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सरदार वल्लभभाई पटेल: भारत को एक सूत्र में पिरोनेवाले लौह पुरुष

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 आज हम एक ऐसे महान व्यक्ति के विषय में बात करने वाले हैं जिन्होंने हमारे देश को एकजुट किया और भारत की राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

           15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों ने हमारे देश को आजाद तो किया, परंतु भारत से एक अलग राष्ट्र पाकिस्तान का भी निर्माण करके चले गए। इसके साथ ही ब्रिटिश भारत के साथ-साथ 562 देसी रियासतें भी थी। इन रियासतों को यह विकल्प दिया गया था कि वे चाहे तो भारत में विलय हो जाए या अपना स्वतंत्र राष्ट्र बना लें। इससे सभी राजाओं में अपना स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की मंशा ने जन्म लिया। यह एक बहुत बड़ी समस्या थी और इससे हमारे भारतवर्ष का अस्तित्व खतरे में हो सकता था। इस दौर में भारत के इन 562 देसी रियासतों को एक सूत्र में बांधकर एकीकरण करने का कार्य एक व्यक्ति को दिया गया जिसे उन्होंने बहुत अच्छे से पूरा किया और हमारे राष्ट्र को एक किया। वह महान व्यक्ति हैं लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल। आज हम जानने वाले हैं उनके जीवन के विषय में।


