कोणार्क सूर्य मंदिर : प्राचीन भारत का वह मंदिर जो खगोलीय गणनाओं और समय को मापने का अद्भुत प्रमाण है

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 हमारे देश में सैकड़ो भव्य और सुंदर मंदिर हैं जो हजारों सालों से आज भी खड़े हैं। इनका सुंदर निर्माण हमें बहुत ही आश्चर्य करते हैं। इन्हें देखकर कोई भी व्यक्ति विश्वास नहीं कर पता है कि उस समय इन विशाल मंदिरों का निर्माण कैसे हुआ होगा। इन्हीं में से एक ऐसा मंदिर है जो सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है और हमारे प्राचीन भारत के अत्यंत सुंदर भव्य निर्माण वास्तुकला और  कारीगरी का प्रमाण है। वह मंदिर है कोणार्क सूर्य मंदिर।



कोणार्क सूर्य मंदिर
 
             कोणार्क सूर्य मंदिर भारत के उड़ीसा के पुरी जिले में समुद्र तट पर पूरी शहर से लगभग 35 किलोमीटर उत्तर पूर्व में कोणार्क में चंद्रभागा नदी के तट पर भगवान सूर्य देव को समर्पित मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण पूर्वी गंगवंश के राजा 'नरसिंह देव प्रथम' द्वारा 13वीं शताब्दी में 1238 ई से 1264 ई के बीच किया गया था। कोणार्क में कोण का अर्थ दिशा और अर्क का अर्थ सूर्य होता है। यह मंदिर केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि 13वीं शताब्दी के चुंबकीय इंजीनियरिंग का एक चमत्कार है। यह मंदिर सूर्य देव का वरत है जो समय को खींचता है। ये वह धरोहर है जहां पत्थरों में समय दर्ज है। यहां सूर्य की प्रत्येक किरणें अपनी कहानी कहती है। साथ ही यहां मनुष्य की बुद्धि, श्रद्धा और कला मिलकर अमरता रचती है। यह मंदिर साधारण निर्माण वाला नहीं है। यह खगोल शास्त्र, गणित, ज्यामिती, कला और अध्यात्म का एक अद्भुत संगम है। इस मंदिर को सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया गया है। इसमें रक्त के 12 विशाल पहिए 12 महीनों को दर्शाते हैं। प्रत्येक पहिए में आठ तिल्लियां हैं जो दिन के आठ बाहर को दर्शाते हैं। यह पत्थरों में उकेरी गई एक घड़ी है जिसे सूर्य घड़ी या सन डायल कहा जाता है। मंदिर के रथ को 7 घोड़े खींचते हैं जो सप्ताह के 7 दिनों को दर्शाते हैं। रथ का मुख पूर्व दिशा की ओर बनाया गया है जहां से सूर्योदय होता है और इसकी किरणें सीधे मंदिर के गर्भगृह के मूर्ति में जाकर पढ़ती थी। इस मंदिर की हर पत्थर इतनी सटीकता से रखा गया है कि पूरा मंदिर एक विशाल यंत्र की तरह कार्य करता था। मंदिर की दीवारों पर हजारों मूर्तियां उकेरी गई है। जैसे-नृत्य, संगीत, प्रेम, ध्यान और तपस्या। जीवन के हर रूप की झलक यहां मिलती है। ये पूजा के स्थान के साथ-साथ एक जीवित ग्रंथ है जो कहता है कि जीवन एक रथ है और सूर्य उसका सार है। मंदिर के शिखर पर एक विशाल चुंबकीय पत्थर लगाया गया था। उसके नीचे लगी लोहे की मूर्तियां उसकी शक्ति से संतुलित रहती थी। साथ ही सूर्य देव की मूर्ति बिना किसी आधार के हवा में ही उड़ती रहती थी। कहा जाता है कि मंदिर का पूरा ढांचा इसी चुंबकीय संतुलन पर टिका हुआ था। ये ऐसा अद्भुत निर्माण था जैसे विज्ञान और भक्ति ने मिलकर दिव्य यंत्र बना दिया हो। लेकिन जब पुर्तगाली आक्रमणकारी उड़ीसा के तट पर आए, तो उन्होंने देखा कि उनके जहाजों के कंपास ठीक से काम नहीं कर रहे हैं।वे इस मंदिर  को ब्लैक पगोडा कहते थे। उनके अनुसार इसका कारण मंदिर का चुंबक था। इसलिए उन्होंने उस चुंबक को निकाल दिया। इसके बाद मंदिर का संतुलन टूट गया और ढांचा कमजोर हो गया। धीरे-धीरे मंदिर टूट गया और मुख्य गृह ढह गया। आज जो मंदिर खड़ा है वह केवल उस  महान कृति का एक ही हिस्सा है। इस मंदिर को UNESCO द्वारा 1984 में इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया। इस मंदिर को ₹10 के नोट में भी दिखाया गया है।

