल हम जरुर सफल होंगे। प्रोफेसर धवन का यह नेतृत्व का पाठ था जो किसी पुस्तक में नहीं पढ़ाया जाता है। उन्होंनेेेेेे असफलता का सरा जिम्मा अपनेेेे ऊपर लेे लिया और अपनी टीम को आलोचना से बचा लिया। इस बात नेे उनके पुरेे टीम में एक नई जान फूंक दी और दुगनी ऊर्जा के साथ फिर सेे काम में जुट गए। इससेे कलाम में भी एक नई ऊर्जा आ गई। ठीक 1 साल बाद 18 जुलाई 198को श्रीहरिकोटा केे उसी लॉन्च पैड पर SLV-3 फिर से तैयार था।
इस बार रोकेट आसमान को छू गया और रोहिणी सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो गया। इसके बाद भारत उन देशों में शामिल हो जाता है जिनके पास अपनी स्वयं की सेटेलाइट लॉन्च करने की ताकत थी। उनके कंट्रोल रूम में खुशी का ठिकाना नहीं था। तालियां, आंसू और गर्व एक साथ उमड़ने लगा। इस बार जब मीडिया आया कलम को आगे कर माइक थमाया और कलाम को कहने लिए कहा। अपने इस घटना का जिक्र करते हुए कलाम ने कई बार कहा है कि मैंने उस दिन नेतृत्व का सबसे बड़ा पाठ सिखा। जब असफलता आती है तो एक सच्चा लीडर उसकी जिम्मेदारी लेता है और जब सफलता मिलती है, तो अपनी सफलता का श्रेय अपनी टीम को देता है। यह सबक के सथ-साथ एक विरासत थी जो धवन ने कलाम को सौंपे थे। SLV-3 की सफलता कलम को देश का नायक बना देता है। इसके बाद कलम का दिल नए सपना के लिए धड़क रहा था। वह भारत को आत्मनिर्भर बनना चाहते थे जो अपनी सुरक्षा के लिए किसी पर भी निर्भर न हो। वह 1982 में ISRO मैं इसरो छोड़कर रक्षा अनुसंधान और विकास(DRDO) में फिर से शामिल हो गए। उस समय भारत मिसाइल तकनीकी के लिए विदेशों पर निर्भर रहता था। पश्चिमी देशों ने मिसाइल तकनीकी जैसे जरूरी चीजें देने से प्रतिबंध लगा दिया था। कलाम ने उसे समय के प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के सामने एक योजना रखी जिसका नाम था-Integrated Guided Missile Development Program (IGMDP)। इसका उद्देश्य भारत को मिसाइल तकनीकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना था।26 जुलाई 1983 को भारत सरकारने ने इस ऐतिहासिक कार्यक्रम को अपनी मंजूरी दी। IGMDP के तहत एक साथ पांच मिसाइलों को विकसित करने का काम शुरू हुआ। इन पांच मिसाइलों को'भारत का पांच दिव्यास्त्र' कहा गया। इन्हें याद रखने क लिए PATNA एक्रोनीम का उपयोग किया गया। जहां उनके अर्थ कुछ इस प्रकार है- P-पृथ्वी, A-अग्नि, T-त्रिशूल, N-नाग और A-आकाश। यह काम आसान नहीं था। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध होने के कारण भारत को रिंग लेज़र, जायरोस्कोप, कंपोजिट राकेट मोटर और माइक्रो नेविगेशन जैसी मुश्किल तकनीकें खुद विकसित करनी पड़ी। यह रक्षा परियोजना के साथ साथ भारत की तकनीकी स्वतंत्रता की घोषणा थी। कलम इस तकनीक संप्रभुत्वा के वास्तुकार बन गया थे। वह अपनी टीम को राष्ट्रीय मिशन के लिए तैयार करते थे। उनकी रात दिन की मेहनत और अनगिनत चुनौतियों के बाद वह दिन आ ही गया 22 मई 1989 को उड़ीसा के तट पर अग्नि मिसाइल लॉन्च के लिए तैयार थी। कंट्रोल रूम में सन्नाटा के साथ सबके मन में यही प्रश्न था इस बार सफलता मिल जाए। ऐसे ही अग्नि मिसाइल आसमान को चीर धरती कांप उठी। यह एक भारत की हुंकार थी दुनिया के कानों तक पहुंची। इस कार्यक्रम के सफलता के बाद उन्हें 'मिसाइल मेन 'कहा