आज हम एक ऐसे देश के बारे में जानेंगे, जो विश्व के मानचित्र पर क्षेत्रफल की दृष्टि से भले ही छोटा है, परंतु विश्व के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक माना जाता है। इस देश के लोगों ने हजारों वर्षों के इतिहास में कठिनाइयों, उत्पीड़न और संघर्षों का सामना किया है। अपने अस्तित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए उन्होंने लंबे समय तक संघर्ष किया है। यह देश है- इज़राइल।
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इज़राइल देश की जानकारी (Israel Country Information)
परिचय
इज़राइल मध्य-पूर्व में स्थित एक छोटा किंतु बहुत ही शक्तिशाली और विकसित देश है। यह पूरे विश्व में एक मात्र यहूदी देश है। इसकी जनसंख्या लगभग एक करोड़ से अधिक है। यह बहुत छोटा होने के बावजूद अपनी उन्नत तकनीकी, सैन्य शक्ति, कृषि विकास और धार्मिक महत्व के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इसके यहूदी धर्म का इतिहास लगभग 4,000 वर्ष पुराना है। यहां यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीन प्रमुख धर्मों के अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल स्थित है। यह देश इतिहास, राजनीति और धर्म तीनों दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस देश में अधिकांश यहूदी पुरुषों और महिलाओं के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है, जिससे देश की रक्षा व्यवस्था अत्यंत मजबूत बनी रहती है। इसलिए इज़राइल के अधिकांश नागरिकों को सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त होता है। इसकी राजधानी यरूशलेम है। इतिहास और प्राचीन ग्रंथो के अनुसार यह देश ईसाई, इस्लाम और यहूदी- तीनों धर्मों के इतिहास और धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां की प्रमुख भाषा हिब्रू है। यहां के निवासियों को इज़रायली कहा जाता है। आज इज़रायल तकनीक, विज्ञान और रक्षा के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में से एक है।
इज़राइल का इतिहास(Israel History)
इज़राइल और यहूदी सभ्यता का इतिहास 4000 वर्ष प्राचीन माना जाता है। लगभग आज से 4000 वर्ष पहले मेसोपोटामिया विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक थी।
वहां उस समय मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ करता था। वहां के लोग उस समय अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे और एकेश्वरवाद का व्यापक प्रचार नहीं हुआ था। वहां के लोग मिट्टी के घरों में रहते थे। इसी सभ्यता में एक ऐसे व्यक्ति का जन्म होता है जो सभी के धार्मिक विचार को बदल कर रख देता है। वह व्यक्ति थे हज़रत इब्राहिम। लगभग 3800 वर्ष पहले उर शहर में हज़रत इब्राहिम का जन्म होता है। वे अपने समय में फैली मूर्ति पूजा को नकार कर एक ईश्वर की बात करते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर को समझने के लिए मूर्ति की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि पवित्र हृदय की आवश्यकता होती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार उन्हें ईश्वर की ओर से संदेश मिलता है कि वे अपनी ज़मीन छोड़कर ऐसे ज़मीन पर जाएं जिसे उनके वंशजों के लिए चुना गया है। तब वे अपनी जमीन छोड़कर ऐसी जगह पहुंचते हैं जिसे आज इज़राइल और फिलिस्तीन कहा जाता है। उस समय इन्हें कनान की भूमि या लैंड आफ केनन कहा जाता था। इसमें पहले लेबनान, सीरिया के कुछ हिस्से और जॉर्डन के कुछ हिस्से भी शामिल थे।
वहां उस समय मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ करता था। वहां के लोग उस समय अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे और एकेश्वरवाद का व्यापक प्रचार नहीं हुआ था। वहां के लोग मिट्टी के घरों में रहते थे। इसी सभ्यता में एक ऐसे व्यक्ति का जन्म होता है जो सभी के धार्मिक विचार को बदल कर रख देता है। वह व्यक्ति थे हज़रत इब्राहिम। लगभग 3800 वर्ष पहले उर शहर में हज़रत इब्राहिम का जन्म होता है। वे अपने समय में फैली मूर्ति पूजा को नकार कर एक ईश्वर की बात करते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर को समझने के लिए मूर्ति की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि पवित्र हृदय की आवश्यकता होती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार उन्हें ईश्वर की ओर से संदेश मिलता है कि वे अपनी ज़मीन छोड़कर ऐसे ज़मीन पर जाएं जिसे उनके वंशजों के लिए चुना गया है। तब वे अपनी जमीन छोड़कर ऐसी जगह पहुंचते हैं जिसे आज इज़राइल और फिलिस्तीन कहा जाता है। उस समय इन्हें कनान की भूमि या लैंड आफ केनन कहा जाता था। इसमें पहले लेबनान, सीरिया के कुछ हिस्से और जॉर्डन के कुछ हिस्से भी शामिल थे।