 कोणार्क सूर्य मंदिर की पौराणिक कथा

द्वापर युग में श्री कृष्ण और जाम्बवती का साम्ब नामक एक पुत्र था। वह अपने अद्भुत सुंदरता और आकर्षक व्यक्तित्व के लिए जाना जाता था। परंतु यही उनकी सबसे बड़ी निर्बलता भी थी। साम्ब को अपने सुंदरता पर अहंकार होने लगता है और वह स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है। नारद मुनि जो एक संदेश वाहक का काम करते थे, वे उसे उकसाते हैं। वे उसे अपना अद्भुत सौंदर्य गोपियों के बीच दिखाने के लिए कहते हैं। साम्ब अहंकार में आकर अपना सौंदर्य गोपियों के बीच दिखाने के लिए चले जाते हैं। उनके पिता श्री कृष्ण को यह अच्छा नहीं लगता है। श्री कृष्ण उन्हें अपना मर्यादा तोड़ने के लिए कुष्ठ रोग से ग्रसित होने का श्राप दे देते हैं। श्राप का प्रभाव उन पर तुरंत होने लगता है और उनके शरीर पर भयंकर फोड़े फुंसी और घाव हो जाते हैं। साम्ब अपने कष्ट से मुक्त होने के लिए अनेक ऋषियों के पास जाते हैं, परंतु उन्हें अपना कष्ट का उपचार कहीं नहीं मिलता है। अंत में वह महर्षि कटक से मिलते हैं। महर्षि कटक उन्हें अपने कष्ट से मुक्त होने के लिए मित्रवन के तट पर चंद्रभागा नदी के किनारे सूर्यदेव का कठोर तपस्या करने के लिए कहते हैं। साम्ब 12 वर्षों तक अन्न जल का त्याग कर कठोर तप में लग जाते हैं। साम्ब के कठोर तपस्या से सूर्य देव उनसे प्रसन्न होते हैं और उन्हें दर्शन देते हैं। सूर्य देव के आशीर्वाद से उनका कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है और  उनका शरीर पहले जैसा सुंदर हो जाता है। साम्ब उनका आभार व्यक्त करने के लिए एक भव्य मंदिर बनाने का संकल्प करते हैं। वह उसी स्थान पर एक सूर्य मंदिर का निर्माण करते हैं जहां उन्होंने तपस्या किया था। इस पौराणिक कथा से इस स्थान को कोणार्क नाम मिला। 
          क्लॉडियस टॉलेमी ने दूसरी शताब्दी में इस मंदिर का कन्नागर के नाम से उल्लेख किया है जो उस समय एक प्रसिद्ध बंदरगाह था। भारतीयों के उल्लेख में से इसे काइनापारा के नाम से जाना जाता है।
           सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के अनुसार उस समय कोणार्क में कई भव्य भवन थे। यह स्थान कई संप्रदायों के लोगों का संगम था।

