सोमवार, 30 मार्च 2026

इजरायल : एक छोटा परंतु विश्व का एक शक्तिशाली देश

 आज हम एक देश के बारे में बताने जा रहे हैं जो विश्व के मानचित्र में तो बहुत छोटा है परंतु यह विश्व के शक्तिशाली देश में से एक है। इस देश के लोग कई हजारों वर्षों से अपने अस्तित्व के लिए प्रताड़ना झेलते आ रहे हैं। वे लोग अपने देश के अस्तित्व को भी बचाने के लिए सदैव संघर्ष करते रहते हैं। वह देश है इजराइल।


इज़राइल देश की जानकारी (Israel Country Information)

परिचय

इज़राइल मध्य-पूर्व में स्थित एक छोटा किंतु बहुत ही शक्तिशाली और विकसित देश है। यह पूरे विश्व में केवल एक मात्र यहूदी देश है। इसकी जनसंख्या एक करोड़ से अधिक है। यह बहुत छोटा होने के बावजूद अपनी उन्नत तकनीकी, सैन्य शक्ति, कृषि विकास और धार्मिक महत्व के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इसके यहूदी धर्म का इतिहास लगभग 4,000 वर्ष पुराना है। यहां तीन बड़े धर्मों यहूदी, ईसाई और इस्लाम के तीन महत्वपूर्ण स्थल है। यह देश इतिहास, राजनीति और धर्म तीनों दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस देश के प्रत्येक नागरिक को अपने देश के आर्मी में सेवा देना अनिवार्य है। इसलिए इस देश का प्रत्येक नागरिक सैनिक है। इसकी राजधानी यरूशलेम है। इतिहास और प्राचीन ग्रंथो के अनुसार इस देश का नाम ईसाई, इस्लाम और यहूदी तीनों धर्म में प्रमुख रूप से लिया जाता है। यहां की प्रमुख भाषा हिब्रू है। यहां के निवासियों को इज़रायली कहा जाता है। आज इज़रायल तकनीक, विज्ञान और रक्षा के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में से एक है।

इज़राइल का इतिहास(Israel History)

इज़राइल का इतिहास 4000 वर्ष प्राचीन माना जाता है। लगभग आज से 4000 वर्ष पहले मेसोपोटामिया की सभ्यता हुआ करती थी।

वहां उस समय मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ करता था। वहां के लोग विभिन्न देवताओं को माना करते थे और लोग मिट्टी के घरों में रहते थे। उस समय लोगों के पास ज्यादा ज्ञान न होने के कारण कोई बड़ा धर्म नहीं था। इसी सभ्यता में एक ऐसे व्यक्ति का जन्म होता है जो सभी के धार्मिक विचार को बदल कर रख देता है। वह व्यक्ति थे हज़रत इब्राहिम। लगभग 3800 वर्ष पहले उर शहर में हज़रत इब्राहिम का जन्म होता है। वे अपने समय में फैली मूर्ति पूजा को नकार कर एक ईश्वर की बात करते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर को समझने के लिए मूर्ति की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि पवित्र हृदय की आवश्यकता होती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार उन्हें ईश्वर की ओर से संदेश मिलता है कि वे अपनी ज़मीन छोड़कर ऐसे ज़मीन पर जाएं जिसे उनके वंशजों के लिए चुना गया है। तब वे अपनी जमीन छोड़कर ऐसी जगह पहुंचते हैं जिसे आज इज़राइल और फिलिस्तीन कहा जाता है। उस समय इन्हें लैंड आफ केनन कहा जाता था। इसमें पहले लेबनान, सीरिया के कुछ हिस्से और जॉर्डन के कुछ हिस्से भी शामिल थे।



           हज़रत इब्राहिम के दो बेटे होते हैं इसहाक और स्माइल। इस्माइल के पीढ़ी में आगे चलकर लगभग 2300 वर्ष पश्चात पैगंबर मोहम्मद का जन्म होता है जो इस्लाम धर्म का स्थापना करते हैं।
           इसहाक का पुत्र जेकब होता है जिसे याकूब या इसराइल भी कहा जाता है। इसके 12 पुत्र होते हैं जो लैंड आफ कैनन में 12 अलग-अलग कबीले बनाते हैं। इन्हें इज़रायल का 12 जनजाति कहा जाता है। इनमें से कुछ कबीले इज़रायल और कुछ जुडाह में था, परंतु ये पूरा बाद में इज़राइल बनता है। इन 12 पुत्रों में सबसे महत्वपूर्ण पुत्र यहूदा होता है। बाद में यहूदा के पुत्रों और उनके अनुयायियों को ही यहूदी कहा जाता है।

            उस समय यहूदियों पर बहुत बड़ा अकाल आ जाता है। उनकी नदियां सूख जाती है और भूमि भी सूख जाती है जिससे खाद्य पदार्थों की भी कमी हो जाती है। साथ ही आसपास के पड़ोसी देश भी उन पर बार-बार आक्रमण करने लगते हैं। इस कारण यहूदी लोग मिस्र की ओर पलायन करने लगते हैं। मिस्र की नदी कभी नहीं सकती थी। उस समय यहूदियों को लगता है कि उनके लिए वह जगह बहुत सुखदायी होगा। समय के साथ यहूदी लोग वहां परिश्रम करके अपनी जगह बनाते हैं। वे इतने बुद्धिमान थे कि कम समय में ही मिस्र की अर्थव्यवस्था में उनका हाथ होने लगता है। उनकी समृद्धि बढ़ने लगती है। मिस्र के राजा फराओ यह देख कर चिंतित होने लगता है कि उनके राज्य में यहूदी शरणार्थियों की आबादी बढ़ती जा रही है और कल ये लोग उनके राज्य में कब्जा भी कर सकते हैं। अपने उसी भय के कारण वह सभी यहूदियों को मारने का आदेश दे देते हैं और उन्हें गुलाम बना दिया जाता है। उन्हें बिना खाना पीना दिए प्रताड़ित कर उनसे काम करवाया जाता है। इससे मिस्र में यहूदियों की स्थिति बहुत दुखदायी हो जाती है। उस समय वहां एक यहूदी परिवार में 'हज़रत मूसा' का जन्म होता है।
हज़रत मूसा 

वह अपने समाज के लोगों को प्रताड़ित होता देखकर मिस्र में बचे यहूदी लोगों को एकत्रित करता है और कई कठिनाइयों का सामना करके उन सबको वापस अपनी पुरानी ज़मीन इज़राइल ले आता है। मिस्र से इज़राइल तक की यात्रा आसान नहीं था, परंतु हज़रत मूसा यह संभव करके दिखाते हैं। उनके उसी कार्य से यहूदियों में हज़रत मूसा का बहुत सम्मान किया जाता है। यहूदी लोग इज़राइल वापस आकर नए सिरे से अपने जीवन का शुरुआत करते हैं। इस दौरान हज़रत मूसा यहूदी लोगों को ईश्वर के 10 उपदेश बताते हैं। वह उन उपदेशों को एक पत्थर पर भी लिखवाता है जिससे यहूदी लोग उन्हें भूले नहीं और यहूदी आज भी उन उपदेशों का पालन करते हैं। इन उपदेशों का पालन कर यहूदी सबसे एकजुट समाज बन जाता है।
           1020 ई.पू. हिब्रू जनजाति के गठबंधन द्वारा इज़राइल का निर्माण होता है और राजा सोल को राजा बनाया जाता है। फिर 990 ई.पू. राजा डेविड इज़राइल का दूसरा राजा बनता है। वह अपनी बहादुरी से यहूदियों का नाम ऊंचा करता है और यरूशलम को इज़राइल का राजधानी बनाता है। वह 12 कबीलों को मिलाकर और मजबूत राष्ट्र बनाता है। इसके बाद 965 ई.पू. राजा सोलोमन इज़राइल का नया राजा बनता है। इज़राइल के इतिहास में उनका शासन काल सबसे स्वर्णिम युग माना जाता है। उस काल में उन्हें विश्व के सबसे बुद्धिमान और महान राजाओं में से एक माना जाता था। क्योंकि 960 ई.पू. वह यरूशलम के सबसे ऊंची चोटी पर विश्व का सबसे भव्य मंदिर टेंपल माउंट का निर्माण करवाता है। इसे यहूदियों का पहला मंदिर या सोलोमन मंदिर भी कहा जाता है। यह कोई साधारण मंदिर नहीं था, बल्कि यहूदियों के आस्था का केंद्र था। इसे बनाने के लिए विश्व के सबसे कीमती पत्थरों और सोने का उपयोग किया गया था। उस समय विश्व के विभिन्न देशों से इस मंदिर के भव्यता को देखने के लिए यरूशलम आते थे। इसके अंदर हज़रत मूसा द्वारा पत्थर पर लिखवाए गए 10 उपदेशों को भी रखवाया गया। वही जगह बाद में ईसाइयों और मुसलमानों का पवित्र स्थल बनता है। इसे लेकर आज वर्तमान समय में काफी विवाद होता है। इसी मंदिर में राजा सोलोमन लोगों को न्याय देते थे। उस समय इज़राइल में काफी सुख समृद्धि था।
           इसके बाद 720 ई.पू. एक असिरिया साम्राज्य हुआ  करता था। यह साम्राज्य इज़राइल पर हमला कर देता है और अनगिनत यहूदियों को मार कर उन्हें अपना गुलाम बना लेता है। साथ ही इज़रायल के कई हिस्सों में भी कब्जा कर लेता है। 
            इसके बाद 'Siege of Jerusalem' की घटना होती है। 578 ई.पू. बेबीलोन साम्राज्य इज़राइल पर आक्रमण करता है और 4 सालों तक यहूदियों का बहुत प्रताड़ना करता है।