Land of Canaan
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धार्मिक परंपराओं के अनुसार, हज़रत इब्राहिम के दो प्रमुख पुत्र होते हैं- इसहाक और स्माइल। इस्माइल के वंश में आगे चलकर लगभग 2300 वर्ष पश्चात पैगंबर मोहम्मद का जन्म होता है जो इस्लाम धर्म का संदेश देते हैं।
इसहाक का पुत्र जेकब होता है जिसे याकूब या इज़राइल भी कहा जाता है। इसके 12 पुत्र होते हैं जो कनान की भूमि में 12 जनजातियों की स्थापना करते हैं। इन्हें इज़रायल की 12 जनजातियां कहा जाता है। आगे चलकर इन्हीं जनजातियों से इज़राइल और यहूदा जैसे राज्यों का विकास होता है। इन 12 पुत्रों में सबसे महत्वपूर्ण पुत्र यहूदा होता है। समय के साथ यहूदा राज्य के लोगों को ही यहूदी कहा जाता है।
उस समय यहूदियों पर बहुत बड़ा अकाल आ जाता है। उनके क्षेत्र की नदियां सूख जाती है और भूमि भी सूख जाती है जिससे खाद्य पदार्थों की भी कमी हो जाती है। साथ ही आसपास के पड़ोसी देश भी उन पर बार-बार आक्रमण करने लगते हैं। इस कारण यहूदी लोग मिस्र की ओर पलायन करने लगते हैं। मिस्र की नील नदी वर्ष भर बहती थी और समानत: नहीं सुखती थी। उस समय यहूदियों को लगता है कि उनके लिए वह स्थान अधिक सुरक्षित और समृद्ध होगा। समय के साथ यहूदी लोग वहां परिश्रम करके अपनी जगह बनाते हैं। वे इतने बुद्धिमान थे कि कम समय में ही वे मिस्र की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने लगते हैं। उनकी समृद्धि बढ़ने लगती है। मिस्र के राजा फराओ यह देख कर चिंतित होने लगता है कि उनके राज्य में यहूदी शरणार्थियों की आबादी बढ़ती जा रही है और कल ये लोग उनके राज्य में कब्जा भी कर सकते हैं। अपने उसी भय के कारण वह सभी यहूदियों को मारने का आदेश दे देते हैं और उन्हें गुलाम बना दिया जाता है। उन्हें पर्याप्त भोजन और पानी दिए बिना प्रताड़ित कर उनसे काम करवाया जाता है। इससे मिस्र में यहूदियों की स्थिति बहुत दुखदायी हो जाती है। उस समय वहां एक यहूदी परिवार में 'हज़रत मूसा' का जन्म होता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, वे अपने समाज के लोगों को प्रताड़ित होते देखकर मिस्र में बचे यहूदी लोगों को एकत्रित करते हैं और कई कठिनाइयों का सामना करके उन सबको वापस अपनी पुरानी ज़मीन इज़राइल ले आता है। मिस्र से इज़राइल तक की यात्रा आसान नहीं था, परंतु हज़रत मूसा यह संभव करके दिखाते हैं। उनके उसी कार्य से यहूदियों में हज़रत मूसा का बहुत सम्मान किया जाता है। यहूदी लोग इज़राइल वापस आकर नए सिरे से अपने जीवन की शुरुआत करते हैं। इस दौरान हज़रत मूसा यहूदी लोगों को ईश्वर के 10 उपदेश बताते हैं। वह उन उपदेशों को एक पत्थर पर भी लिखवाता है जिससे यहूदी लोग उन्हें भूले नहीं और यहूदी आज भी उन उपदेशों का पालन करते हैं। इससे यहूदी समाज में एकता और धार्मिक अनुशासन को मजबूती मिलती है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, वे अपने समाज के लोगों को प्रताड़ित होते देखकर मिस्र में बचे यहूदी लोगों को एकत्रित करते हैं और कई कठिनाइयों का सामना करके उन सबको वापस अपनी पुरानी ज़मीन इज़राइल ले आता है। मिस्र से इज़राइल तक की यात्रा आसान नहीं था, परंतु हज़रत मूसा यह संभव करके दिखाते हैं। उनके उसी कार्य से यहूदियों में हज़रत मूसा का बहुत सम्मान किया जाता है। यहूदी लोग इज़राइल वापस आकर नए सिरे से अपने जीवन की शुरुआत करते हैं। इस दौरान हज़रत मूसा यहूदी लोगों को ईश्वर के 10 उपदेश बताते हैं। वह उन उपदेशों को एक पत्थर पर भी लिखवाता है जिससे यहूदी लोग उन्हें भूले नहीं और यहूदी आज भी उन उपदेशों का पालन करते हैं। इससे यहूदी समाज में एकता और धार्मिक अनुशासन को मजबूती मिलती है।