आज के कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण

कुछ इतिहासकार के अनुसार आज का जो कोणार्क सूर्य मंदिर है वह चौथी बार निर्मित हुआ है। आज के सूर्य मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में गंगवंश के राजा नरसिंह देव प्रथम द्वारा किया गया था। इसके पीछे भी एक प्रेरणादायक कहानी है। 
           13वीं शताब्दी में राजमाता कस्तूरी देवी अपने पुत्र 'राजा नरसिंह देव प्रथम' से मिलकर सूर्य देव के विषय में कहते हैं। वे उन्हें याद दिलाते हैं कि उनके पिता ने जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया था जो भक्ति और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। वे उन्हें उसी तरह से सूर्य देव का एक ऐसा मंदिर बनाने को कहते हैं जो सूर्य देव की महिमा को सदैव जीवित रखे। साथ ही गंगवंश के वैभव और शक्ति का प्रतीक बना रहे। राजमाता का यह आग्रह धार्मिक आस्था का परिचायक के साथ साथ गंगवंश के गौरव को पूरे विश्व जगत में प्रदर्शित करने का संकल्प भी था। राजा नरसिंह देव प्रथम कोणार्क में सूर्य देव के सात घोड़ों वाले रथ के प्रतीकात्मक स्वरूप में अद्वित्य भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लेते हैं। वे इस मंदिर के निर्माण के लिए अपने मंत्री से सबसे श्रेष्ठ वास्तुकार खोजने के लिए कहते हैं। मंत्री उस समय के श्रेष्ठ वास्तुकार और कुशल शिल्पकार विशु महाराणा को चुनते हैं। राजा के आदेश पर चंद्रभागा नदी के किनारे मंदिर के निर्माण की शुरुआत होती है। इस मंदिर का निर्माण 1238 ई से 1264 ई के बीच होता है। मंदिर के निर्माण में 12 वर्ष का समय लगता है। इसमें 1200 कारीगर मिलकर मंदिर के अद्भुत संरचना को आकार देते हैं। विशु महाराणा के कुशलता और निपुणता उस समय के इंजीनियरिंग का जीवंत प्रमाण को दर्शाते हैं। वे अपने टीम के साथ मिलकर मंदिर को बलुआ पत्थरों से तैयार करते हैं। उस समय इन पत्थरों को जोड़ने में लोह प्लेट का उपयोग हुआ है। इसे आज हम आधुनिक आयरन लॉक सिस्टम कहते हैं। यह तकनीक उस समय के कारीगरों का उन्नत इंजीनियरिंग के ज्ञान को दर्शाती है।
साथ ही उनके तकनीकी रूप से सक्षम और बुद्धिमत्ता को दर्शाती है। मंदिर निर्माण के आखिरी पड़ाव में शिखर पर कलश स्थापित करने का बारी आता है। कारीगर इसके लिए कई बार प्रयास करते हैं, परंतु वे असफल हो जाते हैं। राजा नरसिंह देव प्रथम उनके इस सफलता को देखकर क्रोधित हो जाते हैं। वे कारीगरों को आदेश देते हैं कि यदि सूर्य उदय से पहले मंदिर मैं कलश स्थापित नहीं हुआ, तो वे उन्हें मृत्युदंड देंगे। उनका यह बाते सुनकर कारीगर भय से उदास हो जाते हैं। मुख्य शिल्पकार विशु महाराणा के कंधे पर  बहुत बड़ा उत्तरदायित्व आ जाता है। उसी समय उनका 12 वर्ष का पुत्र धर्मपद वहां उनसे मिलने आता है। धर्मपद जन्म के बाद इन 12 वर्षों में अपने पिता विशु महाराणा को कभी भी नहीं देखा होता है। वह अपने मां से आदेश लेकर वहां आया हुआ होता है। वह अपने पिता और कारीगरों को परेशान देखता है। उसे पता चलता है कि मंदिर के शिखर पर कलश नहीं लगने से वे सभी परेशान हैं। वह अपने पिता से कहता है कि वह यह कार्य कर सकता है। वह अपने पिता से आदेश लेकर रात के अंधेरे में धीरे-धीरे मंदिर के शिखर पर चढ़कर कलश स्थापित कर देता है। यह वह कार्य था जिसे कुशल कारीगर 12 वर्षों से नहीं कर पा रहे थे। परंतु एक छोटे से बालक ने कुछ ही घंटों में कर दिया। उस समय धर्मपद को लगता है कि अगर राजा को पता चला कि वह कार्य एक 12 वर्ष के बालक ने किया है, तो राजा कारीगरों को अयोग्य समझकर  उन्हें दंडित करेंगे। अपने पिता और कारीगरों का प्राण बचाने के लिए वह चंद्रभागा नदी में कूद कर अपना प्राण दे देता है। जब राजा सुबह आकर शिखर पर कलश को स्थापित और सूर्य देव की मूर्ति को हवा में उड़ते हुए देखते हैं, तो वे बहुत ही प्रसन्न होते हैं। वे मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के लिए माघ शुक्ल सप्तमी का दिन तय करते हैं। मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा जैसे ही पूरा होता है, तो कुछ घटनाएं होने लगती है। सबसे पहले मंदिर के ऊपर से एक बड़ा मूर्ति नीचे गिरकर टूट जाता है। फिर मंदिर के पत्थर स्वयं गिरने लगते हैं। राजा को जब यह पता चलता है कि मंदिर का पहला दिन एक छोटे से बालक की मृत्यु से शुरू हुआ है, तो वे इसे अशुभ मानते हैं और मंदिर में पूजा अर्चना को रोक देते है। वर्षों तक यह मंदिर बंद होकर वीरान होने लगता है और इसके आसपास घने जंगल उग जाते हैं।
         मुगल दरबारी के लेखक अबुल फजल द्वारा पारसी में लिखा गया पुस्तक 'आइन ए अकबरी' जो उन्होंने 1598 में पुरी की थी, में उन्होंने कोणार्क सूर्य मंदिर के समृद्ध और आश्चर्यचकित करने वाले कारीगरी के बारे में बताया है। उनके इस पुस्तक से यह पता चलता है कि 16वीं शताब्दी में यह मंदिर ठीक था और इसमें पूजा अर्चना भी होती थी।
           धीरे-धीरे विदेशी आक्रमणकारियों के कारण यह मंदिर टूट गया और इसने अपने समृद्धि को खो दिया। आज केवल मंदिर का एक ही हिस्सा बचा हुआ है, परंतु वह भी 122 साल से बंद है। कहा जाता है कि 1903 में, जब अंग्रेजों का शासन था उस समय अंग्रेज अफसरों ने इस ऐतिहासिक मंदिर का दौरा किया था। उन्हें मंदिर की स्थिति को देखकर ऐसा लगा कि यह मंदिर जल्द ही टूट सकती है। इसलिए उन्होंने इसे बचाने के लिए मंदिर के गर्भगृह को रेत से भरवा दिया और मंदिर के सभी दरवाजों को बंद करवा दिया। गवर्नर का ऐसा तर्क था कि रेत मंदिर का भार संभाल लेगा और मंदिर सुरक्षित रहेगा। उस समय यह कदम सही माना गया। तब से यह मंदिर आज भी बंद है। परंतु वर्ष 2022 में आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ़ इंडिया द्वारा एक योजना बनाया गया जिसके तहत इस मंदिर के नवीनीकरण और इसके अंदर से रेत हटाने का काम शुरू किया गया। यह कार्य अभी भी जा रही है।