गया। फिर 25 जुलाई 2002 को उन्होंने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। यह पहली बार था जब कोई वैज्ञानिक राष्ट्रपति के पद तक पहुंचा। वह अब देशक प्रथम नागरिक थे। उनके लिए यह पद सत्ता का प्रतीक न हीहीं बल्कि सेवा का सबसे बड़ा अवसर था। वह राष्ट्रपति भवन तो गए परंतु अपनी सादगी अपने साथ ले गए। उन्होंने राष्ट्रपति भवन बच्चों, युवाओं और आम लोगों के लिए खोल दिए। उनका मानना था कि भारत का भविष्य इन्हीं के हाथों है। वह एक ऐसे राजा थे जिनके भीतर संत बसा था। राष्ट्रपति के पद से मुक्त होने पर भी वहां रुके नहीं , वह देश विदेश विदेश के विश्वविद्यालयों में जाकर जाकर छात्रों को प्रेरित करते। 27 जुलाई 2015 में वह ऐसे ही कार्यक लिए IIM शिलांग गए। लेक्चर हॉल पूरी तरह से भरा हुआ था, सभी छात्र उनका स्वागत थालियों से करते हैं। उन्होंने अपना लेक्चर शुरू ही किया था कि मंच पर ही गिर गये । उन्हें पास के बेतानी अस्पताल ले जाया गया गया। शाम 7:45 में उन्होंने अपनी अंतिम सांसें लीं। उनका जीवन ज्ञान से ही शुरू हुआ और अंत भी ज्ञान देते हुए हुआ। उन्होंने कहा था सपना वह नहीं है जो आप सोते हुए देखते हैं, सपना तो वह है जो आपको सोने नहीं देती। तो यहां थी हमारे मिसाइल मैन भारत के 11 राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की।
सरदार वल्लभभाई पटेल: भारत को एक सूत्र में पिरोनेवाले लोह पुरुष
आज हम एक ऐसे महान व्यक्ति के विषय में बात करने वाले हैं जिन्होंने हमारे देश को एकजुट किया और हमारे राष्ट्र के अस्तित्व को विश्व में बचा कर रखा।
15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों ने हमारे देश को आजाद तो किया, परंतु भारत से एक अलग राष्ट्र पाकिस्तान का भी निर्माण करके चले गए। इसके साथ ही भारत 562 अलग-अलग देसी रियासतों में बांटा हुआ था। इन रियासतों को यह विकल्प दिया गया था कि वे चाहे तो भारत में विलय हो जाए या अपना स्वतंत्र राष्ट्र बना लें। इससे सभी राजाओं में अपना स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की मंशा ने जन्म लिया। यह एक बहुत बड़ी समस्या थी और इससे हमारे भारतवर्ष का अस्तित्व खतरे में हो सकता था। इस दौर में भारत के इन 562 देसी रियासतों को एक सूत्र में बांधकर एकीकरण करने का कार्य एक व्यक्ति को दिया गया जिसे उन्होंने बहुत अच्छे से पूरा किया और हमारे राष्ट्र को एक किया। वह महान व्यक्ति हैं लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल। आज हम जानने वाले हैं उनके जीवन के विषय में।
सरदार वल्लभभाई पटेलसरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1975 में नाडियाड ,गुजरात में हुआ था। उनका पूरा नाम वल्लभभाई झवेरभाई पटेल था। उनके पिता झवेरभाई पटेल एक सच्चे, ईमानदार और सख्त अनुशासन वाले किसान और माता लाडबाई ममता और धार्मिकता की मूर्ति थी। उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव के छोटे स्कूल हुई। वह बचपन से ही आत्मनिर्भर और साहसी लड़के थे। एक बार उनके हाथ में एक फोड़ा हो जाता है। उनका वह फोड़ा पूरी तरह से पस से भरा हुआ होता है। जब डॉक्टर वह फोड़ा देखते हैं तो कहते हैं कि इसे तो गर्म लोहे से फोड़ना होगा। जब डॉक्टर आग से तपी गर्म लोहा लाकर फोड़ने जाता है, तो उसके भी हाथ कांपने लगा जाते हैं। तभी सरदार पटेल उस लोहे को ले लेते हैं और अपने हाथों से उस फोड़े को फोड़ देते हैं। वह पढ़ाई के साथ-साथ खेल में भी बहुत अच्छे थे। 