इससे यहूदी लोग इज़राइल छोड़कर दूसरे देशों में भागने लगते हैं। उस समय कुछ यहूदी लोग भाग कर भारत तक भी आ जाते हैं। बेबीलोन 4 वर्षों के भीतर यरुशलम शहर को नष्ट कर देता है, अनगिनत यहूदियों को मार देता है और यहूदियों का पवित्र स्थल टेंपल माउंट को भी तोड़ देता है। इज़राइल में बचे यहूदियों के पैरों में बेड़ियां बांधकर उन्हें बेबीलोन ले जाया जाता है और उनसे वहां गुलामी करवाया जाता है। इसी को 'Siege of Jerusalem' कहा जाता है। इस घटना के बाद इज़रायल का नामो निशान मिट जाता है।
          इसके बाद ईरान के हिस्से में पर्शियन साम्राज्य का उदय होता है। इसका नींव राजा साइप्रस द ग्रेट रखता है। वह बेबीलोन, मिस्र और यूरोप के कुछ हिस्सों को जीतकर एक बड़ा पर्शियन साम्राज्य बनाता है। वह 516 ई.पू. में बेबीलोन के यहूदियों को स्वतंत्र कर देता है और उन्हें इज़राइल वापस जाकर यरुशलम में फिर से अपना मंदिर बनाने को कहता है। इस तरह से यहूदी लोग वापस इसराइल आकर यरुशलम में जिस स्थान पर उनका पवित्र मंदिर तोड़ा गया था उसे पुनः निर्माण कर करते हैं जिसे दूसरा मंदिर कहा जाता है।
           इसके बाद कुछ शताब्दी पश्चात् एक एंटीओकस 4th नामक राजा जो सेल्यूसिड साम्राज्य का राजा था, इज़राइल पर कब्जा कर लेता है और यहूदियों के दूसरे मंदिर के ऊपर अपने देवता ज़ूस का मूर्ति रखवा देता है। यह यहूदियों का बहुत बड़ा अपमान था। इससे वे नाराज़ हो जाते हैं और वे विद्रोह कर देते हैं जिसके बाद उस मूर्ति को हटाया जाता है।
           फिर पहली शताब्दी में रोमन साम्राज्य  का उदय होता है। यह साम्राज्य 63 ई.पू. इज़राइल को अपने अधीन कर लेता है और इज़राइल को रोम का एक राज्य बनाकर एक यहूदी यहूदी राजा हेरोड को इसका राजा बना देता है। साथ ही हेरोड का ध्यान रखने के लिए अपने एक व्यक्ति को गवर्नर बना देते हैं जिससे यहूदी लोग कोई विद्रोह न करे। यहूदियों को अपने धर्म का पालन करने के लिए पूरी स्वतंत्रता भी दी जाती है। राजा हेरोड अपने शासनकाल में दूसरे मंदिर को विस्तार करके उसे बड़े मंदिर में परिवर्तित कर देता है।
            इसके बाद इज़राइल के बेथलेम में एक साधारण यहूदी परिवार में ईसा मसीह का जन्म होता है। वह जैसे-जैसे बड़ा होता है लोगों को प्रेम, दया और भाईचारा का उपदेश देना शुरू कर देता है। उसके द्वारा किए जाने वाले चमत्कारों से लोग उसे ईश्वर का पुत्र मानने लगते हैं। वह यहूदी समाज में बहुत ज्यादा लोकप्रिय हो जाता है। ये सब देखकर कुछ कट्टर धार्मिक यहूदी लोगों को लगता है कि यह उनके हजारों वर्षों के  संस्कृति और रीति रिवाज को बदल कर रख देगा और ईसा मसीह उनके धर्म के विरुद्ध बोल रहे हैं। इसी धार्मिक टकराव के चलते ईसा मसीह को वर्ष 30 के समय सूली पर चढ़ा दिया जाता है। ईसा मसीह के विषय में यह कहा जाता है कि उस दौर में उनका प्रभाव उतना अधिक नहीं था, परंतु यहूदियों द्वारा जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया तब उनका प्रभाव बढ़ने लगता है। ईसा मसीह के जाने के बाद वर्ष 66 में धार्मिक लोग एक दी ज़ीलोट्स नामक संगठन बनाते हैं। उस संगठन का उद्देश्य रोमन लोगों को इज़राइल से भागना था। वर्ष 70 में प्रथम यहूदी-रोमन युद्ध होता है। इसमें रोम का सेनापति टाइटस इज़राइल को हरा देता है। और वह यरुशलम शहर को नष्ट कर देता है। साथ ही वह यहूदियों के दूसरे मंदिर को भी नष्ट कर देता है। परंतु इस मंदिर का एक दीवार बच जाता है जो आज भी है। इसे लोग आज भी प्रार्थना करते हैं। इसके बाद तीसरा मंदिर कभी नहीं बनाया गया। इसके बाद सेनापति टाइटस वर्ष 70 से 135 तक यहूदियों को बहुत प्रताड़ित करता है। इस दौरान रोमन सेना कई लाख यहूदियों मार देता है। साथ ही यहूदियों को गुलाम बनाकर उन पर इज़रायल में रहने के लिए टैक्स लगा दिया जाता है। इस कारण यहूदी लोग इज़राइल छोड़कर विश्व के अन्य देशों में भागने लगते हैं। वर्ष 135 तक इज़राइल में यहूदियों का नामो निशान मिट जाता है। इसके बाद रोमन इसका नाम फिलिस्तीन कर देते हैं और रोमन ईसा मसीह के उपदेश अनुसार नए ग्रंथ लिखकर इस ज़मीन पर नया धर्म ईसाई का स्थापना करते हैं। उस समय बहुत ही कम लोग ईसाइयत को मानते थे। यह धीरे-धीरे इज़राइल में फैल रहा था क्योंकि रोमन उन्हें इसके लिए सज़ा भी देते थे।
          वर्ष 306 में कांस्टेनटाइन रोम का नया राजा बनता है। उन्हें रोमन इतिहास में एक महान राजा माना जाता है। वैसे तो रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म को मानना एक अपराध था, परंतु कांस्टेनटाइन के राजा बनने के बाद वह ईसाई धर्म को मान्यता दे देता है। वह यरुशलम में ईसा मसीह के कब्र पर एक गिरिजाघर बनवाता है। एक बार उनकी माता वहां जाती है, तो वह कहती है कि उन्हें ईसा मसीह का क्रॉस मिला है जिस पर उन्हें सज़ा दिया गया था। उसे देखकर कांस्टेनटाइन भावुक हो जाता है। वह स्वयं ईसाई धर्म अपना लेता है और रोमन साम्राज्य का राष्ट्रीय धर्म बना दिया जाता है। चूंकि ईसा मसीह को यहूदियों ने सूली पर चढ़ाया था, तो कांस्टेनटाइन यहूदियों को मरवाना शुरू कर देता है। वह कई यहूदियों को गुलाम बनाकर दूसरे राज्य को बेच देता है। इस कारण बाकी बचे हुए यहूदी भी इज़राइल छोड़कर भागने लगते हैं और जहां उन्हें शरण मिला वहीं वे रहने लगते हैं। इस दौरान गुप्त वंश के सीरा प्रीमल(इरु ब्राह्मण) कुछ यहूदियों को भारत में स्वतंत्र रूप से रहने और अपना धर्म निभाने का बिना किसी शर्त के अनुमति दे देता है। तब से भारत में उनकी कुछ संख्या आज भी रहती है। इस तरह से यहूदी लोग विश्व के विभिन्न देशों में छोटी-छोटी संख्या में रहने लगते हैं। कुछ अरब में, कुछ यूरोप में और कुछ अफ्रीका में चले जाते हैं। वे जहां भी जाते हैं उन पर अत्याचार होने लगता है और रोमन साम्राज्य के अस्तित्व वर्ष 638 तक उनके साथ यही होता है। क्योंकि वर्ष 638 से पहले ही पैगंबर मोहम्मद मक्का मदीना में इस्लाम धर्म का स्थापना कर देते हैं। इस्लाम के मान्यता अनुसार एक रात पैगंबर मोहम्मद मक्का मदीना से उड़ते हुए घोड़े से यरूशलम जाते हैं और वहां टेंपल माउंट के स्थान पर नमाज पढ़ते हैं। बाद में इस्लामी शासको द्वारा वहीं अल अक्सा मस्जिद बनवाया जाता है। थोड़े ही दूरी पर डम ऑफ़ द रॉक है जहां से एक पत्थर पर बैठकर पैगंबर मोहम्मद उड़ते हुए घोड़े से जन्नत की ओर जाते हैं। पैगंबर मोहम्मद के जाने के बाद वर्ष 638 में इस्लाम जैसे ही यरूशलम पहुंचता है रोमन लोगों को इस्लाम लोगों द्वारा भगा दिया जाता है। इसके बाद इज़रायल पर इस्लामी लोगों का अधिकार हो जाता है। इस्लामी लोग यहूदियों को अपने जैसे ही मानते थे इसलिए वे यहूदी लोगों को इज़राइल आकर उन्हें अपनी धार्मिक स्वतंत्रता के अनुसार रहने का आदेश दे देते हैं। उस समय बहुत ही कम यहूदी इज़राइल वापस आते हैं।
         वर्ष 638 के बाद इस्लाम काफी तेजी से विश्व के कुछ हिस्सों में फेल जाता है जैसे- भारतीय उपमहाद्वीप, अफ्रीका और यूरोप के कुछ हिस्सों में। वर्ष 638 से 1099 तक इस्लाम का शासन रहता है। इस बीच यरूशलम और बेबीलोन में यहूदियों का निवास मजबूती से हो जाता है। यूरोप के जर्मनी में भी एक मजबूत यहूदियों का निवास स्थान बन जाता है। साथ ही स्पेन के कुछ हिस्सों में भी यहूदी रहने लगते हैं। विश्व भर में यहूदियों के बिखरे होने के बावजूद यहूदियों के संस्कृति में काफी विकास होता है। इस बीच यहूदियों को काफी छूट दिया जाता है। परंतु 9वीं और 10वीं वीं शताब्दी में कुछ मुस्लिम ऐसे भी होते हैं जो यहूदियों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाते हैं जिसके कारण यहूदी अपना पहचान सार्वजनिक रहना शुरू कर देते हैं। इस दौरान यहूदियों का नरसंहार भी होता है जिसमें स्पेन ग्रेनाडा नरसंहार सबसे प्रसिद्ध है। यहूदियों के साथ एक नरसंहार मोरक्को में भी होता है। साथ ही वर्ष 1096 के समय जर्मनी में यहूदियों के साथ बहुत ज्यादा प्रताड़ना होने लगता है। यह अत्याचार और प्रताड़ना पूरे यूरोप में फैलने लगता है। इसके बाद वर्ष 1099 के समय यूरोपीय लोगों ने यरूशलम पर आक्रमण करके बड़े पैमाने पर यहूदियों और मुसलमानों का नरसंहार करते हैं। फिर से यहूदी यरूशलम छोड़कर भाग जाते हैं। इस घटना को The Crusades कहा जाता है। इसके बाद यूरोपीय शासकों के यरुशलम में कब्जा करने के बाद उसे फिर से ईसाई शहर में परिवर्तन करने का प्रयास किया जाता है। वे वर्ष 1099 से 1189 यरूशलम पर राज करते हैं। इस दौरान यहूदियों को वहां गुलाम की तरह रखा जाता है। उन्हें न ही धार्मिक स्वतंत्रता दिया जाता और न ही व्यापार की अनुभूति होती है। साथ ही वहां के यहूदियों और मुसलमानों पर जबरन ईसाई धर्म थोप दिया जाता है। परंतु वर्ष 1089 में मुस्लिम शासकों द्वारा फिर से यरूशलम पर आक्रमण करके यूरोपीय शासकों को भगा दिया जाता है और फिर से यहूदियों को वापस बुलाया जाता है, परंतु इस बार भी बहुत ही कम संख्या में यहूदी वापस आते हैं। जब मोरक्को और स्पेन में यहूदियों को प्रताड़ित किया जाता है, तो यहूदी लोग वहां से भाग कर मध्य यूरोप की ओर चले जाते हैं। फिर जब वहां उन पर अत्याचार होता है तो वे वहां से भी पलायन कर लेते हैं। इस तरह उन पर जहां भी अत्याचार होता, वे वहां से पलायन करने लगते हैं। अर्थात वे 3000 वर्षों से अलग-अलग जगह में भागते रहते हैं। इतना ही नहीं यूरोप में जब 1346 से 1353 तक फ्लैग की महामारी फैलती है जिसमें यूरोप की एक तिहाई आबादी प्रभावित होती है उसके लिए भी यहूदियों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसके कारण यहूदियों को बहुत ही क्रूर तरीके से मार दिया जाता है। 
            वर्ष 1556 में ऑटोमन साम्राज्य यरूशलम को अपने अधीन कर लेता है और यरुशलम शहर को नए सिरे से बनाया जाता है।

साथ ही ऑटोमन साम्राज्य द्वारा यहूदी, मुस्लिम और ईसाइयों में लड़ाई न हो इसके लिए यरूशलम को तीन भागों में बांट दिया जाता है ताकि यहूदी वेस्टर्न वोल में प्रार्थना, मुस्लिम अल अक्सा मस्जिद में और ईसाई अपने गिरिजा घर में जा सकें। साथ ही वे आपस में शांति से मिलजुल कर रहें।