कोणार्क सूर्य मंदिर की विशेषताएं 

निर्माण - कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1238 ई से 1264 ई के बीच हुआ था। मुख्य आर्किटेक्चर बिशु महाराणा ने 1200 कारीगरों के साथ मिलकर 12 वर्षों तक इस मंदिर का निर्माण किया था। इस मंदिर को बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट और कीमती धातुओं से बनाया गया था।

चुंबकीय गुंबद - इस मंदिर के गुंबद का निर्माण चुंबक का उपयोग करके किया गया था। इसके शिकार पर एक 52 टन का चुंबकीय पत्थर लगाया गया था। इसके कारण नीचे लगी मूर्तियां संतुलित रहती थी। साथ ही सूर्य देव की मूर्ति बिना किसी आधार के जमीन को बिना छुए हवा में ही रहती थी। इस मंदिर को पहले 5 भागों में बनाया गया था जिसमें से आज केवल एक ही भाग बचा है।
संपूर्ण मंदिर
मंदिर का लेआउट कोणार्क सूर्य मंदिर करीब 12 एकड़ में फैला हुआ है जिसमें सबसे पहले नाट मंदिर है जहां देवदासी अपना नृत्य करती थी। दूसरा था प्रार्थना मंदिर जहां सारे भक्त लोग बैठकर प्रार्थना करते थे। तीसरा था मेन मंदिर जिसे वीमाना बोला जाता था। चौथा था अच्छा देवी मंदिर और पांचवा था माया देवी मंदिर। छाया देवी और माया देवी सूर्यदेव की दो पत्नियां थी।