      सरदार वल्लभभाई पटेल 

      सरदार वल्लभभाई पटेल भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, कुशल प्रशासक और दूरदर्शी राजनेता थे। उन्हें लौह पुरुष के नाम से जाना जाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत अनेक देसी रियासतों में बांटा हुआ था, तब उन्होंने दृढ़ नेतृत्व, कूटनीतिक कौशल और अटूट संकल्प से अधिकांश रियासतों का भारतीय संघ में विलय कराया। इसी कारण उन्हें आधुनिक भारत का शिल्पकार भी कहा जाता है।
      सरदार वल्लभभाई पटेल स्वतंत्र भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री थे। उन्होंने केवल देश की राजनीतिक एकता को ही मजबूत नहीं किया, बल्कि एक सशक्त और संगठित भारत की नींव रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके साहस, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और दृढ़ इच्छा शक्ति के कारण आज भी उन्हें भारत के महानतम नेताओं में गिना जाता है। उनका जीवन देश भक्ति, नेतृत्व और राष्ट्रीय एकता का प्रेरणादायक उदाहरण है।
      सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 में नाडियाड ,गुजरात में हुआ था। उनका पूरा नाम वल्लभभाई झवेरभाई  पटेल था। उनके पिता झवेरभाई पटेल एक सच्चे, ईमानदार और अनुशासनप्रिय किसान थे और उनकी माता लाडबाई धार्मिक, दयालु और संस्कारी महिला थी। माता-पिता के संस्कारों का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा।
        उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के छोटे विद्यालय से हुई।  बचपन से ही वे आत्मनिर्भर, निडर और दृढ़ निश्चय स्वभाव के थे। उनके साहस से जुड़ा एक प्रसिद्ध प्रसंग है। कहा जाता है कि एक बार उनके हाथ में दर्दनाक फोड़ा हो गया था। डॉक्टर ने उसे गर्म लोहे से फोड़ने की सलाह दी, लेकिन जब डॉक्टर स्वयं ही झिझकने लगते हैं, तब वल्लभ भाई ने बिना डरे गर्म लोहे से स्वयं ही अपना फोड़ा फोड़ देते हैं। यह घटना उनके असाधारण साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक मानी जाती है।
       वे पढ़ाई के साथ-साथ खेल-कूद में भी रुचि रखते थे। 1893 में 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह झवेरबा पटेल से कर दिया जाता है। कम आयु में विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे 22 वर्ष की उम्र में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करते हैं।
       उनकी इच्छा कानून की पढ़ाई कर बैरिस्टर बनने की थी, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण वे तुरंत इंग्लैंड नहीं जा पाते हैं। वे कई वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, धन बचाते हैं और आवश्यकता पड़ने पर मित्रों से पुस्तकें उधार लेकर अध्ययन करते हैं। 1909 में उनकी पत्नी का बीमारी के कारण निधन हो जाता है। इस घटना से उन्हें गहरा आघात पहुंचता है, फिर भी वे अपने लक्ष्य से समझौता नहीं करते हैं।
       अंततः वे इंग्लैंड जाते हैं और Middle Temple, London में कानून की पढ़ाई करते हैं। वे लगभग 36 महीने का बैरिस्टर पाठ्यक्रम केवल 30 महीनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ पूरा करते हैं। भारत लौटने के बाद वे अहमदाबाद में अपना वकालत प्रारंभ करते हैं और शीघ्र ही वहां के सबसे सफल अपराधिक वकीलों में गिने जाने लगते हैं।
       इंग्लैंड में रहने के दौरान वे पश्चिमी जीवनशैली से काफी प्रभावित होते हैं। भारत लौटने के बाद वे अंग्रेजी में बात करने लगते हैं तथा सूट-टाई पहनना भी शुरू कर देते हैं। उस समय वे आधुनिक जीवन शैली अपनाते हैं। हालांकि, महात्मा गांधी से मिलने के बाद उनके जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आता है और वे विदेशी पहनावे और रहन-सहन का त्याग कर सादा जीवन अपनाते हैं तथा स्वयं को पूरी तरह देश की सेवा के लिए समर्पित कर देते हैं।
        सरदार पटेल का शुरू में राजनीति में कोई रुचि नहीं होता है। वे अपने मित्रों के आग्रह करने पर 1917 में नगरपालिका का चुनाव लड़ते हैं और जीत हासिल करते हैं। शुरुआत में सरदार पटेल गांधी जी के विचारों को पसंद नहीं करते हैं, परंतु जब गांधी जी ने नील क्रांति को शुरू किया, तो वे उनसे बहुत प्रभावित हुए।
1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में सूखा पड़ जाता है और  खेती नहीं हो पाती। किसान अंग्रेजों से भारी छूट की मांग करते हैं, परंतु अंग्रेज सरकार उनके मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं होती है। तब वल्लभभाई पटेल किसानों को एकत्रित कर उनका नेतृत्व करते हैं और अहिंसात्मक खेड़ा आंदोलन का  संचालन करते हैं। इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज सरकार को उनके आगे झुकना पड़ा और करो में छूट देना पड़ा। यह वल्लभ भाई पटेल की पहली जन आंदोलन सफलता थी। 1928 में बारडोली में इसी तरह सूखा पड़ता है और अंग्रेज 22% तक कर बढ़ा देते हैं। बारडोली के किसानों को भी सरदार पटेल का सहारा मिलता है। वे इसके आंदोलन का भी सफलतापूर्वक संचालन करते हैं। वे किसानों के साथ मिलकर सत्याग्रह करते हैं। अंग्रेज सरकार को उनके आगे विवश होना पड़ता है और किसनों को करों से मुक्त करना पड़ता है। इस आंदोलन के कारण अंग्रेज सरकार को किसानों हथियाए जमीन और जानवरों को वापस करना पड़ता है। इस आंदोलन से ही वल्लभभाई पटेल को सरदार के नाम से सम्मानित किया जाता है इसके बाद उन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम से जाना जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को शुरू किया, तब सरदार पटेल गांधी जी को संपूर्ण समर्थन करते हैं। वे अपने सभी अंग्रेज शैली के कपड़ों को फेंक देते हैं और खादी के वस्त्रों का प्रयोग करना शुरू कर देते हैं। 1920 में उन्हें गुजरात में कांग्रेस के अध्यक्ष रूप में चुना जाता है। वे 3 बार 1922, 1924 और 1927 में इस पद के लिए चुने जाते हैं और इस पद को 1945 तक संभालते हैं। 1940 के आस-पास भारत में आजादी की गतिविधियां तेजी से बढ़ने लगती है और अन्य क्रांतिकारियों के साथ सरदार वल्लभभाई पटेल को भी कई बार जेल जाना पड़ता है। लेकिन आजादी का संघर्ष चलता रहा और परिणाम स्वरूप 15 अगस्त 1947 में अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ता है। वे आजादी के बाद पहले गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री बनते हैं। उसे समय भारत आजाद तो हो गया था, परंतु समस्याएं कम नहीं थी। भारत अलग-अलग 562 देसी रियासतों में बंटा हुआ था। सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से सभी रियासतें भारत में शामिल हो जाते हैं और भारत को एक सूत्र में पिरोते हैं। वह भारत को एकजुट कर हमारे भारत के अस्तित्व को बचा लेते हैं।

 
                हमारे भारत देश को जीवन भर सेवा देने के बाद 15 दिसंबर 1950 को हार्ट अटैक से उनका मृत्यु हो जाता है। आज उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय एकता के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2018 में उन्ही के सम्मान में उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा बनाई जाती है। यह विश्व में सबसे ऊंची मर्ति है। वे आज हमारे देश के सभी लोगों के लिए बहुत बड़े प्रेरणा है।
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