            वर्ष 1648 के आसपास लगभग 75000 यहूदियों की संख्या होती है जिसमें से अधिकांश पोलैंड के हिस्से में रहते थे। साथ ही उस समय ब्रिटेन में भी यहूदियों की कुछ आबादी रहती थी। उस समय अमेरिका भी ब्रिटेन के अधीन था। इस दौरान ब्रिटेन के कुछ यहूदी भी अमेरिका चले जाते हैं।
            जब फ्रांस की क्रांति के बाद नेपोलियन का उदय होता है। तब फ्रांस में पहली बार यहूदियों को रहने का आदेश दिया जाता है। नेपोलियन यहूदियों का बहुत सम्मान करता था। इसके शासन में यहूदी लोगों के प्रति नफरत बहुत कम होता है और वे सुखी से रहने लगते हैं। परंतु वर्ष 1850 में नेपोलियन की मृत्यु के बाद यूरोप में Anti Semitism शब्द का उपयोग किया जाता है अर्थात् यहूदियों के प्रति नफरत। यानी यहूदियों को किसी भी बहाने से खुलेआम मार देना। यह Anti Semitism थियोडोर हरज़ल के समय तक चलता रहता है।

2 में 1860 में हंगरी में थियोडोर हरज़ल का जन्म हुआ था। बाद में Anti Semitism के कारण वह फ्रांस आ जाता है। यहां आकर वह पत्रकारिता करने लगता है। फ्रांस 1890 में रुस से एक युद्ध हार जाता है और इसका उत्तरदायी एक यहूदी अफसर अल्फ्रेड ड्रेफस पर डाल दिया जाता है।
थियोडर हरज़ल यह समाचार कवर करता है। साथ ही Anti Semitism और अनेकों अत्याचारों के बाद वह विश्व के सभी यहूदियों को एकत्रित करने का निर्णय करता है ताकि यहूदियों के लिए एक नया देश बनाया जा सके जहां वे सभी सुख पूर्वक रह सके। वह इसके लिए एक World Jews State नामक एक पुस्तक भी लिखता है। वह वर्ष 1897 मे World Zionist Congress नामक एक संस्था स्विट्ज़रलैंड में बनाता है। इस संस्था से विश्वभर के सभी यहूदी जुड़ते हैं और इसे पैसे भी दान करते हैं। साथ ही कई वर्षों के अत्याचारों के बाद सभी यहूदी एकत्रित होते हैं। वर्ष 1904 में थियोडर हरज़ल की मृत्यु हो जाती है। परंतु उनके मृत्यु के बाद भी उनके द्वारा बनाए गए संस्था का प्रभाव यहूदियों पर बहुत अच्छे से हो जाता है। इसके बाद यहूदी लोग छोटी संख्या में यरूशलम की ओर पलायन करने लगते हैं। इसे आलिया कहा जाता है यानि दूसरे देशों से यहूदियों का यरूशलम की ओर पलायन करना‌।
           1881 से 1904 के दौरान प्रथम आलिया शुरू हो जाता है। इस दौरान विश्व के विभिन्न देशों से 30,000 के आसपास यहूदी यरुशलम आते हैं। प्रथम आलिया में आने वालों में से एक यहूदी इलाइज़र बेन यहूदा थे।

वह ध्यान देता है कि अलग-अलग देशों से आने वाले यहूदी अलग-अलग भाषा से था, कोई जर्मन, कोई रूसी, कोई अरबी तो कोई अंग्रेजी बोल रहा था। सभी यहूदी इस कारण आपस में घुल मिल नहीं पा रह थे। इस समस्या को सुलझाने के लिए यहूदा इज़राइल की पुरानी विलुप्त होती भाषा हिब्रू को पुनः बचाने का प्रयास करता है। ताकि यहूदियों का एक नया देश बन सके। इसके लिए वह यरुशलम में बहुत सारे हिब्रू भाषी विद्यालय खोलता है जिसमें विश्व के अन्य देशों से आने वाले लोग हिब्रू भाषा सिख सके‌।
           वर्ष 1903 में रूस के युद्ध क्षेत्रों में एन्टी सेमिटिस्म के कारण यहूदियों का नरसंहार शुरू हो जाता है। इसका कारण 1904 से 1914 तक दूसरा आलिया शुरू हो जाता है। इस दौरान रूस से लगभग 40 हज़ार यहूदी यरूशलम आ जाते हैं‌। वे यहां आकर एक नया शहर तेल अवीव का निर्माण करते हैं। इस शहर में उस समय केवल हिब्रू भाषा का ही प्रचलन होने लगता है। वहां के अखबार और पुस्तकें भी हिब्रू भाषा में ही होती थी। वहां यहूदी लोग खेती करना भी शुरू कर देते हैं। दूसरे आलिया के दौरान रोमानिया, बुल्गारिया, यमन और ईरान से भी कई यहूदी इज़राइल आते हैं।
             वर्ष 1914 में यूरोप में पहला विश्व युद्ध होता है। इस युद्ध में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, बुल्गारिया और ऑटोमन साम्राज्य एक तरफ थे। दूसरी ओर ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, इटली और अमेरिका एक तरफ थे। इन दोनों दलों में 1914 से 1918 के बीच भयंकर युद्ध होता है। उस समय यहूदियों की World Zionist Congress पार्टी यहूदियों के लिए अपना एक देश बनाना चाहती थी। इस युद्ध में ब्रिटेन को पैसों की आवश्यकता होती है। वर्ष 1917 में ब्रिटेन और Zionist संस्था के बीच एक समझौता होता है। इस समझौते के तहत यहूदी लोगों का ब्रिटेन को पैसे से सहायता करना होता है और यदि ब्रिटेन युद्ध जीतता है, तो वह फिलिस्तीनी क्षेत्र में यहूदियों को एक अलग देश देगा। इस समझौते को Balfour डिक्लेरेशन कहा जाता है। परिणामत: प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटेन वाला दल युद्ध जीत जाता है और ऑटोमन साम्राज्य वाला दल हार जाता है। 1919 में ब्रिटेन ऑटोमन साम्राज्य को कई भागों में विभाजित कर देता है जिसमें ओटोमन सम्राज्य का फिलिस्तीन और जॉर्डन वाला भाग ब्रिटेन अपने अधीन कर लेता है और 1920 के बाद ब्रिटिश मेंडेट फिलिस्तीन कहा जाता है। इसके बाद समझौते के अनुसार यहूदियों को नया देश मिलना था। परंतु फिलिस्तीनी लोग इसका विरोध करने लगते हैं ताकि नया देश न बने। फिलिस्तीनी विद्रोह के दौरान पहले और दूसरे आलिया में आए यहूदी स्वयं की रक्षा के लिए एक संगठन का निर्माण करते हैं जिसे हगानाह कहा जाता है। इस कारण से 1920 से ही यहूदियों और फिलिस्तीनियों के बीच झगड़ा शुरू हो जाता है।               बालफर डिक्लेरेशन के तहत 1919 से 1923 तक तीसरा आलिया शुरू हो जाता है। इस दौरान यूरोप से यहूदियों की कुछ आबादी ब्रिटिश फिलिस्तीन आती है।
           इसके बाद 1924 से 1929 में चौथा आलिया शुरू हो जाता है। इस दौरान एंटीसेमिटिस्म के कारण पोलैंड, लिथुआनिया, रूस और रोमानिया से 82,000 के आसपास यहूदी ब्रिटिश फिलिस्तीन आते हैं। वे यहां आकर छोटे-छोटे शहर बसाने लगते हैं। साथ ही वे अपना जीवन चलाने के लिए उद्योग और खेती भी करने लगते हैं।
             1930 से 1939 तक पांचवा आलिया शुरू होता है। इस दौरान लगभग 2,50,000 यहूदी फिलिस्तीन आते हैं क्योंकि इस दौरान जर्मनी में हिटलर का उदय होता है। वह यहूदियों से बहुत ही नफरत करता था। वह यहूदियों पर बहुत ज्यादा अत्याचार करने लगता है। इस कारण इस आलिया के दौरान बहुत अधिक संख्या में यहूदी फिलिस्तीन आते हैं। इनमें से ज्यादातर यहूदी पढ़े लिखे थे। फिलिस्तीन में यहूदियों की बढ़ती जनसंख्या से फिलिस्तीन के अरबी लोग चिंतित होने लगते हैं। इस कारण से यहूदियों और फिलिस्तीनियों के बीच गृहयुद्ध शुरु हो जाता है जिसमें यहूदी, फिलिस्तीन और ब्रिटिश भी मारे जाते हैं। इस विद्रोह को रोकने के लिए 1939 में ब्रिटेन एक वाइट पेपर जारी करता है। इसके तहत अगले 1 वर्ष में केवल 10,000 यहूदियों को ही फिलिस्तीन आने की अनुमति होती है। इससे कुछ वर्षों तक फिलिस्तीनियों का गुस्सा शांत हो जाता है। 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू होता है जिसमें हिटलर यूरोप के कई देशों पर कब्जा कर लेता है। वह यहूदियों को बड़े ही क्रुरता से मारने लगता है। हिटलर के क्रुरता के कारण ही कोई भी यहूदी यूरोप में रहना नहीं चाहता था। चूंकि फिलिस्तीन में केवल 10,000 यहूदी ही आ सकते थे इसलिए 1939 में आलिया बेट शुरू हो जाता है अर्थात यहूदियों का गैर कानून तरीके से फिलिस्तीन पहुंचना। इस कारण से ब्रिटेन के कड़ी के निगरानी के बावजूद 1939 से 1945 के बीच लगभग 1 लाख से भी अधिक यहूदी फिलिस्तीन आ जाते हैं। दूसरी तरफ दूसरा विश्व युद्ध भी समाप्त हो जाता है। परंतु तब तक यूरोप में हिटलर 60 लाख यहूदियों को बड़े क्रुरता से होलोकास्ट से मरवा देता है। इस कारण से यहूदी किसी भी तरह से फिलिस्तीन आना चाहते थे। वे सभी यहूदी पानी जहाज, रेगिस्तान और जंगलों के रास्ते जिन्हें जो मिला अपनी धन संपदा छोड़कर फिलिस्तीन आ जाते हैं। इस तरह से देखते ही देखते असंख्य संख्या में यहूदी फिलिस्तीन आ जाते हैं। यहां आकर वे छोटे-छोटे तंबुओं में रहने लगते हैं। उन्हें जैसी सुविधा मिलती है उसी में खुशी से रहते हैं। क्योंकि हिटलर द्वारा होलोकास्ट से दिया गया प्रताड़ना का दुख उनसे बेहतर कोई नहीं जानता था। इनमें से ज्यादातर यहूदी होलोकास्ट से बच गए थे। 1945 तक फिलिस्तीन में यहूदियों की आबादी 31% हो जाती है और आगे भी बढ़ती रहती है। इसी के कारण 1946 और 1948 में यहूदियों और फिलिस्तीनियों के बीच हिंसा शुरू हो जाता है। इसी हिंसा को रोकने के लिए ब्रिटेन एक कानून बनाता है। इसके तहत यदि कोई यहूदी गैर कानूनी तरीके से फिलिस्तीन आता है, तो उसे दंड दिया जाएगा। इस कारण से यहूदी नाराज हो जाते हैं और यहूदी संगठन हगानाह, इरगुन और लेही इसका विरोध करने लगते हैं। फिलिस्तीन में जिस बिल्डिंग से ब्रिटेन शासन कर रहा था उसमें इरगुन संगठन हमला कर देता है जिसमें 93 ब्रिटिश सैनिक मारे जाते हैं। इस कारण जब ब्रिटेन इरगुन के सैनिकों को मौत की सजा देता है, तो इरगुन संगठन भी ब्रिटेन के सैनिकों को खुलेआम पेड़ पर लटका देता है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन कमजोर हो जाता है। फिर भी ब्रिटेन चाहता था कि किसी भी तरह से यहूदी और फिलिस्तीनी समझौता कर लें। परंतु उनके अनेकों प्रयास करने पर भी ऐसा नहीं हो रहा था। क्योंकि यहूदी फिलिस्तीन में अपना एक देश बनाना चाहते थे और फिलीस्तीनी ऐसा नहीं चाहते थे। फिर ब्रिटेन परेशान होकर 1947 में इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र ले जाता है। साथ ही ब्रिटेन यह घोषणा कर देता है कि 15 मई 1948 को ब्रिटेन फिलस्तीन को स्वतंत्र करके चला जाएगा। 
             