सूर्य घड़ी या सन डायल - कोणार्क का मंदिर एक घड़ी की तरह भी बना हुआ है। मंदिर के रथ में बना हुआ 24 पहिए एक प्राकृतिक घड़ी की तरह कार्य करता है। इसमें जब सूर्योदय होता है यानी शुक्ल पक्ष का समय होता है, तो मंदिर के बाएं तरफ से बिल्कुल सटीक समय का अनुमान लगाया जा सकता है। जब सूर्य अस्त यानि कुष्टम पक्ष का समय होता है, तो इसका अनुमान मंदिर के दाएं तरफ से किया जा सकता है। जब सूर्य उदय होता है, तो अगर आप इस रात के पहिए के बीच में कोई स्केल रखते हैं, तो उसकी परछाई उस पहिए की अलग-अलग तिल्लियों पर पड़ती हैं और वह बिल्कुल सटीक समय बताता है। यह घड़ी एक एंटी क्लाक वाइज मानी जाती है, क्योंकि जब भी सूर्य की किरण पड़ती है, तो उसकी परछाई नीचे बनती है।
सूर्य घड़ी 

अष्टधातु की मूर्ति -  जैसा कि दिन में 8 पहर होते हैं। इन्हीं 8 पहरों के अनुसार इस मंदिर में अलग-अलग चमत्कार होते थे। सबसे पहला पहर यानी जब सूर्य उदय होता है, तब ऐसा माना जाता है कि उस समय सबसे पहला किरण मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करता था और अष्ट धातु के मूर्ति पर पढ़ती थी। अष्टधातु की मूर्ति पर पहली किरण पड़ने के बाद उस मूर्ति से रिफ्लेक्ट होती थी जिससे भक्त जनों को ऐसा लगता था जैसे सूर्य अष्टधातु की मूर्ति से उदय हो रहा हो। सूर्य मन्दिर के इस चमत्कार को सबसे पहले पहर में ही देखा जा सकता है। परंतु सूर्य मंदिर टूटने के बाद अब वहां ऐसा नहीं होता है। 

8 पहर - पहले पहर(6 AM, 7 AM, 8 AM) में सूर्य की किरणें गर्भ गृह में प्रवेश करती थी। जो प्रभात सूर्य को छुती होती है। दूसरा पहर(9 AM, 10 AM, 11 AM) दक्षिण सूर्य को प्रवेश करती है। तीसरा पहर (12 PM,1 PM,2 PM) मध्य सूर्य को छुती है। चौथा पहर(3 PM,4 PM,5 PM) अष्ट सूर्य को छुती है। दिन के 4 पहर बहुत ही विशेष होते हैं। सूर्य मंदिर का आर्किटेक्चर इस तरह से बनाया गया था कि इसके सबसे पहले पहर में सूर्य की रोशनी अष्ट धातु की मूर्ति पर पड़ती थी। दूसरे पहर में सूर्य की रोशनी दक्षिण दिशा में बसे सूर्य देव की मूर्ति पर पढ़ती थी। इसके तीसरे पहर की रोशनी मध्य सूर्य देव की मूर्ति पर पड़ती थी। और इसके चौथे पहर की रोशनी अष्ट सूर्य देव की मूर्ति पर पढ़ती थी।

वास्तु शास्त्र - पहले पूरे सूर्य मंदिर में तीन प्रवेश द्वार होते थे जिसमें पहला द्वार पूर्व दिशा में और बाकी दो प्रवेश द्वार उत्तर और दक्षिण दिशा में है। ऐसा माना जाता है कि यह वास्तु शास्त्र के अनुसार बना है जिसमें उत्तरी-पूर्वी में रसोईघर और कुंआ बना था। इसका दक्षिण द्वार (अशोक द्वार) ज्ञान का द्वारा होता था। इसका उत्तरी द्वार हाथी गेट होता था जिसे धन यानी लक्ष्मी का गेट भी कहा जाता है। 