लगभग 1020 ई.पू. इज़रायली (हिब्रू) जनजातियों के एकीकृत राज्य की स्थापना होती है और राजा सौल उसके पहले राजा बनते हैं। फिर लगभग 1000 ई.पू. राजा डेविड इज़राइल का दूसरा राजा बनता है। वह अपनी बहादुरी से यहूदियों का नाम ऊंचा करता है और यरूशलेम को इज़राइल की राजधानी बनाते हैं। वह 12 कबीलों को मिलाकर और मजबूत राष्ट्र बनाता है। इसके बाद लगभग 965 ई.पू. राजा सोलोमन इज़राइल का नया राजा बनता है। इज़राइल के इतिहास में उनका शासन काल सबसे स्वर्णिम युग माना जाता है। उस काल में उन्हें विश्व के सबसे बुद्धिमान और महान राजाओं में से एक माना जाता था। क्योंकि 960 ई.पू. वे यरूशलेम के सबसे ऊंची चोटी पर टेंपल माउंट प्रथम यहूदी मंदिर का निर्माण करवाते हैं। इसे यहूदियों का पहला मंदिर या सोलोमन मंदिर भी कहा जाता है। यह कोई साधारण मंदिर नहीं था, बल्कि यहूदियों के आस्था का केंद्र था। इसे बनाने के लिए विश्व के उच्च गुणवत्ता वाले, देवदार की लकड़ी और बड़ी मात्रा में सोने का उपयोग किया गया था। उस समय अनेक राज्यों और क्षेत्रों से लोग इसकी भव्यता को देखने के लिए यरूशलेम आते थे। इसके अंदर हज़रत मूसा द्वारा पत्थर पर लिखवाए गए 10 उपदेशों को भी रखवाया गया। वही जगह बाद में ईसाइयों और मुसलमानों का पवित्र स्थल बनता है। इसे लेकर आज वर्तमान समय में काफी विवाद होता है। इसी मंदिर में राजा सोलोमन लोगों को न्याय देते थे। उस समय इज़राइल में काफी सुख समृद्धि था। लगभग 931 ई.पू. राजा सोलोमन की मृत्यु के बाद राज्य दो भागों में विभाजित हो जाता है- उत्तरी राज्य इज़रायल और दक्षिणी राज्य मसूदा(जूडाह)।
इसके बाद लगभग 720 ई.पू. एक असीरियाई
साम्राज्य हुआ करता था। यह साम्राज्य इज़राइल पर हमला कर देता है और अनगिनत यहूदियों को मार कर उन्हें अपना गुलाम बना लेता है। साथ ही इज़रायल के कई हिस्सों में भी कब्जा कर लेता है।
इसके बाद यरुशलम की घेराबंदी Siege of Jerusalem की घटना होती है। लगभग 586/587 ई.पू. बेबीलोन साम्राज्य इज़राइल(यहूदा राज्य) पर आक्रमण करता है। कई महीनों तक चली घेराबंदी के बाद यरुशलम पर कब्जा कर लिया जाता है।
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इस आक्रमण के बाद अनेक यहूदी मारे जाते हैं और बड़ी संख्या में यहूदियों को बेबीलोन निर्वासित कर दिया जाता है।
इससे यहूदी लोग इज़राइल छोड़कर दूसरे देशों में भागने लगते हैं। उस समय कुछ यहूदी लोग भाग कर भारत तक भी आ जाते हैं। बेबीलोन 4 वर्षों के भीतर यरुशलम शहर को नष्ट कर देता है, अनगिनत यहूदियों को मार देता है और यहूदियों का पवित्र स्थल टेंपल माउंट को भी तोड़ देता है। इज़राइल में बचे यहूदियों के पैरों में बेड़ियां बांधकर उन्हें बेबीलोन ले जाया जाता है और उनसे वहां गुलामी करवाया जाता है। इसी को 'Siege of Jerusalem' कहा जाता है। इस घटना के बाद मसूदा राज्य का पतन हो जाता है।
इसके बाद ईरान के हिस्से में पर्शियन साम्राज्य का उदय होता है। इसका नींव राजा साइप्रस द ग्रेट रखता है। वह बेबीलोन, मिस्र और यूरोप के कुछ हिस्सों को जीतकर एक बड़ा पर्शियन साम्राज्य बनाता है। वह 516 ई.पू. में बेबीलोन के यहूदियों को स्वतंत्र कर देता है और उन्हें इज़राइल वापस जाकर यरुशलम में फिर से अपना मंदिर बनाने को कहता है। इस तरह से यहूदी लोग वापस इसराइल आकर यरुशलम में जिस स्थान पर उनका पवित्र मंदिर तोड़ा गया था उसे पुनः निर्माण कर करते हैं जिसे दूसरा मंदिर कहा जाता है।
इसके बाद कुछ शताब्दी पश्चात् एक एंटीओकस 4th नामक राजा जो सेल्यूसिड साम्राज्य का राजा था, इज़राइल पर कब्जा कर लेता है और यहूदियों के दूसरे मंदिर के ऊपर अपने देवता ज़ूस का मूर्ति रखवा देता है। यह यहूदियों का बहुत बड़ा अपमान था। इससे वे नाराज़ हो जाते हैं और वे विद्रोह कर देते हैं जिसके बाद उस मूर्ति को हटाया जाता है।
फिर पहली शताब्दी में रोमन साम्राज्य का उदय होता है। यह साम्राज्य 63 ई.पू. इज़राइल को अपने अधीन कर लेता है और इज़राइल को रोम का एक राज्य बनाकर एक यहूदी यहूदी राजा हेरोड को इसका राजा बना देता है। साथ ही हेरोड का ध्यान रखने के लिए अपने एक व्यक्ति को गवर्नर बना देते हैं जिससे यहूदी लोग कोई विद्रोह न करे। यहूदियों को अपने धर्म का पालन करने के लिए पूरी स्वतंत्रता भी दी जाती है। राजा हेरोड अपने शासनकाल में दूसरे मंदिर को विस्तार करके उसे बड़े मंदिर में परिवर्तित कर देता है।