1893 में 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह झवेरबा पटेल से कर दिया गया। कम आयु में विवाह होने के कारण ही उन्होंने 22 वर्ष की आयु दसवीं कक्षा पास किया। वे वकालत का पढ़ाई करना चहते थे, परंतु अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्होंने कानून का पढ़ाई करने से मना कर देते हैं। कुछ समय बाद वे घर छोड़कर अपनी पत्नी के साथ गोधरा चले जाते हैं। 1909 में उनकी पत्नी का कैंसर होने से मृत्यु हो जाती है जिससे उन्हें बहुत ही गहरा धक्का लगता है। सरदार पटेल अपने बैरिस्टर बनने के सपने के लिए कई वर्षों तक अपने परिवार से दूर रहे और पढ़ाई करने के अपने दोस्तों से किताबें उधार लेते। इन सब परेशानियों के बावजूद उन्होंने 36 वर्ष की आयु में Middle Temple Inn of Court,London,England से 36 वर्ष के बैरिस्टर के कोर्स को केवल 30 में पूरा किया। अपना डिग्री प्राप्त करने के बाद वह गोधरा में बैरिस्टर के रूप में प्रैक्टिस करते हैं और जल्द ही उनकी प्रैक्टिस भी पूरी हो जाती है। इसके बाद उन्हें एक बीमारी संक्रमण बीमारी का सामना करना पड़ता है। जब वह इंग्लैंड में कानून की पढ़ाई कर रहे होते हैं, तो उन्हें अंग्रेजी जीवन शैली बहुत प्रभावित करता है। इंग्लैंड से भारत आने के बाद उनका जीवन शैली पूरी तरह बदल जाता है। वे अंग्रेजी में बात करने के साथ-साथ सूट और टाइ पहनना भी शुरू कर देते हैं। उस समय वे अहमदाबाद के प्रसिद्ध वकीलों में से एक बन जाते हैं और आपराधिक मामलों को जीतने के लिए प्रसिद्ध हो जाते हैं।
सरदार पटेल का शुरू में राजनीति में कोई रुचि नहीं होता है। वे अपने मित्रों के आग्रह करने पर 1917 में नगरपालिका का चुनाव लड़ते हैं और जीत हासिल करते हैं। शुरुआत में सरदार पटेल गांधी जी के विचारों को पसंद नहीं करते हैं, परंतु जब गांधी जी ने नील क्रांति को शुरू किया, तो वे उनसे बहुत प्रभावित हुए।
1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में सूखा पड़ जाता है और खेती नहीं हो पाती। किसान अंग्रेजों से भारी छूट की मांग करते हैं, परंतु अंग्रेज सरकार उनके मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं होती है। तब वल्लभभाई पटेल किसानों को एकत्रित कर उनका नेतृत्व करते हैं और अहिंसात्मक खेड़ा आंदोलन का संचालन करते हैं। इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज सरकार को उनके आगे झुकना पड़ा और करो में छूट देना पड़ा। यह वल्लभ भाई पटेल की पहली जन आंदोलन सफलता थी। 1928 में बारडोली में इसी तरह सूखा पड़ता है और अंग्रेज 22% तक कर बढ़ा देते हैं। बारडोली के किसानों को भी सरदार पटेल का सहारा मिलता है। वे इसके आंदोलन का भी सफलतापूर्वक संचालन करते हैं। वे किसानों के साथ मिलकर सत्याग्रह करते हैं। अंग्रेज सरकार को उनके आगे विवश होना पड़ता है और किसनों को करों से मुक्त करना पड़ता है। इस आंदोलन के कारण अंग्रेज सरकार को किसानों हथियाए जमीन और जानवरों को वापस करना पड़ता है। इस आंदोलन से ही वल्लभभाई पटेल को सरदार के नाम से सम्मानित किया जाता है इसके बाद उन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम से जाना जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को शुरू किया, तब सरदार पटेल गांधी जी को संपूर्ण समर्थन करते हैं। वे अपने सभी अंग्रेज शैली के कपड़ों को फेंक देते हैं और खादी के वस्त्रों का प्रयोग करना शुरू कर देते हैं। 