द्वारपाल - किसी भी हिंदू मंदिर के द्वार में एक द्वारपाल की मूर्ति देखा जा सकता है। जैसे-शिव जी के मंदिर के सामने नंदी की मूर्ति और किसी माता के मंदिर के सामने शेर या हाथी की मर्ति। ऐसे ही कोणार्क सूर्य मंदिर के सामने जो द्वारपाल की मूर्ति है उसमें एक साथ 3 प्रतिमाएं हैं जिसमें पहली प्रतिमा एक मनुष्य की, दूसरी एक शेर की और तीसरी एक हाथी की है। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण करने वाले ने राजा नरसिंह देव प्रथम के नाम पर ही यह द्वारपाल बनाया था जिसमें पहले है मनुष्य यानि नर, दूसरा है सिंह यानि शेर और तीसरा है हाथी यानी देव। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का द्वारपाल तीन धर्मों को दर्शाता है जिसमें पहले मनुष्य सनातन धर्म को, दूसरा हाथी बौद्ध धर्म को और तीसरा शेर हिंदू धर्म को दर्शाता है। साथ ही इस द्वारपाल का अर्थ यह भी है कि जब मनुष्य के पास धन संपत्ति अधिक हो जाती है, तो उसमें अहंकार होने पर उसका पतन हो जाता है।
द्वारपाल का प्रतिमा
संस्कार और सस्कृति - कोणार्क सूर्य मंदिर के बाहर बहुत सारी प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं जो उसे समय के अनुसार बहुत ही अद्भुत संरचना है। इन्हीं प्रतिमाओं में एक हाथ जोड़ने वाली प्रतिमा देखने को मिलती है और हमारी संस्कृति में अलग-अलग नृत्य कला देखने को मिलती है। जैसे -भरत नट्यम, कुचिपुड़ी और उड़ेय। ये सारी प्रतिमाएं हमारे भारत के संस्कार और संस्कृति को दर्शाती है।

श्रृंगार - सूर्य मंदिर में आगे बढ़ते हुए और भी प्रतिमाएं देखने को मिलती है जिसमें से एक है श्रृंगार करती हुई प्रतिमा। उस जमाने में यह समझाया गया है कि महिलाएं किस तरह से श्रृंगार करती है, किस तरह के कपड़े पहनती है और किस तरह के आभूषण पहनती है। कैसे वे अपने पतियों का प्रतीक्षा करती है, खाना बनाती है और बाकी काम कैसे करती हैं।

नाट मंडप - सूर्य मंदिर में अंदर जाने पर सबसे पहला भवन नाट मंडप ही दिखेगा। ऐसा कहा जाता है कि यह वह जगह है जहां उस जमाने में दास-दासियां नृत्य किया करती थी। पहले इस जगह की ऊंचाई 90 फुट था, परंतु आज के समय यह जगह केवल 35 फुट है। इस जगह पर सूर्य देव की अष्टधातु की मूर्ति को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 

आधुनिक कला - कोणार्क सूर्य मंदिर में और भी कई प्रतिमाएं देखने को मिलती है। इन्हीं प्रतिभाओं में उस सदी में आज का आधुनिक जमाने में औरतों के कई तरह के श्रृंगार भी दर्शाएं गए हैं। जैसे - आज के जमाने में उपयोग किया जाने वाले हाई हील्स, हेयरस्टाइल, विभिन्न प्रकार के हैंडबैग, मेकअप लिपस्टिक और औरतों के बीच की लड़ाइयां। 

7 घोड़ों का रथ - कोणार्क सूर्य मंदिर को देखने पर वह एक रथ की तरह दिखता है जहां सामने की तरफ 7 घोड़े बंधे हुए दिखते हैं। ये 7 घोड़े सूर्य भगवान के रथ को दर्शाते हैं। ये 7 घोड़े 24 पहियों का रथ खींच रहे हैं जिसमें भगवान सूर्य देव विराजमान हैं। इसके 12 पहिए दाएं तरफ और 12 पहिए बाएं तरफ स्थित है। यह मंदिर अब टूट चुका है इसलिए ये सातों घोड़ें नहीं देखा जा सकता है।