 इजराइल का स्थापना

जब ब्रिटिश सरकार द्वारा यहूदियों और फिलिस्तीनियों का कोई हल नहीं निकलता है, तो वह इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र(United Nation) के पास लेकर जाता है। 1947 में संयुक्त राष्ट्र फिलीस्तीन को दो भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखता है-एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य। वह 1947 में फिलीस्तीन को कुछ इस तरह से विभाजित करता है।
गुलाबी रंग वाला अरब राज्य का और हरा रंग वाला यहूदी राज्य का और सफेद रंग वाला यरूशलम जो यहूदी, इस्लाम और ईसाई तीनों धर्म का प्रमुख स्थल है उसे संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण में रखा जाता है। यह यहूदियों को तो स्वीकार होता है, परंतु फिलिस्तीनियों को स्वीकार नहीं होता है।
         चूंकि ब्रिटेन को 15 मई 1948 को फिलिस्तीन को छोड़ना था। ठीक इसके एक दिन पहले 14 मई 1948 को David Ben Gurion इज़राइल को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर देता है। इस घोषणा के थोड़े ही समय बाद उस समय के दो शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका और सोवियत संघ इज़राइल को मान्यता दे देते हैं। इस फिलिस्तीन रेजोल्यूशन को लेकर संयुक्त राष्ट्र में वोट भी किया जाता है जिसमें 33 वोट इसके पक्ष में, 13 वोट इसके विरुद्ध में और 10 देश वोट नहीं करते हैं। इसके विरुद्ध में वोट देने वालों में 12 मुस्लिम देश और 13वां देश भारत था। चूंकि अधिकांश वोट पक्ष में होता है इसलिए 14 मई 1948 को इज़राइल का निर्माण हो जाता है।
         इसके ठीक तुरंत बाद ही 1948 में अरब इज़राइल युद्ध होता है मिस्र, जॉर्डन, सीरिया और इराक मिलकर इज़राइल पर आक्रमण करते हैं। परंतु इज़राइल इन सभी अरब देशों पर भारी पड़ता है और सबको हराकर फिलिस्तीन के कुछ हिस्सों को जीतकर कुछ इस तरह से अपने क्षेत्र का विस्तार कर लेता है।

अधिकांश भूमि पर इज़राइल का अधिकार है और फिलिस्तीन के दो हिस्से हैं गाज़ा और वेस्टर्न बैंक।
         इस तरह से इज़राइल का अरब देशों से और भी कई युद्ध होता है जिसमें इजरायल हमेशा जीतता रहा है। वह सभी ओर से शत्रु देशों से घिरा हुआ है परंतु फिर भी एक शक्ति शाली राष्ट्र के रूप में उभर कर आया है।

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

प्रेमानंद महाराज : एक ऐसा संत जिनकी दोनों किडनियां है खराब,

 संत वही जो भक्तों के जीवन में प्रकाश भरकर उनके जीवन को उज्ज्वल बनाएं और जिन्हें देखकर लोगों को कष्टों में भी संयम से लड़ने का शक्ति मिले।

          हमारे भारत देश में अनेक संत हैं। यहां जिस संत की बात हो रही है। वे हमारे देश के प्रसिद्ध संत और आध्यात्मिक गुरु हैं। ऊपर वर्णित सभी बातें उन पर सटीक बैठती है। वे वृंदावन की पावन भूमि से श्री कृष्ण भक्ति, साधना और सरल जीवन जीने का संदेश देते हैं। वे संत हैं प्रेमानंद महाराज जी।

जीवन परिचय

          प्रेमानंद महाराज जी का जन्म 30 मार्च 1969 अखरी गांव, कानपुर जिला, उत्तर प्रदेश में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका जन्म का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडेय था। उनके पिता का नाम श्री शंभूनाथ पांडेय और माता का नाम रमा देवी था और वे दोनों बहुत ही धार्मिक विचारों वाले थे। उनके परिवार में वातावरण ही ऐसा होता था कि उनके यहां साधु-संतों और सत्संगों का आगमन सदैव रहता था। उनके दादा जी एक सन्यासी थे और बाद में उनके पिताजी भी एक सन्यासी बन जाते हैं। इसी कारण से ही नन्हें अनिरुद्ध में भी बचपन से ही ईश्वर के पति अत्यंत ही भक्ति होती है। वे बचपन से ही अन्य बच्चों से बिल्कुल भिन्न थे। वे सदैव एकांत में ही रहना पसंद करते थे। जहां उनके आयु के बच्चों का ध्यान खेलकूद में होता था, वहीं उनका रुचि भक्ति गीतों, शास्त्र पाठन और ध्यान में होता था। वे नन्हे से आयु में ही कई सारे धार्मिक पुराणों का अध्ययन करने लगते हैं। उनके घर में जब कभी भजन कीर्तन होता, तो वे पूरे मन से हनुमान चालीसा, सुंदरकांड और श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी जैसे भजन बहुत ही अच्छे तरीके से गाया करते थे। 