1920 में उन्हें गुजरात में कांग्रेस के अध्यक्ष रूप में चुना जाता है। वे 3 बार 1922, 1924 और 1927 में इस पद के लिए चुने जाते हैं और इस पद को 1945 तक संभालते हैं। 1940 के आस-पास भारत में आजादी की गतिविधियां तेजी से बढ़ने लगती है और अन्य क्रांतिकारियों के साथ सरदार वल्लभभाई पटेल को भी कई बार जेल जाना पड़ता है। लेकिन आजादी का संघर्ष चलता रहा और परिणाम स्वरूप 15 अगस्त 1947 में अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ता है। वे आजादी के बाद पहले गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री बनते हैं। उसे समय भारत आजाद तो हो गया था, परंतु समस्याएं कम नहीं थी। भारत अलग-अलग 562 देसी रियासतों में बंटा हुआ था। सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से सभी रियासतें भारत में शामिल हो जाते हैं और भारत को एक सूत्र में पिरोते हैं। वह भारत को एकजुट कर हमारे भारत के अस्तित्व को बचा लेते हैं। हमारे भारत देश को जीवन भर सेवा देने के बाद 15 दिसंबर 1950 को हार्ट अटैक से उनका मृत्यु हो जाता है। आज उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय एकता के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2018 में उन्ही के सम्मान में उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा बनाई जाती है। यह विश्व में सबसे ऊंची मर्ति है। वे आज हमारे देश के सभी लोगों के लिए बहुत बड़े प्रेरणा है।भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सफलता
आज की कहानी है हमारे पूरे भारत देश और हमें गौरवान्वित करने वाली और हमें सबसे बड़ी जीत दिलाने वाली भारतीय महिला क्रिकेट टीम की।
अब हमारी भारतीय महिला क्रिकेट टीम ICC Women's World Cup 2025 की फाइनल मैच जीतकर विश्व चैंपियन बन गई है। यह केवल एक जीत नहीं है, बल्कि एक नए युग की शुरुआत है। 2 नवंबर 2025 यह वह तारीख है जब महिला क्रिकेट टीम ने एक इतिहास रच दिया है और अपना एक नया अध्याय का शुरुआत किया है। यह देश के 146 करोड़ लोगों की सोच बदलने वाली जीत है। पूरे 52 वर्षों के लंबे प्रतिक्षा के बाद भारत की बेटियों ने वह कार्य कर दिया है जिसे लोग एक बहुत दूर का सपना मानते थे। अपने संघर्ष, आंसु, हिम्मत की आग और आलोचनाओं से बनी इस टीम ने पहली बार ODI वर्ल्ड कप जीता है। इस जीत के बाद पूरे देश में एक बार फिर से दिवाली मनाया गया। यह जीत केवल भारत की 15 महिला क्रिकेट टीम की नहीं, बल्कि यह हर उस लड़की की जीत है जिसने अपने जीवन में कुछ अलग करने का सब सपना देखा है। साथ ही यह देश के उन 70 करोड़ महिलाओं की भी जीत है जीने लोगों की रूढ़िवादी बातों का भी सामना करना पड़ता है।पहली बार महिला क्रिकेट 1973 में इंग्लैंड में खेला गया था और इंग्लैंड ने ही जीता था।उस समय कुल 7 टीमें शामिल थी और भारत उस समय इसका हिस्सा नहीं था। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार 1978 में भाग लिया था। यह भारत में ही खेला गया था, परंतु दुर्भाग्यपूर्ण भारत एक भी मैच नहीं जीत पाया। इसे ऑस्ट्रेलिया ने जीता था। 1978 ऑस्ट्रेलिया महिला क्रिकेट टीम
