असरानी: हमारे प्रिय हास्य कलाकार

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 आज हम जिस व्यक्ति की बात करने जा रहे हैं, वह न केवल एक बेहतरीन हास्य कलाकार , बल्कि  एक बहुत अच्छे संगीतकार भी थे। इन्होंने अपने संघर्ष के दौरान अपने जिस संस्था में एक्टिंग सिखा उसी में एक्टिंग सीखने का काम भी किया। यहां बात होने जा रही है हम सबको हंसाने वाले हास्य कलाकार असरानी जी की।

        
असरानी जी का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर, राजस्थान  में एक सिंधी परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम गोवर्धन असरानी था। वह वह चार बहनें और तीन भाइयों में से एक थे। उनके पिताजी वर्ष 1936 में कराची से जयपुर आ गए थे। यहां उन्होंने इंडियन आर्ट कारपेट फैक्ट्री में नौकरी किया और बाद में अपना बिज़नेस करने लगे। असरानी के पढ़ाई सेंट जे़वियर स्कूल और राजस्थान कॉलेज से हुई थी। असरानी के माता-पिता चाहते थे कि वह अच्छे से पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी करें। लेकिन वहां एक अभिनेता बनने का मन बना चुके थे। उनके पिता ने इसके लिए उन्हें कभी इजाजत नहीं दी। असरानी को लगता था कि शायद उनका सपना पूरा नहीं होगा। वह बचपन से ही जयपुर में रेडियो के कार्यों से जुड़े हुए थे और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कई वर्षों तक वह रेडियो के क्षेत्र में काम करते रहे। वह अपना सपना पूरा करने के लिए मुंबई जाना चहते थे परंतु उनके पास पैसे नहीं थे। उनके एक मित्र ने जयपुर में दो नाटक किए। इन दो नाटकों के टिकट से जो पैसे मिले, मुंबई जाने के लिए उनमें से कुछ असरानी को दिया गया। मौका देखकर एक दिन असरानी अपने घर से मुंबई (तब बंबई) के लिए निकल गए।
वह 1962 में मुंबई आ गए। यहां उनकी मुलाकात निर्माता, निर्देशक किशोर साहू और लेखक, निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से हुई।
                        निर्माता किशोर साहू
                       डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी
उन्होंने उसे पहले पुणे के फिल्म संस्था भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्था सेटिंग का कोर्स करने की सलाह दी।
असरानी ने वर्ष 1964 मैं वहां दाखिला ले लिया और 1966 में अपना कोर्स पूरा कर लिया। इसके बाद वह काम की तलाश में मुंबई आ गए। वह संघर्ष कर ही रहे थे कि उनके परिवार वाले उन्हें ढूंढते हुए वहां आ गए और असरानी को जबरदस्ती अपने साथ ले गए। परंतु असरानी का मन वहां लगा नहीं और वह मुंबई वापस आ गए। यहां आ कर वह काम की तलाश में लग गए। जब उन्हें काम ढूंढने पर भी काम नहीं मिला, तो वह वापस उसी संस्था में आ गए जहां से उन्होंने एक्टिंग सीखा था यानी भारतीय फिल्म और टेलिविजन संस्थान पुणे और  बतौर एक्टिंग टीचर यहां नौकरी करने लगे। इसी दौरान ऋषिकेश मुखर्जी लेखक और डयरेक्टर गुलज़ार के साथ वहां आ पहुंचे।
                   कवि और लेखक गुलज़ार 
असरानी उन्हें देखकर बहुत खुश हुआ। उन्होंने मुखर्जी से पूछा कि आपने मुझे काम के लिए कहा था। इस पर मुखर्जी कहते हैं मैं काम दूंगा और उनसे पूछते हैं कि जया भादुड़ी कौन है। असरानी भादुड़ी को बुलाते हैं।
                                जया भादुड़ी 
असरानी ने गुलजार साहब से यह पूछा कि मुखर्जी साहब यहां क्यों आए हैं,वह जवाब देते हैं कि गुड्डी को ढुंढने आए हैं। उस समय जया भादुड़ी असरानी जी की छात्रा हुआ करती थीं। गुड्डी फिल्म को बनने में अभी समय था लेकिन जया भादुड़ी को इसके लिए सिलेक्ट कर लिया गया। इस बीच असरानी को अपना पहला फिल्म 1967 में मिला। इस फिल्म का नाम था 'हरे कांच की चूड़ियां'। इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता विश्वजीत का भूमिका निभाया था।
इस फिल्म से उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं मिला। उस समय असरानी  अपने परफॉर्मेंस के रील उस जमाने के मशहूर डायरेक्टर एलवी प्रसाद के पास दिखाने ले गए।
          ‌                  डायरेक्टर एलवी प्रसाद
उन्होंने उसे देखकर असरानी को कहा-हम तुम्हें कैसा रोल दें, हीरो हमारे पास बहुत है, विलेन तुम लगते नहीं, कॉमेडियन का सवाल ही पैदा नहीं होता और रोमांस तुमसे होगा नहीं। इस पर असरानी अपने रील का डब्बा उठाते हैं और बोलते हैं कोई बात नहीं, मुझे माफ कीजिए, मैं चलता हूं। हालांकि बाद में प्रसाद जी ने उन्हें आगे अपने बहुत सारे फिल्मों में काम करने का मौका दिया। इस दौरान असरानी ने 1967 से 1972 चार गुजराती फिल्मों में भी काम किया जिसमें उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाया। डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी जी ने असरानी के करियर में बहुत बड़ा योगदान दिया। उन्होंने वर्ष 1969 में उन्हें फिल्म 'सत्यकाम' में काम दिया जिसमें उन्होंने एक सपोर्टिंग एक्टर की भूमिका निभाई।
बाद में ऋषिकेश मुखर्जी जी ने उन्हें 'गुड्डी' में एक बेहतरीन भूमिका दिया जिसे उन्होंने बहुत अच्छे से किया।