          उनके मन में बचपन में एक विचार आता है क्या माता-पिता का प्रेम सदा ही रहेगा, एक दिन तो वे भी चले जाएंगे तब मेरा इस संसार में कौन होगा। धीरे-धीरे उनके मन में उत्तर स्पष्ट हो जाता है कि उनका तो केवल ईश्वर ही है। अपने इसी विचार से वे 13 वर्ष के होने पर एक बहुत बड़ा निर्णय लेते हैं। वे घर छोड़कर ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चलने का निश्चय करते हैं। वे इसके विषय में सबसे पहले अपने मां को बताते हैं। इस पर उनके मां उन्हें कहते हैं कि ईश्वर प्राप्ति के लिए घर से भागा थोड़ी जाता है, यदि ईश्वर प्राप्त करना है, तो भजन करो। इस पर नन्हे अनिरुद्ध उन्हें कहते हैं कि उनका मन उन्हें एक संन्यासी बनने को कह रहा है। उस समय उनकी मां को लगता है कि इसने किसी बाबा का सत्संग सुन लिया होगा इसलिए इसके मन में ऐसे विचार आ रहे हैं। इसके बाद उनकी मां घर के कार्यों में व्यस्त हो जाती है। परंतु दृढ़ इच्छा लिए नन्हे अनिरुद्ध अगले ही सुबह 3:00 बजे के आस-पास जब उनके माता-पिता गहरी नींद में होते हैं उन्हें प्रणाम करके घर से निकल जाते हैं। अपने घर से निकलते समय वे एक संन्यासी जीवन की मूलभूत आवश्यकता वाली चीज़ें एक गीता, दूसरा कुशा का आसान, तीसरा पीतल का लोटा और चौथा चादर ले जाते हैं। वे अपने साथ कोई भी खाने-पीने का समान, पैसे और अतिरिक्त कपड़े नहीं हैं। वे अंधेरे में चलते हुए बहुत दूर तक निकल जाते हैं। सुबह होने तक वे एक शिव मंदिर में पहुंच जाते हैं। मंदिर पहुंचकर वे कई घंटों तक वहीं भूखे प्यासे बैठे रहते हैं। जब थोड़ा समय बीतता है, तो उन्हें थोड़े समय के लिए अपने घर का विचार आता है। घर में तो उनकी माता उन्हें प्रेम पूर्वक खाना खिला देती था, परंतु यहां उन्हें खिलाने के लिए कोई नहीं था। वे थोड़े समय के लिए सोचते हैं कि आगे क्या होगा? परंतु वे स्वयं  से कहते हैं कि चाहे मृत्यु आ जाए, तो भी घर नहीं जाऊंगा और ईश्वर प्राप्त करके ही रहूंगा। वे शिवलिंग के सामने ध्यान में मगन हो जाते हैं‌। तभी एक व्यक्ति उन्हें आवाज देकर उनका ध्यान तोड़ता है। वे उस व्यक्ति को दरवाजे के सामने खड़े देखते हैं। वह व्यक्ति उनसे पूछते हैं कि वहां एक सूरदास जी रहते हैं, क्या उन्होंने उसे कहीं देखा है। नन्हे अनिरुद्ध उन्हें उत्तर देते हैं कि उन्हें नहीं पता और वे अभी-अभी वहां आए हैं। वह व्यक्ति उनसे कहता है कि वह स्वामी जी के लिए दही लाया है, वे यहां नहीं है तो आप ही पी लीजिए। ऐसा कहते हुए वह व्यक्ति दही का बर्तन नन्हे अनिरुद्ध के हाथों में थमा देते हैं। नन्हे अनिरुद्ध दही पी लेते हैं। इससे उनका भूख मिट जाता है। साथ ही हृदय और आत्मा भी भर जाता है। वे सोचते हैं कि उन्होंने किसी से कुछ भी नहीं मांगा था फिर जब उनका शरीर भूख से टूट रहा था, तब उन्हें दही कैसे मिल गया। वे समझ जाते हैं कि वह अवश्य ही भगवान शिव का संकेत है और उनके हर कदम पर भगवान शिव है। दूसरी ओर जब नन्हे अनिरुद्ध के माता-पिता को पता चलता है कि उनका पुत्र भाग गया है, तो वे चिंतित हो जाते हैं। उनके माता-पिता उन्हें तीन दिन तक तलाश करते रहें, तब उन्हें कोई बताता है कि एक गोरा सा लड़का वहां मंदिर में बैठा है। उनके माता-पिता और भाई वहां तुरंत ही जाते हैं। जैसे ही नन्हे अनिरुद्ध उन्हें देखते हैं उन्हें भय लगने लगता है। वे पिता के सख्ती और डांट से बहुत डरते थे। उनके पिता उन्हें उठने के लिए कहते हैं परंतु अनिरुद्ध चुपचाप वहीं बैठे रहते हैं। जब उनके पिता उन्हें दूसरी और तीसरी बार कठोरता से उन्हें उठने के लिए कहते हैं, तो वे उन्हें दृढ़ता से उत्तर देते हैं कि उनका जीवन अब ईश्वर के नाम है, चाहे जो हो जाए अब वे घर नहीं जाएंगे। उनकी ये बातें सुनकर पिता भावुक हो जाते हैं। उनके पिता उन्हें भावुक होकर उन्हें गले लगाते हैं और तीन बार राम का नाम लेते हैं। वे अपने पुत्र को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं जाओ पुत्र यदि तुम ऊष्ण भूमि पर भी बैठोगे, तो वहां फूलों की वर्षा होगी, संसार का कोई भी शक्ति तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर पाएगी। साथ ही वे किसी की बेटी या स्त्री को कुदृष्टि से देखने के लिए भी उन्हें माना करते हैं। नन्हे अनिरुद्ध अपने पिता से कहते हैं कि वे जीवन भर ब ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे और कभी भी किसी को कुदृष्टि से नहीं देखेंगे। उस दिन से वे कभी भी अपने परिवार से नहीं मिलते हैं। उनके पिता का आशीर्वाद उन्हें आज भी संभाला हुआ है।
            इसके बाद नन्हे अनिरुद्ध का उद्देश्य केवल और केवल ईश्वर प्राप्ति होता है। इसी उद्देश्य से वे भगवान शिव की नगरी काशी की ओर प्रस्थान करते हैं। काशी पहुंच कर वे सर्वप्रथम नैष्टिक ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं। इससे उन्हें आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी का नाम मिलता है। बाद में उन्हें पूर्ण सन्यास होने के बाद स्वामी आनंद आश्रम का उपाधि मिलता है। वे काशी के तुलसी घाट में ही अपना तपस्थल बनाते हैं। तुलसी घाट में स्थित एक प्राचीन पीपल वृक्ष के नीचे वे निवास करने लगते हैं‌। वे वहीं अपनी गहरी साधना करते। रात के समय वे इसी वृक्ष के नीचे सोया करते और सर्दियों के समय वे गेहूं की पुरानी बोरियों को ओढ़ कर सोते। किसी भी परिस्थिति में यही उनका आश्रम होता था। उस समय उनका दिनचर्या बहुत ही सख्त और अनुशासित होता था। वे रात के 2:00 बजे उठ जाते थे और पहला गंगा स्नान वे सुबह 3:00 बजे, दूसरा दोपहर 12:00 बजे और तीसरा शाम 6:00 बजे करते थे। कैसी भी परिस्थिति हो चाहे कड़ाके की ठंड , तपती गर्मी या मूसलाधार वर्षा वे कभी भी गंगा स्नान करना नहीं छोड़ते थे। उनका यही नियम होता था। स्नान के बाद वे तुलसी घाट वापस आकर अपना आसन लगाकर गहरा ध्यान में लग जाते थे। दोपहर के स्नान के बाद वे भिक्षा के लिए निकला करते थे। भिक्षा के लिए भी वे भिखारियों की पंक्तियों में 10-15 मिनट बैठकर प्रतीक्षा करते। यदि उस दौरान उन्हें कुछ मिल जाता, तो वे उसे स्वीकार कर लेते और यदि उन्हें कुछ नहीं मिलता, तो ईश्वर का ध्यान कर गंगाजल पीकर उठ जाते थे।
           रोज की तरह एक दिन प्रेमानंद महाराज जी बैठे हुए थे। तभी उनके मन में वृंदावन का विचार आता है। वे सोचते हैं कि वृंदावन का नाम तो बहुत सुना है पर कभी गए नहीं, उसकी महिमा कैसी होगी। फिर वे वहां से उठकर रोज की तरह भिक्षा मांगने चले जाते हैं। फिर वहां से तुलसीघाट जाकर बैठ जाते हैं। तभी वहां एक संत आकर उनसे कहता है कि काशी में एक धार्मिक अनुष्ठान हो रहा है जिसमें दिन में श्री चैतन्य लीला और रात में रासलीला का आयोजन होगा। वह संत अपने साथ उन्हें चलने के लिए कहता है। महाराज जी ने कभी भी रासलीला नहीं देखी थी, परंतु उन्होंने अपने गांव का रामलीला देखा था। उन्हें लगता है कि रासलीला भी रामलीला जैसे ही होगा। महाराज जी हमेशा अकेले में ही रहते थे। इसलिए वे उनसे कहते हैं कि उन्हें आवश्यकता नहीं है। वह संत उनसे कहता है कि वृंदावन से कलाकार आए हैं मेरे साथ एक बार चलिए। वृंदावन का नाम सुनते ही महाराज जी को लगता है कि शायद भोलेनाथ जी की कोई कृपा है और उस संत के साथ रासलीला देखने के लिए चले जाते हैं। जब प्रेमानंद महाराज जी दिन के समय चैतन्य लीला देखते हैं तो उन्हें बहुत ही आनंद मिलता है और बाबाजी को शाम के रासलीला के विषय में कहने की आवश्यकता भी नहीं होती है। महाराज जी रासलीला शुरू होने से पहले ही वहां पहुंच जाते हैं। श्री चैतन्य लीला और श्री रासलीला से प्रभावित होकर वे इसे ही अपना नियम 1 महीने के लिए बना लेते हैं। इस आनंद में उन्हें एक महीना कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता है। एक महीना बीत जाने पर जब सभी कलाकार वृंदावन जाने लगते हैं, तो उन्हें आभास होता है कि सभी कलाकार जा रहे हैं, अब उनका क्या होगा और वे बहुत ही दुखी हो जाते हैं। वे भीतर से वृंदावन जाने का मन बना लेते हैं। वे सोचते हैं कि यदि वे वृंदावन चले जाएं, तो उन्हें रोज रासलीला देखने को मिलेगा। इस भाव से महाराज जी टीम संचालक के पास पहुंचते हैं। वे बड़े ही विनम्र भाव से उनसे स्वयं को वृंदावन ले जाने के लिए कहते हैं। संचालक उनसे कहते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता है। परंतु महाराज जी उनसे कहते हैं कि उन्हें केवल रासलीला देखना है। इस पर संचालक उन्हें कहते हैं कि अगर ऐसा है, तो वे एक बार वृंदावन आ जाए फिर बिहार जी उन्हें नहीं छोड़ेंगे। यही एक वाक्य प्रेमानंद महाराज जी का जीवन बदल देते हैं। वे इसी को अपना गुरु मंत्र मान लेते हैं। इसके बाद तो उनके मन में केवल एक ही विचार था कि उन्हें वृंदावन जाना है। उन्हें ऐसा आभास होने लगता है कि उनके आत्मा का घर वृंदावन ही है जहां श्रीकृष्ण का प्रेम रस सदा ही प्रवाहित होता रहता है। यह ईश्वर की कृपा थी जो महाराज जी कभी एकांत में रहना पसंद करते थे अब वे वृंदावन जाने के इच्छुक बन गए थे। पूरे 1 महीने का श्रीकृष्णा लीला का आनंद लेने के बाद रोज की तरह अपने नियम अनुसार गंगा जी में स्नान कर रोज की तरह तुलसी घाट में ध्यान करने लगते हैं और साथ ही भिक्षा के लिए भी जाते हैं। परंतु अपने इस नियम में वे सदैव वृंदावन के विषय में सोचते रहते हैं।
         एक बार वे सुबह गंगा स्नान कर रोज की तरह तुलसी घाट में बैठे थे तभी पास के ही हनुमान मंदिर से युगल किशोर जी उनके लिए प्रसाद लेकर आते हैं। प्रेमानंद महाराज जी एकांतवासी थे उनका किसी से कोई परिचय नहीं था। उन्हें प्रसाद मिलने पर वे इसे अनुचित समझते हैं। जब महाराज जी प्रसाद लेने से उन्हें मना करते हैं, तो युगल किशोर जी उन्हें उत्तर देते हैं कि उनके मन में विचार आया कि संकट मोचन जी का प्रसाद उन्हें ही देना है। महाराज जी को युगल किशोर जी का विनम्र व्यवहार बहुत प्रभावित करता है और वे वह प्रसाद ले लेते हैं। महाराज जी के प्रसाद ग्रहण करने के बाद युगल किशोर जी उन्हें अपनी कुटिया में चलने के लिए कहते हैं। महाराज जी उन्हें कहते हैं कि उनके नियमानुसार वे किसी गृहस्थ के घर नहीं जाते हैं। तब युगल किशोर जी उन्हें कहते हैं कि वह कोई गृहस्थ नहीं है वह भी एक सन्यासी ही है। उनके प्रेम पूर्वक बोलने पर महाराज जी उनके कुटिया में चले जाते हैं। वह स्वयं अपने हाथों से महाराज जी को भोजन बनाकर खिलाते हैं। यहां भी वे वृंदावन के विषय में ही विचार करते रहते हैं कि उन्हें वृंदावन जाना है। महाराज जी युगल किशोर जी को अपने वृंदावन जाने के विषय में पूछते हैं कि क्या वह उन्हें वृंदावन पहुंचा सकते हैं। वह उत्तर देते हैं कि हां बाबा जरूर पहुंचा सकता हूं, आपको कब जाना है। महाराज जी कहते हैं कि हम तो तैयार ही बैठे हैं जब आप व्यवस्था कर दो। युगल किशोर जी उन्हें कहते हैं कि ठीक है कल ही आपको वृंदावन ले चलूंगा। इतना सुनते ही महाराज जी आनंद से भर जाते हैं। उस समय कोई भी ट्रेन सीधे बनारस से मथुरा के लिए नहीं जाती थी। इसलिए महाराज जी पहले युगल किशोर जी के साथ चित्रकूट आ जाते हैं। यहां वे दोनों तीन-चार दिन ठहरते हैं फिर चित्रकूट से युगल किशोर जी महाराज जी को मथुरा जाने वाली रेलगाड़ी में बैठा देते हैं‌‌। रेलगाड़ी में यात्रा के दौरान महाराज जी का दो लोगों से परिचय होता है जो महाराज जी के विचारों से प्रभावित होकर उन्हें कुछ पैसे देने लगते हैं, परंतु वे पैसे लेने से मना कर देते हैं। वे दोनों व्यक्ति उन्हें कहते हैं कि वे उनके साथ चले और उस रात उनके साथ ठहर कर अगले दिन वृंदावन चले जाएं। महाराज की सरल स्वभाव वाले होने के तुरंत मान जाते हैं। वे दोनों व्यक्ति मथुरा में राधेश्याम गेस्ट हाउस के बाहर उन्हें बिठाकर कहते हैं कि वे दोनों अंदर जाकर उन्हें थोड़ी देर में बुलाएंगे। उस समय ठंड और रात का समय था। महाराज जी वहीं बैठकर उनके बुलावे का प्रतीक्षा करते रहते हैं, परंतु बहुत समय बीत जाने पर भी उन्हें कोई बुलाने नहीं आता है। रात के समय एक व्यक्ति उनके पास आता है और उन्हें जय श्रीकृष्णा कहकर उनके वहां बैठने के विषय में पूछता है। महाराज जी अपनी पूरी कहानी उस व्यक्ति को बताते हैं। वह व्यक्ति उन्हें अपने घर ले जाकर उन्हें भोजन करवाते हैं और उन्हें विश्राम भी करवाते हैं। अगले सुबह होते ही एकादशी के दिन महाराज जी यमुना नदी पहुंचते हैं। वे यमुना नदी में स्नान कर द्वारकाधीश का दर्शन करने पहुंच जाते हैं। उनके दर्शन करते ही उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे जो चाहते थे उन्हें मिल गया हो। वे द्वारकाधीश को देख रोने लगते हैं और उन्हें ऐसा लगता है जैसे उनका अब तक का जीवन व्यर्थ हो गया हो, उनका पूरा जीवन भागदौड़ में बीत गया, आखिर मंजिल मिल ही गया। उन्हें इस बात का आभास भी नहीं होता है कि उन्हें कौन-कौन से लोग देख रहे हैं, आसपास के सभी लोग चर्चा करने लगते हैं कि अरे बाबा जी को देखो कैसे ईश्वर की याद में रो रहे हैं। देखते ही देखते उनके चारों ओर भीड़ उमड़ने लगता है। कोई उन्हें फूलों की माला पहनने लगता है तो कोई उनके चरण स्पर्श करने लगता है। तभी एक दर्शनार्थी उनसे कहता है कि वह उनकी सेवा करना चाहता है और उन्हें आदेश दें। महाराज जी की तो केवल एक ही इच्छा थी वृंदावन जाना। वे कहते हैं कि उन्हें वृंदावन पहुंचा दो। वह भक्त साधन का व्यवस्था करके महाराज जी को वृंदावन के लिए रवाना कर देता है। गाड़ी वाला उन्हें वृंदावन के रमन नीति पर उतार देता है। महाराज जी स्वयं को सौभाग्य मानकर कहते हैं कि उनका वृंदावन में एकादशी के दिन प्रवेश हुआ। वे देखते हैं कि वहां रमण नीति में परिक्रमा मार्ग में बहुत से भक्त परिक्रमा कर रहे थे। यहां सब कुछ महाराज जी के लिए नया था। परिक्रमा के भीड़ को देखकर उन्हें लगता है कि यहां ऐसा ही होता होगा। वे उस दिन रमन नीति का भ्रमण करते हैं। इस दौरान वे संत श्री श्याम सखा जी से मिलते हैं। महाराज जी उनसे निवेदन करते हैं कि वे बनारस से आए हैं और बिहारी जी के दर्शन करना चाहते हैं। उन्हें यदि कुछ दिन रहने की व्यवस्था मिल जाए, तो बड़ी कृपा होगी। वे इस तरह से वृंदावन भ्रमण का आनंद लेते हैं।
            महाराज जी का स्वभाव एकांतवास में रहने का था। कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि यहां के भीड़ से उनका एकांतवास प्रभावित हो रहा है। इसलिए महाराज जी पुनः बनारस लौटने का निर्णय लेते हैं और वे वापस बनारस लौट आते हैं। वृंदावन से बनारस की यात्रा के दौरान उन्हें एक अजीब बेचैनी होती है। बनारस पहुंचकर वे अपने पुराने नियम अनुसार ही रोज गंगा स्नान कर भिक्षा मांगने जाते और वापस तुलसी घाट में एकांतवास में ही रहते। परंतु उनके भीतर वृंदावन से दूर होने की बेचैनी समाप्त नहीं होती है। वे यह बात शीघ्र ही समझ जाते हैं। इसलिए वे शीघ्र ही वृंदावन वापस आ जाते हैं और वहीं रमन नीति आश्रम में रहने लगते हैं। तभी उनके भीतर की बेचैनी समाप्त होती है। तब से लेकर आज तक महाराज जी वृंदावन में रह रहे हैं और अपने लाडले जी की सेवा कर रहे हैं। इस दौरान वे वृंदावन में कई आश्रमों की परिक्रमा करते हैं। उनका यहां नियम होता है वृंदावन का परिक्रमा करना और बांके बिहारी जी का सेवा करना। एक बार महाराज जी परिक्रमा कर रहे थे तभी वे एक सखी को एक पद का गायन करते देखे हैं। वे ध्यान पूर्वक उस सखी के गायन को सुनने लगते हैं। जब उसका गायन समाप्त होता है, तो वे उससे गायन का अर्थ पूछते हैं। सखी उनसे कहती है कि यदि उन्हें उस गायन का भाव जानना है, तो उन्हें श्री राधा वल्लभ संप्रदाय से जुड़ना होगा। इसके पश्चात् वे श्री राधावल्लभ संप्रदाय चले जाते हैं। वहां वे श्री मोहित गोस्वामी जी से मिलते हैं। श्री मोहित गोस्वामी जी महाराज जी के गुरु भी थे। वे महाराज जी को श्री राधावल्लभ संप्रदाय की दीक्षा देते हैं और मंत्र भी सिखाते हैं। कुछ समय बाद महाराज जी को अपने वर्तमान गुरु श्री हित गोविंद शरण जी का सानिध्य प्राप्त होता है। श्री हित गोविंद शरण जी महाराज सहचारी भाव में रहने वाले संतों में से एक थे। अपने सहचारी गुरु के सानिध्य में रहकर और वृंदावन धाम की अपार महिमा के कारण महाराज जी शीघ्र ही बिहारी जी और राधा रानी के श्री चरणों में श्रद्धा विकसित करते हुए सहचारी भाव में लीन रहने लगते हैं। आज महाराज जी हम सभी भक्तों को राधा जी के विषय में बताते हैं।