1993 में भारत फिर से शामिल हुआ और सेमीफाइनल तक पहुंचकर सबको चौंका दिया। इसका मेजबानी इंग्लैंड में हुआ और इंग्लैंड ने न्यूजीलैंड को हराकर दूसरी बार अपने नाम जीत दर्ज किया। 1993 इंग्लैंड महिला क्रिकेट टीम
सोमवार, 15 दिसंबर 2025
सनी देओल: कैसे एक भोले शक्ल वाले लड़के ने अपने पहले से ही फिल्म से 80 के दशक में रोमांस के सेंसेशन से उभरा और 90 का दशक आते आते भारतीय सिनेमा में एक्शन फिल्मों की परिभाषा को ही बदल दिया
आज हम जिस व्यक्ति के विषय में बात करने वाले हैं उसने न केवल अपने पहले ही डेब्यू फिल्म से लोगों के दिलों में राज किया बल्कि 90 का दशक आते-आते भारतीय सिनेमा में एक्शन फिल्मों की परिभाषा को ही बदल दिया, उनकी फिल्में लोगों के दिलों में राज करने साथ साथ बॉक्स ऑफस में गदर मचाया जिसने अपने करियर में फिल्म के सभी दौरों का अनुभव किया। हम बात करने जा रहे हैं सनी देओल की।
सनी देओलसनी देओल का फिल्म में बहुत ही अच्छा प्रदर्शन था जो लोगों के दिलों म छा गया। उन्हें इसके लिए बेस्ट एक्टर का नॉमिनेशन मिला। इसके बाद उन्होंने कई रोमांटिक फिल्में जैसे -'सनी,मंजिल मंजिल और सोनी महावील' मैं काम किया। जिनके साथ कुछ बड़े-बड़े नाम जुड़े हुए थे। वर्ष 1985 में उन्होंने राहुल रावेल के साथ फिल्म 'अर्जुन' में काम किया। यह फिल्म भी सुपरहिट साबित हुआ।
इस फिल्म मैं उन्हें एक एक्शन हीरो के तौर पर देखा गया। वह उस समय फिल्म इंडस्ट्री में बहुत ही तेजी से उभर रहे थे और इंडस्ट्री भी एक्शन की ओर झुक रही थी। वर्ष 1986 में आई फिल्म 'सल्तनत' में उन्होंने पहली बार अपने पिता धर्मेंद्र के साथ स्क्रीन शेयर किया। वह अलग-अलग फिल्मोंं के साथ लगातार आगे बढ़ रहे थे। इसकेेेे बाद उन्होंने 1989 में फिल्म 'त्रिदेव' में काम किया।इस फिल्म में वह जैकी श्रॉफ और नसीरुद्दीन शाह के साथ लीड रोल में थे। यह फिल्म भी बहुत ही सफल रहा। फिर उन्होंने एक ऐसे फिल्म में काम किया जिसकी कहानी हीरोइन के लिए लिखी गई थी। यह फिल्म थी 'चालबाज' जिसमें उन्होंने श्रीदेवी और रजनीकांत के साथ काम किया।यह फिल्म भी बहुत ही सफल रहा। यह फिल्म उन्होंने अपने पिता के द्वारा गया फिल्म 'सीता और गीता' को देख कर किया था। इतने सारे फिल्में करने के बाद उन्हें एक 'एक्शन हीरो' का पहचान तो मिल गया था लेकिन उन पर इसका टैग लगना बाकी था। ऐसे में डायरेक्टर राजकुमार संतोषी उनके जीवन में आए।राजकुमार संतोषी
उन्होंने फिल्म घायल को कमल हसन को एक लीड एक्टर के रुप में ध्यान रखते हुए लिखा था। परंतु बाद में यह फिल्म किसी कारणवश सनी देओल को मिल गया। फिल्म बनने के बाद वर्ष 1990 में यह रिलीज़ हुआ और यह फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुआ। यह सनी देओल के लिए मिल का पत्थर साबित हुआ और उन्हें अपना पहला फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला। इसके बाद उन्होंने कई एक्शन फिल्मों में काम करने के बाद अपने ऊपर एक 'एक्शन हीरो' के टैग को मजबूत कर दिया। वर्ष 1993 में फिल्म 'दामिनी' रिलीज हुई जिसमें सनी देओल के कुछ डायलॉग जैसे 'तारीख पे तारीख' और 'ढाई किलो का हाथ'पूरे फिल्म पर भारी पड़ गया।