सारथी - चूंकि सूर्यदेव का यह मंदिर एक रथ की तरह दर्शाया गया है, तो इस रथ का एक सारथी वाला मूर्ति भी था। सूर्यदेव का सारथी गरुड़ को माना जाता है जिनका एक स्तंभ सूर्य भगवान के सामने लगा था। इसे 'अरुणा स्तंभ' कहा जाता था। इस स्तंभ को 18 वीं शताब्दी में मराठा ब्रह्मचारी गोस्वामी ने यहां से हटवा कर जगन्नाथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगवा दिया। यह स्तंभ वहां आज भी है।
अरुणा स्तंभ
जीवन चक्र - सूर्य मंदिर के पहियों में जीवन चक्र को भी बताया गया है। इसमें दिन के आठ पहरों को बिताने के बारे में दिखाया गया है जिसमें सबसे पहले सुबह उठकर नहा धोकर शिकार पर निकलना, फिर वापस आने पर घर की महिलाओं का प्रतीक्षा करना, फिर सोना शामिल है।

समुद्र मंथन - सूर्य मंदिर की दीवारों में समुद्र मंथन का प्रतिमा भी बना हुआ है। जब देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन करके अमृत और विष निकला था। वह दृश्य सूर्य मंदिर की दीवारों पर देखने को मिलता है। 


अन्य कलाएं - पुराने जमाने में नई दुल्हन को लोगों द्वारा पालकी में ले जाते हुए और भगवान विष्णु का नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध करते हुए प्रतिमा को भी दिखाया गया है।

आयरन लॉक सिस्टम - जब सूर्य मंदिर का निर्माण हुआ था उस समय सीमेंट का आविष्कार नहीं हुआ था। इसलिए सूर्य मंदिर का निर्माण पत्थरों को तोड़कर, उसकी नक्काशी कर और इन पत्थरों को लोहे की एक अद्भुत आयरन सिस्टम से जोड़कर किया गया है। इन लोहे में कभी भी जंग नहीं लगती थी और न इनका सिस्टम ढीला पड़ता था। मंदिर के टूटे हुए हिस्सों से कुछ लोहे को निकाल कर आज भी मंदिर में रखा गया है। ये लोहे आज भी साढ़े आठ सौ सालों से पड़ा है और इन पर अभी भी जंग नहीं लगा है। ये लोहे आज के लोहे से ज्यादा ताकतवर है।

छाया और माया - सूर्य मंदिर के पीछे वाले हिस्से में दो और मंदिर बने हुए हैं। इसमें सबसे पहला मंदिर छाया देवी का है और दूसरा माया देवी का। ये दोनों सूर्य देव जी की पत्नियां मानी जाती है। ऐसा कहा जाता है जहां प्रकाश होगी वहां छाया और माया जरूर होगी। छाया को सूर्य भगवान का प्रतिबिंब और माया को सूर्य भगवान का प्रतिरूप माना जाता है।

कमल, शंकर और सूर्य - उड़ीसा के तीन मंदिर भुवनेश्वर, पुरी और कोणार्क को मिलाकर गोल्डन ट्रायंगल कहा जाता है। कोणार्क सूर्य मंदिर में हर मंदिर का अपना एक खास डिजाइन बना है। कोणार्क सूर्य मंदिर में कमल का डिजाइन देखने को मिलता है, पुरी जगरनाथ मंदिर में शंकर का डिजाइन देखने को मिलता है और भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर में सूर्य का डिजाइन देखने को मिलता है। 

 मंदिर का दरवाजासूर्य मंदिर के मैन एंट्री में जो दरवाजा लगा हुआ था वह आज टूट चुका है, परंतु टूटा हुआ दरवाजा सूर्य मंदिर के सामने रखा देखा जा सकता है। इस दरवाजे की विशेषता यह थी कि उस समय बिना बिजली के यह दरवाजा ऑटोमेटिक खुलती और बंद होती थी। क्योंकि यह दरवाजा ग्रेनाइट का बना था। इसके अंदर आवाज और हवा पार होने की जगह भी थी।


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