उनकी दोनों किडनियां है खराब

महाराज जी अपने एक सत्संग के दौरान बताते हैं कि जब वे 35 वर्ष के हुए उस समय उनके पेट में बहुत ज्यादा पीड़ा बढ़ गया था। इस कारण जब वे 'रामकृष्ण मिशन' में जांच कराने गए, तो डॉक्टर उन्हें बताते हैं कि उनकी आधे से ज्यादा किडनी खराब हो चुकी है और उन्हें 'Polycystic Kidney Disease' नामक बीमारी है। इस बीमारी में किडनी में असंख्य की संख्या में गांठे बनने लगती है और किडनी फटने का भी खतरा रहता है। यह रोग जींस से आता है यानी अपनी पीढ़ियों से। साथ ही डॉक्टर उन्हें यह भी कहते हैं कि उनके पास केवल 4 वर्ष तक का समय ही है और इसके बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। उस समय महाराज जी को ऐसा लगता है कि वे कभी भी मर सकते हैं। इसलिए वे राधा वल्लभ के फोटो को चुनरी से अपने छाती में बांधकर रोज सोने लगते हैं। उन्हें राधा वल्लभ जी की ऐसी कृपा होती है कि दो दशक बीत जाने के बाद भी वे आज भी जीवित हैं‌। आज महाराज जी के हजारों की संख्या में भक्त हैं जो उन्हें अपनी किडनी देना चाहते हैं, महाराज जी कहते हैं कि वे उन्हें कष्ट देकर स्वयं क्यों सुखी रहें, शरीर जितने दिन चलता है, चलना है उनका जीवन समाज के कल्याण के लिए है।
            प्रेमानंद महाराज जी का जीवन आज उनके हजारों भक्तों को प्रेरणा देती है। उनसे मिलने के लिए छोटे से लेकर बड़े सभी लोग उनके पास जाते हैं और अपनी समस्याओं के विषय में उनसे पूछते हैं। महाराज जी सभी को उनके प्रश्नों का संतुष्ट पूर्वक उत्तर देते हैं।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

हसनम्बा मंदिर : मंदिर जो वर्ष में केवल 7 दिन ही खुलता है

 आज हम जिस मंदिर के विषय में बात करने वाले हैं, वह मंदिर अपने चमत्कारिक रहस्यों और रहस्यमयी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। साथ ही वह मंदिर दीपावली के समय वर्ष में केवल 7 दिन ही खुलता है। यह मंदिर है कर्नाटक का हसनम्बा मंदिर।

हसनम्बा मंदिर 

हसनम्बा मंदिर कर्नाटक के हासन जिले में स्थित एक प्राचीन और प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। यह देवी शक्ति(मां अम्बा) को समर्पित है और अपनी रहस्यमयी परंपरा के लिए जाना जाता है। जिले का नाम हसन भी देवी हसनम्बा से लिया गया है। यहां माता अम्बा को हसन की पीठासीन देवी के रूप में माना जाता है। हसनम्बा का अर्थ कन्नड़ में 'मुस्कुराती माता' होता है। प्राचीन काल में हसन को 'सिहमासनपुरा' के नाम से बुलाया जाता था। यह मंदिर अपनी चमत्कारी शक्तियों और चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर के कपाट दीपावली के दौरान वर्ष में केवल 7 दिन ही खोले जाते हैं और बाकी 358 दिन बंद रहता है। मंदिर में लोग पत्तों में अपनी मनोकामनाएं लिखकर माता को कहते हैं। इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में 'होयसल वंश' के राजा द्वारा किया गया था। इसके दर्शन करने से लोगों की मान्यताएं पूरी होती है।

हसनम्बा मंदिर की पौराणिक कथा

एक समय की बात है एक अन्धकासुर नामक राक्षस हुआ करता था। वह कठोर तपस्या करके ब्रह्मा देव जी को प्रसन्न करता है और उनसे अदृश्य होने का वरदान मांगता है। वरदान पाने के बाद उसका अहंकार बढ़ने लगता है। वह अपने वरदान का दुरुपयोग करता है। वह ऋषियों, मुनियों और मनुष्यों को सताना शुरू कर देता है। अन्धकासुर के कारण सभी ओर भय और अराजकता फैल जाती है। सभी देवता इस स्थिति से परेशान होकर शिव जी के पास जाते हैं और उनसे अन्धकासुर का वध करने के लिए विनती करते हैं। शिव जी उससे युद्ध करने का निर्णय लेते हैं। अन्धकासुर को अदृश्य होने के वरदान के अलावा एक और वरदान प्राप्त था जिससे अगर उसके रक्त का कोई भी बूंद धरती पर गिरने से एक और अन्धकासुर उत्पन्न हो जाता था। शिवजी जब उसके ऊपर प्रहार करते हैं, तो उसके रक्त के बूंद से असंख्य असुर बनने लगते हैं। असुरों की संख्या अधिक होने के कारण युद्ध और बढ़ने लगता है और देवताओं की शक्ति भी काम हो जाती है। इससे स्थिति और बिगड़ जाती है। तब शिवजी आदि शक्ति से सहायता लेते हैं। आदिशक्ति उनसे कहते हैं कि सात शक्तियों के एक होने पर ही अन्धकासुर का वध होगा। इस प्रकार से सप्त मातृकाओं का जन्म होता है। ब्राह्मणी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा। इसके बाद शिव जी फिर से अन्धकासुर से युद्ध करते हैं। इस बार भी उनके प्रहार करने पर फिर से नया असुर बनने लगता है। तभी देवी चामुंडा अपने जीभ से अन्धकासुर के रक्त के बूंदों को पी लेते हैं और कोई भी नया असुर उत्पन्न नहीं होता है। इस प्रकार अन्धकासुर का वध हो जाता है।
          युद्ध समाप्त होने के बाद शिवजी सप्त मातृकाओं से कहते हैं कि उनका तेज सदैव पृथ्वी पर बना रहेगा और वे भक्तों के कष्टों को दूर करेंगी। उसके बाद सप्त मातृकाएं पृथ्वी पर अवतरित होकर विचरण करने लगती हैं। एक बार वे सभी वाराणसी से दक्षिण की ओर निकलती हैं। इस दौरान वे सभी हासन से गुजरती है, तो उनका मन यहां की प्राकृतिक सौंदर्य से मंत्र मुग्ध हो जाता है और यहीं विराजमान होने का निर्णय लेती हैं। महेश्वरी, कौमारी और वैष्णवी तीनों चीटियों के टीलों में रुपांतरित हो जाती हैं। ब्राह्मणी, इंद्राणी और वाराही पास के कुंओं में निवास करती है। ब्राह्मी देवी हसन से थोड़े दूर केंचम्मना होसकोटे में अपना निवास बनाती हैं।

आज के मंदिर का निर्माण

कई सदियों बाद हसन क्षेत्र का शासक होयसल साम्राज्य के सामंत कृष्णप्पा नायक होते हैं। एक बार उन्हें सपने में देवी का दर्शन होता है जिसमें देवी उन्हें कहती हैं कि उन्होंने इस पवित्र भूमि को अपना निवास स्थान बनाने का निर्णय लिया है और जहां तुम्हें तीन चीटियों का टीला दिखाई दे, वहीं हमारा आसन स्थल होगा। वहां मेरी मंदिर बनाओ और वहीं से मेरी शक्ति सदियों तक विराजमान रहेगी। राजा कृष्णप्पा नायक उस सपने को देवी का संकेत मान लेते हैं। वे पूरे क्षेत्र में तीन टीलों का खोज करवाते हैं। वे तीन चीटियों का टीला एक साथ ढूंढ लेते हैं और उसे प्रणाम करते हैं। वे समझ जाते हैं कि यही वह स्थान है जहां देवी ने उन्हें बुलाया है। वे वहीं देवी हसनम्बा मंदिर का निर्माण करवाते हैं।
          कुछ समय बाद देवी के प्रति भक्तों का श्रद्धा इतना बढ़ जाता है कि लोग दूर-दूर से देवी के दर्शन के लिए आने लगते हैं। देवी हसनम्बा अपने भक्तों के सभी कष्टों को दूर करते हैं और अपनी कृपा बनाए रखते हैं। साथ ही उनके भक्तों को कष्ट पहुंचाने वालों को वे कठोर दंड भी देते हैं।