दर्शकों के लिए इस फिल्म का मतलब ही सनी देओल बन गया। उनका शानदार आवाज और प्रदर्शन आज भी याद किए जाते हैं। वर्ष 1996 में उनकी और राजकुमार संतोषी की जोड़ी फिल्म 'घातक' के जरिए दिखा।यह फिल्म बहुत ही सुपरहिट रही। इस फिल्म का प्रत्येक सीन यादगार बन गया। उसके अगले वर्ष ज़िद्दी रिलीज़ हुई और यह भी बहुत बड़ी हिट हुई। कुछ वर्षों बाद इतने सारे सफल फिल्में देने के बाद भी उन्हें किसी बड़े फिल्म मे काम करने का मौका नहीं मिलता है। ऐसे में उन्होंने स्वयं फिल्म निर्माण करने का निश्चय किया। उन्होंने 1999 में फिल्म 'दिल्लगी' से एक नए सफर की शुरुआत की। यह फिल्म ज्यादा सफल नहीं हुई। ऐसे में उन्हें एक बड़े फिल्म की आवश्यकता थी। इसके बाद डायरेक्टर अनिल शर्मा उनके साथ आए। अनिल शर्मा
यह फिल्म वर्ष 2023 में रिलीज़ हुई और इसके फर्स्ट पार्ट की तरह ही इसको भी दर्शकों ने बहुत ही पसंद किया। इस फिल्म ने भी बहुत अच्छा रिकॉर्ड बनया।

सनी देओल और उनके दोनों बेटे
असरानी: हमारे प्रिय हास्य कलाकार
आज हम जिस व्यक्ति की बात करने जा रहे हैं, वह न केवल एक बेहतरीन हास्य कलाकार , बल्कि एक बहुत अच्छे संगीतकार भी थे। इन्होंने अपने संघर्ष के दौरान अपने जिस संस्था में एक्टिंग सिखा उसी में एक्टिंग सीखने का काम भी किया। यहां बात होने जा रही है हम सबको हंसाने वाले हास्य कलाकार असरानी जी की।
असरानी जी का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर, राजस्थान में एक सिंधी परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम गोवर्धन असरानी था। वह वह चार बहनें और तीन भाइयों में से एक थे। उनके पिताजी वर्ष 1936 में कराची से जयपुर आ गए थे। यहां उन्होंने इंडियन आर्ट कारपेट फैक्ट्री में नौकरी किया और बाद में अपना बिज़नेस करने लगे। असरानी के पढ़ाई सेंट जे़वियर स्कूल और राजस्थान कॉलेज से हुई थी। असरानी के माता-पिता चाहते थे कि वह अच्छे से पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी करें। लेकिन वहां एक अभिनेता बनने का मन बना चुके थे। उनके पिता ने इसके लिए उन्हें कभी इजाजत नहीं दी। असरानी को लगता था कि शायद उनका सपना पूरा नहीं होगा। वह बचपन से ही जयपुर में रेडियो के कार्यों से जुड़े हुए थे और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कई वर्षों तक वह रेडियो के क्षेत्र में काम करते रहे। वह अपना सपना पूरा करने के लिए मुंबई जाना चहते थे परंतु उनके पास पैसे नहीं थे। उनके एक मित्र ने जयपुर में दो नाटक किए। इन दो नाटकों के टिकट से जो पैसे मिले, मुंबई जाने के लिए उनमें से कुछ असरानी को दिया गया। मौका देखकर एक दिन असरानी अपने घर से मुंबई (तब बंबई) के लिए निकल गए।वह 1962 में मुंबई आ गए। यहां उनकी मुलाकात निर्माता, निर्देशक किशोर साहू और लेखक, निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से हुई। निर्माता किशोर साहू
डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी
