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वैष्णव योगिनी एकादशी : भगवान विष्णु को समर्पित एक व्रत

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 जैसा कि हम अपने भारत वर्ष में विभिन्न पूजन से संबंधित भिन्न-भिन्न मन्यताओं के अनुसार व्रत रखते हैं और उन्हें करने से उन व्रतों के अनुसार हमें फल मिलने में विश्वास रखते हैं। इन्हें व्रतों में एक व्रत है वैष्णव योगिनी एकादशी। ऐसा मान्यता है कि यह व्रत करने से भगवान विष्णु  का कृपा प्राप्त होना और जीवन के पापों, कष्टों, नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति मिलता है। इसी से संबंधित यह जानकारी है।


वैष्णव योगिनी एकादशी 

हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां पड़ती है। उनमें आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष के एकादशी को वैष्णव योगिनी एकादशी कहते हैं। आषाढ़ कृष्ण एकादशी का नाम ही योगिनी है। ऐसा मान्यता है कि इस व्रत के करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देने वाली व्रत है और तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। 

वैष्णव योगिनी एकादशी कथा 

योगिनी एकादशी का कथा पद्म पुराण के उत्तरखंड में मिलता है। इस कथा के वक्ता श्री कृष्ण और मारकंडेय है। जब युधिष्ठिर आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष एकादशी का महत्व पूछते हैं, तब श्री कृष्ण जी इस कथा को सुनाते हैं।
         प्राचीन काल में स्वर्ग धाम के अलकापुरी में कुबेर नामक एक राजा रहता था। वह शिवजी का परम भक्त था और प्रतिदिन उनका पूजा करता था। हेम नाम का एक माली उनके वहां पूजन के लिए पुष्प लाया करता था। हेममाली की पत्नी विशालाक्षी अत्यंत ही सुंदर थी। एक दिन हेम माली मानसरोवर से पुष्प तो लाता है परंतु अपनी पत्नी के प्रेम में इतना मगन हो जाता है कि वह पुष्प कुबेर तक नहीं पहुंचाता है। राजा दोपहर तक उसका प्रतीक्षा करता है। जब वह दोपहर तक भी पुष्प लेकर नहीं आता है, तो राजा अपने सेवकों को उसके न आने का कारण जानने को कहता है। उनके सेवक उनसे कहते हैं कि महाराज उसकी पत्नी अत्यंत ही सुंदर है, अवश्य ही वह अपने पत्नी के प्रेम में मगन होगा। यह सुनकर कुबेर महाराज क्रोधित हो जाते हैं और उसे बुलाने के लिए कहते हैं। जब हेम माली राजा के पास पहुंचता है, तो वह भय से कांपने लगता है। कुबेर महाराज उससे कहता है-नीच, कामी तूने मेरे परम पूजनीय ईश्वर शिवजी का अपमान किया है, इसलिए मैं तुझे श्राप देता हूं तो स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्यु लोक में कोढ़ी होगा। 
          कुबेर महाराज के श्राप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो जाता है और उसी क्षण पृथ्वी पर गिर जाता है। भूमि पर आते ही उसके शरीर में कोड़े हो जाते हैं। उसकी पत्नी भी उसी समय उससे अंतर्ध्यान हो जाती है। मृत्यु लोक में भी आकर वह अनेक दुख भोगता है। जंगल में वह बिना अन्न और जल का भटकता रहता है। रात्रि के समय उसे नींद भी नहीं लगता है, परंतु शिव जी के पूजा के प्रभाव से उसे अपने पिछले जन्म के स्मृति का ज्ञान होते रहता है। भटकते भटकते वह एक दिन मारकंडेय ऋषि के आश्रम पहुंच जाता है। मार्कंडेय ऋषि ब्रह्मा से भी अधिक वृद्ध थे और उनके आश्रम को ब्रह्मा जी के सभा के समान माना जाता था। हेम माली वहां पहुंचकर उनके पैरों में गिर जाते हैं। 
       उसे देखकर मारकंडेय ऋषि उनसे पूछते हैं कि उसने कौन सा ऐसा पाप किया है जिसके प्रभाव से उनकी स्थिति वैसी है। हेम माली उनसे अपनी पूरी कहानी कहते हैं। हेमा माली के सत्य कहने पर ऋषिजी अत्यंत ही प्रसन्न होते हैं। इसलिए उसके उधर के लिए उसे एक व्रत बताता है। वे उसे कहते हैं कि यदि वह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करेगा, तो उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। 
         उनका यह बात सुनकर हेमा माली अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उनको साष्टांग प्रणाम करते हैं। ऋषि जी उसे स्नेह के साथ उठाते हैं। फिर हेम माली उनके कहे अनुसार विधिपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत करते हैं। इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह पुनः अपने पुराने स्वरुप में आकर अपनी स्त्री के साथ सुख पूर्वक रहना लगता है। 
        यह व्रत हम आज भी विधिपूर्वक रखते हैं।

वैष्णव योगिनी एकादशी व्रत का महत्व 

  • इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से पाप नष्ट हो जाते हैं 
  • इस व्रत को 88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य दायक माना जाता है। 
  • इस व्रत को करने से सुख, समृद्धि आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
  • यह व्रत मन को शांत करता है और भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ाने में सहायता करता है। 
  • इस व्रत के करने से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग सरल होता है।

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