इसके बाद इज़राइल के बेथलेम में एक साधारण यहूदी परिवार में ईसा मसीह का जन्म होता है। वह जैसे-जैसे बड़ा होता है लोगों को प्रेम, दया और भाईचारा का उपदेश देना शुरू कर देता है। उसके द्वारा किए जाने वाले चमत्कारों से लोग उसे ईश्वर का पुत्र मानने लगते हैं। वह यहूदी समाज में बहुत ज्यादा लोकप्रिय हो जाता है। ये सब देखकर कुछ कट्टर धार्मिक यहूदी लोगों को लगता है कि यह उनके हजारों वर्षों के संस्कृति और रीति रिवाज को बदल कर रख देगा और ईसा मसीह उनके धर्म के विरुद्ध बोल रहे हैं। इसी धार्मिक टकराव के चलते ईसा मसीह को वर्ष 30 के समय सूली पर चढ़ा दिया जाता है। ईसा मसीह के विषय में यह कहा जाता है कि उस दौर में उनका प्रभाव उतना अधिक नहीं था, परंतु यहूदियों द्वारा जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया तब उनका प्रभाव बढ़ने लगता है। ईसा मसीह के जाने के बाद वर्ष 66 में धार्मिक लोग एक दी ज़ीलोट्स नामक संगठन बनाते हैं। उस संगठन का उद्देश्य रोमन लोगों को इज़राइल से भागना था। वर्ष 70 में प्रथम यहूदी-रोमन युद्ध होता है। इसमें रोम का सेनापति टाइटस इज़राइल को हरा देता है। और वह यरुशलम शहर को नष्ट कर देता है। साथ ही वह यहूदियों के दूसरे मंदिर को भी नष्ट कर देता है। परंतु इस मंदिर का एक दीवार बच जाता है जो आज भी है। इसे लोग आज भी प्रार्थना करते हैं। इसके बाद तीसरा मंदिर कभी नहीं बनाया गया। इसके बाद सेनापति टाइटस वर्ष 70 से 135 तक यहूदियों को बहुत प्रताड़ित करता है। इस दौरान रोमन सेना कई लाख यहूदियों मार देता है। साथ ही यहूदियों को गुलाम बनाकर उन पर इज़रायल में रहने के लिए टैक्स लगा दिया जाता है। इस कारण यहूदी लोग इज़राइल छोड़कर विश्व के अन्य देशों में भागने लगते हैं। वर्ष 135 तक इज़राइल में यहूदियों का नामो निशान मिट जाता है। इसके बाद रोमन इसका नाम फिलिस्तीन कर देते हैं और रोमन ईसा मसीह के उपदेश अनुसार नए ग्रंथ लिखकर इस ज़मीन पर नया धर्म ईसाई का स्थापना करते हैं। उस समय बहुत ही कम लोग ईसाइयत को मानते थे। यह धीरे-धीरे इज़राइल में फैल रहा था क्योंकि रोमन उन्हें इसके लिए सज़ा भी देते थे।
वर्ष 306 में कांस्टेनटाइन रोम का नया राजा बनता है। उन्हें रोमन इतिहास में एक महान राजा माना जाता है। वैसे तो रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म को मानना एक अपराध था, परंतु कांस्टेनटाइन के राजा बनने के बाद वह ईसाई धर्म को मान्यता दे देता है। वह यरुशलम में ईसा मसीह के कब्र पर एक गिरिजाघर बनवाता है। एक बार उनकी माता वहां जाती है, तो वह कहती है कि उन्हें ईसा मसीह का क्रॉस मिला है जिस पर उन्हें सज़ा दिया गया था। उसे देखकर कांस्टेनटाइन भावुक हो जाता है। वह स्वयं ईसाई धर्म अपना लेता है और रोमन साम्राज्य का राष्ट्रीय धर्म बना दिया जाता है। चूंकि ईसा मसीह को यहूदियों ने सूली पर चढ़ाया था, तो कांस्टेनटाइन यहूदियों को मरवाना शुरू कर देता है। वह कई यहूदियों को गुलाम बनाकर दूसरे राज्य को बेच देता है। इस कारण बाकी बचे हुए यहूदी भी इज़राइल छोड़कर भागने लगते हैं और जहां उन्हें शरण मिला वहीं वे रहने लगते हैं। इस दौरान गुप्त वंश के सीरा प्रीमल(इरु ब्राह्मण) कुछ यहूदियों को भारत में स्वतंत्र रूप से रहने और अपना धर्म निभाने का बिना किसी शर्त के अनुमति दे देता है। तब से भारत में उनकी कुछ संख्या आज भी रहती है। इस तरह से यहूदी लोग विश्व के विभिन्न देशों में छोटी-छोटी संख्या में रहने लगते हैं। कुछ अरब में, कुछ यूरोप में और कुछ अफ्रीका में चले जाते हैं। वे जहां भी जाते हैं उन पर अत्याचार होने लगता है और रोमन साम्राज्य के अस्तित्व वर्ष 638 तक उनके साथ यही होता है। क्योंकि वर्ष 638 से पहले ही पैगंबर मोहम्मद मक्का मदीना में इस्लाम धर्म का स्थापना कर देते हैं। इस्लाम के मान्यता अनुसार एक रात पैगंबर मोहम्मद मक्का मदीना से उड़ते हुए घोड़े से यरूशलम जाते हैं और वहां टेंपल माउंट के स्थान पर नमाज पढ़ते हैं। बाद में इस्लामी शासको द्वारा वहीं अल अक्सा मस्जिद बनवाया जाता है। थोड़े ही दूरी पर डम ऑफ़ द रॉक है जहां से एक पत्थर पर बैठकर पैगंबर मोहम्मद उड़ते हुए घोड़े से जन्नत की ओर जाते हैं। पैगंबर मोहम्मद के जाने के बाद वर्ष 638 में इस्लाम जैसे ही यरूशलम पहुंचता है रोमन लोगों को इस्लाम लोगों द्वारा भगा दिया जाता है। इसके बाद इज़रायल पर इस्लामी लोगों का अधिकार हो जाता है। इस्लामी लोग यहूदियों को अपने जैसे ही मानते थे इसलिए वे यहूदी लोगों को इज़राइल आकर उन्हें अपनी धार्मिक स्वतंत्रता के अनुसार रहने का आदेश दे देते हैं। उस समय बहुत ही कम यहूदी इज़राइल वापस आते हैं।