समोसे कल्लू (बहू का पत्थर)

12वीं शताब्दी में हसन में एक श्रद्धालु महिला हुआ करती थी। वह देवी हसनम्बा की बहुत बड़ी भक्त थी। वह प्रत्येक दिन मंदिर में आकर पूरे भक्ति भाव से देवी की पूजा किया करती थी। उसकी सास हमेशा उसे परेशान करती थी और उसके धार्मिक कार्यों में बाधा डालती थी। एक दिन श्रद्धालु महिला मंदिर में पूजा कर रही होती है, उसी समय उसकी सास वहां आकर उसके भक्ति कार्यों को लेकर उसे ताना मारती है। साथ ही क्रोध में आकर उसके सर पर एक कटोरा मार देती है जिससे उसका खून बहाने लगता है। श्रद्धालु महिला जमीन पर गिर जाती है। अपने सास से प्रताड़ित होकर वह देवी से प्रार्थना करती है कि वे उसे अपने शरण में ले लें। उसकी सच्ची भक्ति देखकर देवी हसनम्बा उसकी पुकार सुन लेती है। देवी उसकी सुरक्षा के लिए उसे पत्थर का स्वरूप दे देती है और उसे अपने पास स्थान देती हैं ताकि कोई भी उसे कष्ट न दें। देवी उसे कहती है कि वह सदैव उसके पास रहेगी और धीरे-धीरे उनके चरण तक पहुंचेगी। ऐसा माना जाता है वह पत्थर (सोसे कल्लू) देवी की ओर एक धान के दाने के बराबर आगे बढ़ता है। जब वह पत्थर देवी तक पहुंच जाएगा, तो वह मोक्ष प्राप्त करेगा। वह सोसे कल्लू पत्थर मंदिर के गर्भगृह में देवी के मूर्ति के पास है। प्रत्येक वर्ष लाखों भक्त इसके दर्शन के लिए आते हैं और पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति के लिए इससे प्रार्थना करते हैं।

कल्लप्पन गुड़ी

जैसे-जैसे मंदिर के बारे में लोगों को पता चलता है वैसे-वैसे वे दूर-दूर से देवी के दर्शन के लिए आने लगते हैं। इसके साथ ही सोना, चांदी और अन्य आभूषणों के दान से मंदिर में संपत्ति बढ़ने लगती है। कुछ लोगों के मन में इन संपत्तियों के प्रति लालच आ जाता है। चार चोरों को पता चलता है कि सोने, चांदी और अन्य मूल्यवान आभूषण मंदिर में सुरक्षित रखे जाते हैं। वे चोर मंदिर बंद होने के बाद मंदिर के गर्भगृह में चोरी करने का योजना बनाते हैं। वे मुख्य द्वार का ताला तोड़कर गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। देवी माता के प्रतिमा के सामने रखे खजानों को देखकर उनके मन में और लालच जागने लगता है। वे जैसे ही खजाने की ओर आगे बढ़ते हैं, देवी माता प्रकट हो जाती है। चारों चोर उन्हें देखकर कांपने लगते हैं। वे उनसे क्षमा मांगते हैं, परंतु देवी उन्हें क्रोध होकर कहती हैं कि वे क्षमा योग्य नहीं हैं और उन्हें ऐसा दंड मिलेगा जो आने वाली पीढ़ियों को भी याद रहेगा। देवी माता अपने श्राप से चारों को पत्थर में बदल देते हैं।
इसके बाद देवी हसनम्बा राजा कृष्णप्पा नायक के सपने में आकर उनसे कहती हैं कि उन्होंने चार चोरों को पत्थर में बदल दिया है और आगे ऐसा कभी भी नहीं होना चाहिए। यह घटना सबके लिए एक सीख होना चाहिए। यदि कोई मंदिर में चोरी करने के इरादे से आए, तो उन्हें पता चलना चाहिए कि उनका दंड क्या होगा? इसलिए मंदिर के पास एक मंडप बनवाकर उसमें उन चार चोरों के पत्थर रखो जिससे उनकी सजा सबको याद रहे। साथ ही कोई भी ऐसी गलती न करें।
            अगले सुबह जब राजा मंदिर दर्शन के लिए आते हैं, तो पंडित जी उनसे कहते हैं कि मंदिर के गर्भगृह में चार पत्थर पड़े हैं। तब राजा सबको बताते हैं कि देवी ने उन्हें सपने में आकर उन चार पत्थरों के बारे में बताया है। राजा तुरंत ही मंदिर के पास मंडप बनवाकर 4  पत्थरों को स्थापित करने का आदेश देते हैं ताकि मंदिर आने वाले सभी को पता चले कि मंदिर में पाप का परिणाम क्या होता है? ये चार पत्थर मंदिर में आज भी हैं। इन्हें कल्लप्पन गुड़ी कहा जाता है।

मंदिर का वर्ष में केवल 7 दिन खुलना

एक बार महेश्वरी, कौमारी और वैष्णवी तीनों देवी गांव का भ्रमण करने का निश्चय करते हैं। तीनों देवियां जब गांव पहुंचती हैं, तो वे देखती हैं कि कुछ महिलाएं झाड़ू मार रही हैं, कुछ महिलाएं मिर्च पीसकर मसाला बना रही हैं। मिर्च की तीखी गंध और आंगन की धूल देवियों की आंख और नाक में चली जाती है। तीनों देवियों को इससे बहुत परेशानी होती है और है वे क्रोधित होकर मंदिर वापस आ जाती हैं। वे ये बातें राजा को बताने के बारे में सोचती हैं। देवी हसनम्बा फिर से राजा के सपने में आकर उनसे कहती हैं कि उनके मंदिर के आसपास लोगों द्वारा बनाए गए घरों से आने वाली मिर्च की गंध, धूल और कूड़ों की गंध उन्हें असहनीय लगती है। इससे उनका मन असहनीय हो गया है‌‌। साथ ही वे यह भी कहती हैं कि लोग अत्यधिक तीव्र गंध वाली वस्तुओं का उपयोग न करें। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो वे वह स्थान छोड़ देंगे। राजा कृष्णप्पा नायक धर्मसंकट में पड़ जाते हैं। वे अपने प्रजा को भी कुछ नहीं कह सकते थे और न ही देवियों को मना कर सकते थे। राजा देवी से प्रार्थना करते हैं कि वे ही उन्हें कोई रास्ता दिखाएं। देवियां उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन देती हैं और उन्हें इसका उपाय बताती हैं। वे कहती हैं कि आने वाली आश्विन माह के बाद पूर्णिमा के बाद जो गुरुवार आएगा उसी दिन मंदिर का दरवाजा खुलना चाहिए और उस दिन से लेकर बलीपद्यमी के दूसरे दिन तक वे भक्तों को दर्शन देंगी। जो भी उस दौरान सच्चे मन से पूजा करेगा, वे उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करेंगी। बलीपद्यमी के दूसरे दिन मंदिर बंद करने से पहले हमें फूलों से सजाकर दो दिए जलाना और प्रसाद चढ़ाना, फिर दरवाजा बंद कर देना। जब 1 साल बाद मंदिर के द्वार खुलेंगे, तब वे फूल नहीं मुरझाए होंगे और दोनों दिए भी जल रहे होंगे। यही हमारी उपस्थिति का संकेत होगा। तब से 800 वर्षों से आज तक यह मंदिर प्रत्येक वर्ष केवल 7 दिन ही खुलता है और 1 साल बाद खुलने पर भी हसनंबा देवी को चढ़ाए हुए फूल नहीं मुरझाते हैं, प्रसाद भी खराब नहीं होता है और दोनों दिए भी जल रहे होते हैं।
             प्रत्येक वर्ष केवल 7 दिनों में ही 20 लाख से भी अधिक श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए आते हैं और देवी के चमत्कार को स्वयं अपनी आंखों से देखते हैं।

सोमवार, 12 जनवरी 2026

जगन्नाथ मंदिर : मंदिर जहां है श्री कृष्ण का हृदय और जिसकी मूर्तियां है अधूरी

 हमारे भारत देश में असंख्य मंदिर हैं जो अपने अद्भुत वस्तुकला और अपने रहस्यों के लिए प्रसिद्ध होने के साथ लोगों को अपनी और आकर्षित करते हैं। साथ ही लोगों को उनके रहस्यों को जानने का रुचि भी होता है। ऐसा ही एक मंदिर है जो भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। यह मंदिर है श्री जगन्नाथ मंदिर।

जगन्नाथ मंदिर पुरी 
जगन्नाथ मंदिर उड़ीसा के पुरी शहर में स्थित एक विशेष हिंदू मंदिर है। यह भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। साथ ही यह मंदिर चार धामों में से एक है। मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु अपने चारों धामों के यात्रा के दौरान पुरी में भोजन करते हैं। यह मंदिर प्रत्येक वर्ष अपने विशाल रथ यात्रा के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है जिसमें भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने रथों पर सवार होकर पुरी नगरी का भ्रमण करते है। इसकी वास्तुकला कलिंग शैली की है। इसे विश्व के रहस्यमय मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर का उल्लेख प्राचीन ग्रंथो जैसे -ब्रह्म पुराण, नारद पुराण, स्कंद पुराण और पद्म पुराण में भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का अस्तित्व सतयुग के आरंभ से है। स्कंद पुराण में भगवान विष्णु का नील माधव के रूप में नीलांचल पर्वत में अवतरण का उल्लेख है। ब्रह्म पुराण और नारद पुराण में पुरी को पुरुषोत्तम क्षेत्र कहा गया है। पद्म पुराण में भगवान राम के भाई शत्रुघ्न का इस पवित्र स्थान की यात्रा का वर्णन है। इस मंदिर में केवल सनातनी हिंदुओं को ही प्रवेश करने की अनुमति है। यह मंदिर कई तरह के विज्ञान को भी चुनौती देता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर के मूर्ति में भगवान श्री कृष्ण का हृदय है। साथ ही यह मंदिर अपने कई तरह के रहस्यों से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस मंदिर में पूजा की जाने वाली मूर्तियां अधूरी बनी हुई है।