असरानी ने अपने एक्टिंग से इस फिल्म में सभी का दिल जीत लिया। बाद में मुखर्जी जी ने असरानी को अपने बहुत सारे फिल्मों में मौका दिया। जिनमें 'बावर्ची, नमक हराम, अभिमान और चुपके चुपके'जैसे फिल्में शामिल हैं। असरानी ऋषिकेश मुखर्जी से अपने संबंध को लेकर कहते हैं -मैं आखिरी दिनों में अस्पताल उनके पास गया, तो वह एक कागज पर असरानी मुखर्जी लिखकर उन्हें देते हैं। वह उन्हें कहना चाहते थे कि तुम मेरे बेटे हो। धीरे-धीरे असरानी हर निर्देशक और निर्माता के पसंदीदा अभिनेता बन गए। इसके बाद असरानी मैं साउथ फिल्मों की ओर भी अपना रुख किया और और वहां का बहुत सारे निर्माता और निर्देशकों के साथ काम किया। उन्होंने साउथ की हिंदी रीमेक फिल्मों में भी विशेष भूमिका निभाया। धीरे-धीरे वह हिंदी फिल्मों के चाहिते कलाकार बन गए। इसके बाद निर्देशक और निर्माता बी आर चौपड़ा ने उन्हें फिल्म 'निकाह' के लिए साइन कर लिया।

इसमें उनका किरदार नेगेटिव था। बी आर चोपड़ा को कई लोगों ने असरानी को नेगेटिव रोल देने से मना किया था लेकिन वह अपने फैसले पर अड़े रहे। बाद में यह फिल्म सुपरहिट रही। उन्होंने लगभग सभी कामयाब लोगों के साथ काम किया। उन्होंने लगभग 400 फिल्मों में काम किया है। उन्होंनेेे कुछ फिल्में जैसे-अलाप, फूल खिलेेेेेे हैं गुलशन गुलशन, यह कैसा इंसाफ और हमारेे तुम्हारे में गानेे भी गए हैं। वह राजनीति में भी शामिल हुए और 2004 में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। उन्होंनेेे चुनावों में काफी बढ़ चढ़ हिस्सा लिया। उन्हेंं फिल्म  'शोले'  में निभाए गए अपने किरदार 'अंग्रेज जमानेेेे के जेलर' के लिए हमेशा याद किया जाता है।

इसमेंं उन्होंने हमें हंसाने का काम किया था। हम सबको अपने परफॉर्मेंस से हंसाने और हमारे दिलों में राज करने के बाद 20 अक्टूबर 2025 दिवाली के दिन जुहू के आरोग्य निधि अस्पताल में अपनी अंतिम सांसें लीं।तो यह थी हमें हंसने वाले हमारे प्रिय हास्य कलाकार असरानी की कहानी।
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