वर्ष 638 के बाद इस्लाम काफी तेजी से विश्व के कुछ हिस्सों में फेल जाता है जैसे- भारतीय उपमहाद्वीप, अफ्रीका और यूरोप के कुछ हिस्सों में। वर्ष 638 से 1099 तक इस्लाम का शासन रहता है। इस बीच यरूशलम और बेबीलोन में यहूदियों का निवास मजबूती से हो जाता है। यूरोप के जर्मनी में भी एक मजबूत यहूदियों का निवास स्थान बन जाता है। साथ ही स्पेन के कुछ हिस्सों में भी यहूदी रहने लगते हैं। विश्व भर में यहूदियों के बिखरे होने के बावजूद यहूदियों के संस्कृति में काफी विकास होता है। इस बीच यहूदियों को काफी छूट दिया जाता है। परंतु 9वीं और 10वीं वीं शताब्दी में कुछ मुस्लिम ऐसे भी होते हैं जो यहूदियों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाते हैं जिसके कारण यहूदी अपना पहचान सार्वजनिक रहना शुरू कर देते हैं। इस दौरान यहूदियों का नरसंहार भी होता है जिसमें स्पेन ग्रेनाडा नरसंहार सबसे प्रसिद्ध है। यहूदियों के साथ एक नरसंहार मोरक्को में भी होता है। साथ ही वर्ष 1096 के समय जर्मनी में यहूदियों के साथ बहुत ज्यादा प्रताड़ना होने लगता है। यह अत्याचार और प्रताड़ना पूरे यूरोप में फैलने लगता है। इसके बाद वर्ष 1099 के समय यूरोपीय लोगों ने यरूशलम पर आक्रमण करके बड़े पैमाने पर यहूदियों और मुसलमानों का नरसंहार करते हैं। फिर से यहूदी यरूशलम छोड़कर भाग जाते हैं। इस घटना को The Crusades कहा जाता है। इसके बाद यूरोपीय शासकों के यरुशलम में कब्जा करने के बाद उसे फिर से ईसाई शहर में परिवर्तन करने का प्रयास किया जाता है। वे वर्ष 1099 से 1189 यरूशलम पर राज करते हैं। इस दौरान यहूदियों को वहां गुलाम की तरह रखा जाता है। उन्हें न ही धार्मिक स्वतंत्रता दिया जाता और न ही व्यापार की अनुभूति होती है। साथ ही वहां के यहूदियों और मुसलमानों पर जबरन ईसाई धर्म थोप दिया जाता है। परंतु वर्ष 1089 में मुस्लिम शासकों द्वारा फिर से यरूशलम पर आक्रमण करके यूरोपीय शासकों को भगा दिया जाता है और फिर से यहूदियों को वापस बुलाया जाता है, परंतु इस बार भी बहुत ही कम संख्या में यहूदी वापस आते हैं। जब मोरक्को और स्पेन में यहूदियों को प्रताड़ित किया जाता है, तो यहूदी लोग वहां से भाग कर मध्य यूरोप की ओर चले जाते हैं। फिर जब वहां उन पर अत्याचार होता है तो वे वहां से भी पलायन कर लेते हैं। इस तरह उन पर जहां भी अत्याचार होता, वे वहां से पलायन करने लगते हैं। अर्थात वे 3000 वर्षों से अलग-अलग जगह में भागते रहते हैं। इतना ही नहीं यूरोप में जब 1346 से 1353 तक फ्लैग की महामारी फैलती है जिसमें यूरोप की एक तिहाई आबादी प्रभावित होती है उसके लिए भी यहूदियों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसके कारण यहूदियों को बहुत ही क्रूर तरीके से मार दिया जाता है।
वर्ष 1556 में ऑटोमन साम्राज्य यरूशलम को अपने अधीन कर लेता है और यरुशलम शहर को नए सिरे से बनाया जाता है।
Ottoman Empire
Photo: Bosphore9 / Wikimedia Commons, CC0 1.0
साथ ही ऑटोमन साम्राज्य द्वारा यहूदी, मुस्लिम और ईसाइयों में लड़ाई न हो इसके लिए यरूशलम को तीन भागों में बांट दिया जाता है ताकि यहूदी वेस्टर्न वोल में प्रार्थना, मुस्लिम अल अक्सा मस्जिद में और ईसाई अपने गिरिजा घर में जा सकें। साथ ही वे आपस में शांति से मिलजुल कर रहें।Photo: H. H. Hardesty (Firm) / Wikimedia Commons, Public Domain
वर्ष 1648 के आसपास लगभग 75000 यहूदियों की संख्या होती है जिसमें से अधिकांश पोलैंड के हिस्से में रहते थे। साथ ही उस समय ब्रिटेन में भी यहूदियों की कुछ आबादी रहती थी। उस समय अमेरिका भी ब्रिटेन के अधीन था। इस दौरान ब्रिटेन के कुछ यहूदी भी अमेरिका चले जाते हैं।