उन्होंने उसे पहले पुणे के फिल्म संस्था भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्था सेटिंग का कोर्स करने की सलाह दी।असरानी ने वर्ष 1964 मैं वहां दाखिला ले लिया और 1966 में अपना कोर्स पूरा कर लिया। इसके बाद वह काम की तलाश में मुंबई आ गए। वह संघर्ष कर ही रहे थे कि उनके परिवार वाले उन्हें ढूंढते हुए वहां आ गए और असरानी को जबरदस्ती अपने साथ ले गए। परंतु असरानी का मन वहां लगा नहीं और वह मुंबई वापस आ गए। यहां आ कर वह काम की तलाश में लग गए। जब उन्हें काम ढूंढने पर भी काम नहीं मिला, तो वह वापस उसी संस्था में आ गए जहां से उन्होंने एक्टिंग सीखा था यानी भारतीय फिल्म और टेलिविजन संस्थान पुणे और बतौर एक्टिंग टीचर यहां नौकरी करने लगे। इसी दौरान ऋषिकेश मुखर्जी लेखक और डयरेक्टर गुलज़ार के साथ वहां आ पहुंचे। कवि और लेखक गुलज़ार
असरानी ने गुलजार साहब से यह पूछा कि मुखर्जी साहब यहां क्यों आए हैं,वह जवाब देते हैं कि गुड्डी को ढुंढने आए हैं। उस समय जया भादुड़ी असरानी जी की छात्रा हुआ करती थीं। गुड्डी फिल्म को बनने में अभी समय था लेकिन जया भादुड़ी को इसके लिए सिलेक्ट कर लिया गया। इस बीच असरानी को अपना पहला फिल्म 1967 में मिला। इस फिल्म का नाम था 'हरे कांच की चूड़ियां'। इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता विश्वजीत का भूमिका निभाया था।इस फिल्म से उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं मिला। उस समय असरानी अपने परफॉर्मेंस के रील उस जमाने के मशहूर डायरेक्टर एलवी प्रसाद के पास दिखाने ले गए।
असरानी ने अपने एक्टिंग से इस फिल्म में सभी का दिल जीत लिया। बाद में मुखर्जी जी ने असरानी को अपने बहुत सारे फिल्मों में मौका दिया। जिनमें 'बावर्ची, नमक हराम, अभिमान और चुपके चुपके'जैसे फिल्में शामिल हैं। असरानी ऋषिकेश मुखर्जी से अपने संबंध को लेकर कहते हैं -मैं आखिरी दिनों में अस्पताल उनके पास गया, तो वह एक कागज पर असरानी मुखर्जी लिखकर उन्हें देते हैं। वह उन्हें कहना चाहते थे कि तुम मेरे बेटे हो। धीरे-धीरे असरानी हर निर्देशक और निर्माता के पसंदीदा अभिनेता बन गए। इसके बाद असरानी मैं साउथ फिल्मों की ओर भी अपना रुख किया और और वहां का बहुत सारे निर्माता और निर्देशकों के साथ काम किया। उन्होंने साउथ की हिंदी रीमेक फिल्मों में भी विशेष भूमिका निभाया। धीरे-धीरे वह हिंदी फिल्मों के चाहिते कलाकार बन गए। इसके बाद निर्देशक और निर्माता बी आर चौपड़ा ने उन्हें फिल्म 'निकाह' के लिए साइन कर लिया।
इसमें उनका किरदार नेगेटिव था। बी आर चोपड़ा को कई लोगों ने असरानी को नेगेटिव रोल देने से मना किया था लेकिन वह अपने फैसले पर अड़े रहे। बाद में यह फिल्म सुपरहिट रही। उन्होंने लगभग सभी कामयाब लोगों के साथ काम किया। उन्होंने लगभग 400 फिल्मों में काम किया है। उन्होंनेेे कुछ फिल्में जैसे-अलाप, फूल खिलेेेेेे हैं गुलशन गुलशन, यह कैसा इंसाफ और हमारेे तुम्हारे में गानेे भी गए हैं। वह राजनीति में भी शामिल हुए और 2004 में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। उन्होंनेेे चुनावों में काफी बढ़ चढ़ हिस्सा लिया। उन्हेंं फिल्म 'शोले' में निभाए गए अपने किरदार 'अंग्रेज जमानेेेे के जेलर' के लिए हमेशा याद किया जाता है।
इसमेंं उन्होंने हमें हंसाने का काम किया था। हम सबको अपने परफॉर्मेंस से हंसाने और हमारे दिलों में राज करने के बाद 20 अक्टूबर 2025 दिवाली के दिन जुहू के आरोग्य निधि अस्पताल में अपनी अंतिम सांसें लीं।तो यह थी हमें हंसने वाले हमारे प्रिय हास्य कलाकार असरानी की कहानी।
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