जब फ्रांस की क्रांति के बाद नेपोलियन का उदय होता है। तब फ्रांस में पहली बार यहूदियों को रहने का आदेश दिया जाता है। नेपोलियन यहूदियों का बहुत सम्मान करता था। इसके शासन में यहूदी लोगों के प्रति नफरत बहुत कम होता है और वे सुखी से रहने लगते हैं। परंतु वर्ष 1850 में नेपोलियन की मृत्यु के बाद यूरोप में Anti Semitism शब्द का उपयोग किया जाता है अर्थात् यहूदियों के प्रति नफरत। यानी यहूदियों को किसी भी बहाने से खुलेआम मार देना। यह Anti Semitism थियोडोर हरज़ल के समय तक चलता रहता है।
2 मई 1860 में हंगरी में थियोडोर हरज़ल का जन्म हुआ था। बाद में Anti Semitism के कारण वह फ्रांस आ जाता है। यहां आकर वह पत्रकारिता करने लगता है। फ्रांस 1890 में रुस से एक युद्ध हार जाता है और इसका उत्तरदायी एक यहूदी अफसर अल्फ्रेड ड्रेफस पर डाल दिया जाता है।
थियोडर हरज़ल यह समाचार कवर करता है। साथ ही Anti Semitism और अनेकों अत्याचारों के बाद वह विश्व के सभी यहूदियों को एकत्रित करने का निर्णय करता है ताकि यहूदियों के लिए एक नया देश बनाया जा सके जहां वे सभी सुख पूर्वक रह सके। वह इसके लिए एक World Jews State नामक एक पुस्तक भी लिखता है। वह वर्ष 1897 मे World Zionist Congress नामक एक संस्था स्विट्ज़रलैंड में बनाता है। इस संस्था से विश्वभर के सभी यहूदी जुड़ते हैं और इसे पैसे भी दान करते हैं। साथ ही कई वर्षों के अत्याचारों के बाद सभी यहूदी एकत्रित होते हैं। वर्ष 1904 में थियोडर हरज़ल की मृत्यु हो जाती है। परंतु उनके मृत्यु के बाद भी उनके द्वारा बनाए गए संस्था का प्रभाव यहूदियों पर बहुत अच्छे से हो जाता है। इसके बाद यहूदी लोग छोटी संख्या में यरूशलम की ओर पलायन करने लगते हैं। इसे आलिया कहा जाता है यानि दूसरे देशों से यहूदियों का यरूशलम की ओर पलायन करना।
Theodor Herzl
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2 मई 1860 में हंगरी में थियोडोर हरज़ल का जन्म हुआ था। बाद में Anti Semitism के कारण वह फ्रांस आ जाता है। यहां आकर वह पत्रकारिता करने लगता है। फ्रांस 1890 में रुस से एक युद्ध हार जाता है और इसका उत्तरदायी एक यहूदी अफसर अल्फ्रेड ड्रेफस पर डाल दिया जाता है।
Alfred Dreyfus
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1881 से 1904 के दौरान प्रथम आलिया शुरू हो जाता है। इस दौरान विश्व के विभिन्न देशों से 30,000 के आसपास यहूदी यरुशलम आते हैं। प्रथम आलिया में आने वालों में से एक यहूदी इलाइज़र बेन यहूदा थे।
वह ध्यान देता है कि अलग-अलग देशों से आने वाले यहूदी अलग-अलग भाषा से था, कोई जर्मन, कोई रूसी, कोई अरबी तो कोई अंग्रेजी बोल रहा था। सभी यहूदी इस कारण आपस में घुल मिल नहीं पा रह थे। इस समस्या को सुलझाने के लिए यहूदा इज़राइल की पुरानी विलुप्त होती भाषा हिब्रू को पुनः बचाने का प्रयास करता है। ताकि यहूदियों का एक नया देश बन सके। इसके लिए वह यरुशलम में बहुत सारे हिब्रू भाषी विद्यालय खोलता है जिसमें विश्व के अन्य देशों से आने वाले लोग हिब्रू भाषा सिख सके।
Eliezer Ben-Yehuda
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वह ध्यान देता है कि अलग-अलग देशों से आने वाले यहूदी अलग-अलग भाषा से था, कोई जर्मन, कोई रूसी, कोई अरबी तो कोई अंग्रेजी बोल रहा था। सभी यहूदी इस कारण आपस में घुल मिल नहीं पा रह थे। इस समस्या को सुलझाने के लिए यहूदा इज़राइल की पुरानी विलुप्त होती भाषा हिब्रू को पुनः बचाने का प्रयास करता है। ताकि यहूदियों का एक नया देश बन सके। इसके लिए वह यरुशलम में बहुत सारे हिब्रू भाषी विद्यालय खोलता है जिसमें विश्व के अन्य देशों से आने वाले लोग हिब्रू भाषा सिख सके।
वर्ष 1903 में रूस के युद्ध क्षेत्रों में एन्टी सेमिटिस्म के कारण यहूदियों का नरसंहार शुरू हो जाता है। इसका कारण 1904 से 1914 तक दूसरा आलिया शुरू हो जाता है। इस दौरान रूस से लगभग 40 हज़ार यहूदी यरूशलम आ जाते हैं। वे यहां आकर एक नया शहर तेल अवीव का निर्माण करते हैं। इस शहर में उस समय केवल हिब्रू भाषा का ही प्रचलन होने लगता है। वहां के अखबार और पुस्तकें भी हिब्रू भाषा में ही होती थी। वहां यहूदी लोग खेती करना भी शुरू कर देते हैं। दूसरे आलिया के दौरान रोमानिया, बुल्गारिया, यमन और ईरान से भी कई यहूदी इज़राइल आते हैं।
वर्ष 1914 में यूरोप में पहला विश्व युद्ध होता है। इस युद्ध में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, बुल्गारिया और ऑटोमन साम्राज्य एक तरफ थे। दूसरी ओर ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, इटली और अमेरिका एक तरफ थे। इन दोनों दलों में 1914 से 1918 के बीच भयंकर युद्ध होता है। उस समय यहूदियों की World Zionist Congress पार्टी यहूदियों के लिए अपना एक देश बनाना चाहती थी। इस युद्ध में ब्रिटेन को पैसों की आवश्यकता होती है। वर्ष 1917 में ब्रिटेन और Zionist संस्था के बीच एक समझौता होता है। इस समझौते के तहत यहूदी लोगों का ब्रिटेन को पैसे से सहायता करना होता है और यदि ब्रिटेन युद्ध जीतता है, तो वह फिलिस्तीनी क्षेत्र में यहूदियों को एक अलग देश देगा। इस समझौते को Balfour डिक्लेरेशन कहा जाता है। परिणामत: प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटेन वाला दल युद्ध जीत जाता है और ऑटोमन साम्राज्य वाला दल हार जाता है। 1919 में ब्रिटेन ऑटोमन साम्राज्य को कई भागों में विभाजित कर देता है जिसमें ओटोमन सम्राज्य का फिलिस्तीन और जॉर्डन वाला भाग ब्रिटेन अपने अधीन कर लेता है और 1920 के बाद ब्रिटिश मेंडेट फिलिस्तीन कहा जाता है। इसके बाद समझौते के अनुसार यहूदियों को नया देश मिलना था। परंतु फिलिस्तीनी लोग इसका विरोध करने लगते हैं ताकि नया देश न बने। फिलिस्तीनी विद्रोह के दौरान पहले और दूसरे आलिया में आए यहूदी स्वयं की रक्षा के लिए एक संगठन का निर्माण करते हैं जिसे हगानाह कहा जाता है। इस कारण से 1920 से ही यहूदियों और फिलिस्तीनियों के बीच झगड़ा शुरू हो जाता है। बालफर डिक्लेरेशन के तहत 1919 से 1923 तक तीसरा आलिया शुरू हो जाता है। इस दौरान यूरोप से यहूदियों की कुछ आबादी ब्रिटिश फिलिस्तीन आती है।
इसके बाद 1924 से 1929 में चौथा आलिया शुरू हो जाता है। इस दौरान एंटीसेमिटिस्म के कारण पोलैंड, लिथुआनिया, रूस और रोमानिया से 82,000 के आसपास यहूदी ब्रिटिश फिलिस्तीन आते हैं। वे यहां आकर छोटे-छोटे शहर बसाने लगते हैं। साथ ही वे अपना जीवन चलाने के लिए उद्योग और खेती भी करने लगते हैं।
1930 से 1939 तक पांचवा आलिया शुरू होता है। इस दौरान लगभग 2,50,000 यहूदी फिलिस्तीन आते हैं क्योंकि इस दौरान जर्मनी में हिटलर का उदय होता है। वह यहूदियों से बहुत ही नफरत करता था। वह यहूदियों पर बहुत ज्यादा अत्याचार करने लगता है। इस कारण इस आलिया के दौरान बहुत अधिक संख्या में यहूदी फिलिस्तीन आते हैं। इनमें से ज्यादातर यहूदी पढ़े लिखे थे। फिलिस्तीन में यहूदियों की बढ़ती जनसंख्या से फिलिस्तीन के अरबी लोग चिंतित होने लगते हैं। इस कारण से यहूदियों और फिलिस्तीनियों के बीच गृहयुद्ध शुरु हो जाता है जिसमें यहूदी, फिलिस्तीन और ब्रिटिश भी मारे जाते हैं। इस विद्रोह को रोकने के लिए 1939 में ब्रिटेन एक वाइट पेपर जारी करता है। इसके तहत अगले 1 वर्ष में केवल 10,000 यहूदियों को ही फिलिस्तीन आने की अनुमति होती है। इससे कुछ वर्षों तक फिलिस्तीनियों का गुस्सा शांत हो जाता है। 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू होता है जिसमें हिटलर यूरोप के कई देशों पर कब्जा कर लेता है। वह यहूदियों को बड़े ही क्रुरता से मारने लगता है। हिटलर के क्रुरता के कारण ही कोई भी यहूदी यूरोप में रहना नहीं चाहता था। चूंकि फिलिस्तीन में केवल 10,000 यहूदी ही आ सकते थे इसलिए 1939 में आलिया बेट शुरू हो जाता है अर्थात यहूदियों का गैर कानून तरीके से फिलिस्तीन पहुंचना। इस कारण से ब्रिटेन के कड़ी के निगरानी के बावजूद 1939 से 1945 के बीच लगभग 1 लाख से भी अधिक यहूदी फिलिस्तीन आ जाते हैं। दूसरी तरफ दूसरा विश्व युद्ध भी समाप्त हो जाता है। परंतु तब तक यूरोप में हिटलर 60 लाख यहूदियों को बड़े क्रुरता से होलोकास्ट से मरवा देता है। इस कारण से यहूदी किसी भी तरह से फिलिस्तीन आना चाहते थे। वे सभी यहूदी पानी जहाज, रेगिस्तान और जंगलों के रास्ते जिन्हें जो मिला अपनी धन संपदा छोड़कर फिलिस्तीन आ जाते हैं। इस तरह से देखते ही देखते असंख्य संख्या में यहूदी फिलिस्तीन आ जाते हैं। यहां आकर वे छोटे-छोटे तंबुओं में रहने लगते हैं। उन्हें जैसी सुविधा मिलती है उसी में खुशी से रहते हैं। क्योंकि हिटलर द्वारा होलोकास्ट से दिया गया प्रताड़ना का दुख उनसे बेहतर कोई नहीं जानता था। इनमें से ज्यादातर यहूदी होलोकास्ट से बच गए थे। 1945 तक फिलिस्तीन में यहूदियों की आबादी 31% हो जाती है और आगे भी बढ़ती रहती है। इसी के कारण 1946 और 1948 में यहूदियों और फिलिस्तीनियों के बीच हिंसा शुरू हो जाता है। इसी हिंसा को रोकने के लिए ब्रिटेन एक कानून बनाता है। इसके तहत यदि कोई यहूदी गैर कानूनी तरीके से फिलिस्तीन आता है, तो उसे दंड दिया जाएगा। इस कारण से यहूदी नाराज हो जाते हैं और यहूदी संगठन हगानाह, इरगुन और लेही इसका विरोध करने लगते हैं। फिलिस्तीन में जिस बिल्डिंग से ब्रिटेन शासन कर रहा था उसमें इरगुन संगठन हमला कर देता है जिसमें 93 ब्रिटिश सैनिक मारे जाते हैं। इस कारण जब ब्रिटेन इरगुन के सैनिकों को मौत की सजा देता है, तो इरगुन संगठन भी ब्रिटेन के सैनिकों को खुलेआम पेड़ पर लटका देता है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन कमजोर हो जाता है। फिर भी ब्रिटेन चाहता था कि किसी भी तरह से यहूदी और फिलिस्तीनी समझौता कर लें। परंतु उनके अनेकों प्रयास करने पर भी ऐसा नहीं हो रहा था। क्योंकि यहूदी फिलिस्तीन में अपना एक देश बनाना चाहते थे और फिलीस्तीनी ऐसा नहीं चाहते थे। फिर ब्रिटेन परेशान होकर 1947 में इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र ले जाता है। साथ ही ब्रिटेन यह घोषणा कर देता है कि 15 मई 1948 को ब्रिटेन फिलस्तीन को स्वतंत्र करके चला जाएगा।
इजराइल का स्थापना
जब ब्रिटिश सरकार द्वारा यहूदियों और फिलिस्तीनियों का कोई हल नहीं निकलता है, तो वह इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र(United Nation) के पास लेकर जाता है। 1947 में संयुक्त राष्ट्र फिलीस्तीन को दो भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखता है-एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य। वह 1947 में फिलीस्तीन को कुछ इस तरह से विभाजित करता है।
पीला रंग वाला अरब राज्य का और हरा रंग वाला यहूदी राज्य का और सफेद रंग वाला यरूशलम जो यहूदी, इस्लाम और ईसाई तीनों धर्म का प्रमुख स्थल है उसे संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण में रखा जाता है। यह यहूदियों को तो स्वीकार होता है, परंतु फिलिस्तीनियों को स्वीकार नहीं होता है।
पीला रंग वाला अरब राज्य का और हरा रंग वाला यहूदी राज्य का और सफेद रंग वाला यरूशलम जो यहूदी, इस्लाम और ईसाई तीनों धर्म का प्रमुख स्थल है उसे संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण में रखा जाता है। यह यहूदियों को तो स्वीकार होता है, परंतु फिलिस्तीनियों को स्वीकार नहीं होता है।
UN Plan for Palestine 1947
Photo: Zero0000A/RES/181(II) / Wikimedia Commons - Public Domain
चूंकि ब्रिटेन को 15 मई 1948 को फिलिस्तीन को छोड़ना था। ठीक इसके एक दिन पहले 14 मई 1948 को David Ben Gurion इज़राइल को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर देता है। इस घोषणा के थोड़े ही समय बाद उस समय के दो शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका और सोवियत संघ इज़राइल को मान्यता दे देते हैं। इस फिलिस्तीन रेजोल्यूशन को लेकर संयुक्त राष्ट्र में वोट भी किया जाता है जिसमें 33 वोट इसके पक्ष में, 13 वोट इसके विरुद्ध में और 10 देश वोट नहीं करते हैं। इसके विरुद्ध में वोट देने वालों में 12 मुस्लिम देश और 13वां देश भारत था। चूंकि अधिकांश वोट पक्ष में होता है इसलिए 14 मई 1948 को इज़राइल का निर्माण हो जाता है।
इसके ठीक तुरंत बाद ही 1948 में अरब इज़राइल युद्ध होता है मिस्र, जॉर्डन, सीरिया और इराक मिलकर इज़राइल पर आक्रमण करते हैं। परंतु इज़राइल इन सभी अरब देशों पर भारी पड़ता है और सबको हराकर फिलिस्तीन के कुछ हिस्सों को जीतकर कुछ इस तरह से अपने क्षेत्र का विस्तार कर लेता है।
अधिकांश भूमि पर इज़राइल का अधिकार है और फिलिस्तीन के दो हिस्से हैं गाज़ा और वेस्टर्न बैंक।Photo: Furfur/ Wikimedia Commons, CC BY - SA 4.0
इस तरह से इज़राइल का अरब देशों से और भी कई युद्ध होता है जिसमें इजरायल हमेशा जीतता रहा है। वह सभी ओर से शत्रु देशों से घिरा हुआ है परंतु फिर भी एक शक्ति शाली राष्ट्र के रूप में उभर कर आया है।