जगन्नाथ मंदिर की पौराणिक कथा 

कलयुग के शुरू होने से कुछ समय पहले भगवान श्री कृष्ण वन में विश्राम कर रहे होते हैं। उसी समय एक साबर कबीले का जरा नामक एक आदिवासी वन में शिकार करने के लिए आता है। वह श्री कृष्ण को हिरण समझकर तीर चलाता है। तीर श्री कृष्ण के पैर में लग जाता है। जब जरा सामने जाकर देखता है, तो उसे पता चलता है कि उसने जिस पर तीर चलाया वह श्री कृष्ण है। जरा उनसे अपनी भूल के लिए क्षमा मांगते हैं। इस पर श्री कृष्ण उसे कहते हैं कि उन्होंने त्रेता युग में श्री राम के रूप में बालि को छुप कर तीर मारा था और तुम पूर्व जन्म में वानर राज बालि थे। इसलिए मैंने वैसी ही मृत्यु चुनी। इसके बाद श्री कृष्ण की मृत्यु हो जाती है। जब पांडवों तक श्रीकृष्ण की मृत्यु की खबर पहुंचती है, तो वे श्री कृष्ण के अंतिम दर्शन के लिए आते हैं और उनका अंतिम संस्कार कर देते हैं। श्री कृष्ण का अंतिम संस्कार में अग्नि से उनका शरीर तो जल जाता है, परंतु उनका हृदय नहीं जलता। इसे देखकर पांडव आश्चर्य चकित हो जाते हैं। वे उनके हृदय को लकड़ी के लट्ठे में बांध कर नदी में बहा देते हैं। लेकिन सब्र कबीले का जरा नामक आदिवासी उस हृदय को लट्ठे से निकाल लेता है जिसमें से नीले रंग की तेज रोशनी निकल रही होती है। फिर उसे अपने साथ एक गुफा में ले जाकर उसकी पूजा करने लगता है। कुछ समय बाद इसे सब्र कबीले के लोगों द्वारा नील माधव के रूप में पूजा जाने लगता है। यह भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इस कबीले का मुखिया विश्वासु था। वे भगवान नील माधव को नीलांचल पर्वत की एक गुफा में पूजा किया करते थे। उस समय मालवा में इंद्रद्युम्न नामक एक राजा था। वे धर्म रक्षक और दान पुण्य का काम सदैव करते रहते थे। वे भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। एक दिन उन्हें एक सपना आता है जिसमें वे नीलांचल पर्वत के एक गुफा में नीले रंग के रूप में भगवान विष्णु के विग्रह को देखते हैं। जब वे सुबह उठते हैं, तो वे कुछ जानकारों, ज्योतिषीयों और चित्रकारों को बुलाते हैं। वे उन्हें अपने सपने के बारे में बताते हैं ताकि उनके सपने में देखे गये दृश्य का वह चित्र बना सके। उनमें से एक विद्वान राजा को बताता है कि वे जिस जगह के विषय में पुछ रहे हैं उसका वर्णन पुराणों में मिलता है। उस क्षेत्र को नीलांचल पर्वत कहा जाता है, परंतु उस पर्वत के विषय में कोई नहीं जानता है। आपको इस तरह के सपने का आना भगवान विष्णु की कोई लीला भी हो सकती है। फिर राजा ने अपने सैनिकों को नीलांचल पर्वत और उस पवित्र गुफा को ढूंढने के लिए सभी दिशाओं में भेज दिया। दूसरी ओर राजा को एक और सपना आता है जिसमें वे समुद्र की लहरों के साथ एक मंदिर देखते हैं। उन्हें लगता है कि ईश्वर उनसे एक मंदिर के निर्माण के लिए कह रहे हैं। राजा अगले दिन से ही मंदिर के निर्माण का कार्य प्रारंभ कर देते हैं, परंतु समुद्र की लहरों के कारण मंदिर का निर्माण नहीं हो पता है। मंदिर का निर्माण होने के बाद भी समुद्र के लहरों के कारण मंदिर बार-बार ध्वस्त हो जा रहा था। फिर राजा हनुमान जी का स्तुति कर मंदिर निर्माण में उनका सहायता मांगते हैं। हनुमान जी राजा का अनुरोध मान लेते हैं और वे सूक्ष्म रुप से वहां विराजमान हो जाते हैं। इसके बाद हनुमान जी समुद्र की ओर मुख करके बैठ जाते हैं। फिर मंदिर का निर्माण शुरू किया जाता है। इस बार हनुमान जी की उपस्थिति होने से मंदिर के निर्माण में कोई विघ्न नहीं आता है और मंदिर का निर्माण पूरा हो जाता है। इसके बाद राजा मंदिर के गर्भगृह में ईश्वर के विग्रह को स्थापित करने के विषय में सोचते हैं। नीलांचल पर्वत की खोज में गए सभी सैनिक खाली हाथ लोटते हैं। इन सभी सैनिकों में ब्राह्मण विद्यापति नामक एक सैनिक था जो एक आध्यात्मिक व्यक्ति था। वह नीलांचल पर्वत को खोज लेता है। उसे यह भी पता चल जाता है कि उस पर्वत में एक गुफा है जहां ईश्वर के विग्रह का नील माधव के रूप में सब्र कबीले का मुखिया विश्वासु पूजा करता है और उन्होंने अपने ईश्वर को नीलांचल पर्वत के एक गुफा में छुपाया है। विश्वासु नील माधव का बहुत बड़ा भक्त था। विद्यापति को पता चलता है कि विश्वासु नील माधव को किस गुफा में छुपा कर रखा है, इसके बारे में किसी को नहीं बताएगा। इसलिए विद्यापति विश्वासु की पुत्री को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उससे विवाह कर लेते हैं। विद्यापति उनकी पुत्री से नील माधव का दर्शन कराने के लिए कहते हैं। परंतु विश्वासु अपनी पुत्री से दर्शन कराने के लिए मना करते हैं। विश्वासु को केवल एक ही संतान था, तो उनकी पुत्री उनसे कहती है कि आपके बाद हमें ही नील माधव का पुजा करना है इसलिए उनका पता बता दीजिए। विश्वासु अपने पुत्री की बात मान लेते हैं और विद्यापति के आंखों में पट्टी बांधकर उन्हें नील माधव का दर्शन कराने के लिए उस गुफा में ले जाते हैं। विद्यापति बहुत ही बुद्धिमान था। आंखों में पट्टी बंधी होने के कारण रास्ते का पता लगाने के लिए वह अपने हाथों में सरसों का बीज रख लेता है और रास्ते में थोड़ा-थोड़ा करके गिराते हुए जाता है। जब वर्षा का मौसम आता है, तो सरसों का बीज अंकुरित होकर उग जाता है। फिर विद्यापति राजा इंद्रद्युम्न के साथ आता है और अंकुरित बीजों के जरिए रास्ते का पता लगाकर नील माधव के गुफा तक पहुंच जाता है। वह राजा के साथ नील माधव के विग्रह को चुराकर भाग जाता है। जब विश्वासु को पता चलता है कि गुफा में भगवान का विग्रह नहीं है, तो वह बहुत दुखी हो जाता है। राजा इंद्रद्युम्न भगवान के विग्रह को मंदिर में तो स्थापित कर देते हैं, परंतु उस विग्रह से निकलने वाली तेज नीली रोशनी के कारण कोई भी उसका दर्शन नहीं कर पाता है। इसके कारण राजा चिंतित हो जाते हैं। फिर एक दिन भगवान विष्णु फिर से राजा के सपने में आकर उनसे कहते हैं कि उन्हें समुद्र के किनारे बहकर आने वाली एक पेड़ के लट्ठे को लाना होगा। वह लट्ठा द्वारिका से बहकर आ रहा है और तुम्हें उसी लट्ठे से मूर्ति बनाकर मेरे विग्रह को स्थापित करना है। राजा अपने सैनिकों से उस पेड़ के लट्ठे को लाने के लिए कहते हैं। उनके सैनिक पेड़ के लट्ठे को तो ढूंढ लेते हैं, परंतु उसे वे हिला भी नहीं पाते हैं। हनुमान जी उनसे आकर कहते हैं कि उन्होंने नील माधव के विग्रह को चुराकर लाया है इसलिए वे पाप के भागी हैं और पेड़ के लट्ठे को नहीं ले जा सकते। यदि वे इस पेड़ के लट्ठे को ले जाना चाहते हैं, तो उन्हें विश्वासु से क्षमा याचना करनी होगी। राजा को अपने भुल का आभास होता है। वे विश्वासु के पास जाकर उनसे क्षमा मांगते हैं और उस लट्ठे को लाने के लिए कहते हैं। विश्वासु उन्हें क्षमा कर देते हैं और बिना किसी के सहायता से उस लट्ठे को उठा कर ले आते हैं। सभी लोग इस दृश्य को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। विश्वासु उस लट्ठे को मंदिर के बाहर लाकर छोड़ देते हैं। फिर राजा बड़े से बड़ा कुशल मूर्तिकार को बुलाता है, परंतु जब लट्ठे से मूर्ति बनाने की बारी आती है, तो कोई भी मूर्तिकार उस लट्ठे में थोड़ा सा भी छेद नहीं कर पाता है। राजा इससे बहुत दुखी हो जाते हैं। तब तीनों लोकों के कुशल कारीगर कहे जाने वाले विश्वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धारण करके उस लकड़ी के लट्ठे से मूर्ति बनाने का निर्णय लेते हैं। विश्वकर्मा वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण करके राजा के पास पहुंचते हैं और उनसे कहते हैं कि वे उस लकड़ी के लट्ठे से मूर्ति बना सकते हैं। राजा उनसे पूछते हैं कि उस लकड़ी से कितनी मूर्तियां बनेंगी, तो वे उत्तर देते हैं कि तीन मूर्तियां बनेंगी। पहली मूर्ति जगन्नाथ जी की, दूसरी उनकी बहन सुभद्रा की और तीसरी उनके भाई बलभद्र की। यह सुनकर राजा अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उन्हें मूर्ति बनाने की अनुमति दे देते हैं। परंतु इसके लिए वृद्ध व्यक्ति के रूप में आए विश्वकर्मा जी राजा से एक शर्त रखते हैं कि वे अकेले ही 21 दिनों तक गर्भ गृह में मूर्ति का निर्माण करेंगे, कोई भी व्यक्ति उसे नहीं देखेगा और इस दौरान गर्भगृह का दरवाजा बंद रहेगा। यदि इन 21 दिनों में कोई भी व्यक्ति उसे देखने के लिए अंदर आएगा, तो वे उसी क्षण मूर्ति छोड़कर चले जाएंगे। राजा उनकी शर्तें मान लेते हैं। बंद गर्भगृह में विश्वकर्मा जी मूर्ति बनाने का काम शुरू कर देते हैं। उस गर्भगृह से छेनी और हथौड़े की आवाज आती है। कोई भी व्यक्ति उसके आसपास भटकने का प्रयास नहीं करता है, परंतु 15 दिन होने पर अंदर से छेनी और हथौड़े का आवाज आना बंद हो जाता है। इससे राजा की गुड़िचा नामक रानी चिंतित हो जाती हैं। वे राजा को बुलाकर उस दरवाजे को खोलने के लिए कहती हैं। राजा आवाज देते हैं, परंतु अंदर से कोई भी आवाज नहीं आता है। राजा को लगता है कि वृद्ध व्यक्ति भूख प्यास से कहीं मर तो नहीं गया। इसलिए राजा अपने सभी शर्तों को एक तरफ कर अपने सैनिकों को दरवाजा खोलने का आदेश देते हैं। विश्वकर्मा जी आधी अधूरी मूर्ति में श्री कृष्ण के हृदय को स्थापित कर देते हैं। जैसे ही दरवाजा खोला जाता है सभी देख कर चौंक जाते हैं कि वृद्ध व्यक्ति वहां नहीं है और कमरे में तीन आधी अधूरी मर्तियां हैं। जगन्नाथ जी और उनके भाई बलभद्र के छोटे-छोटे हाथ बने हुए थे, परंतु उनके पैर गायब थे। साथ ही उनकी बहन सुभद्रा की हाथ और पैर दोनों ही नहीं थे। राजा को लगता है कि शायद यही ईश्वर की इच्छा है। वे तीनों मूर्तियां को उसी अवस्था में मंदिर में स्थापित कर देते हैं। आज उसी अवस्था में तीनों मूर्तियां मंदिर में विराजमान है जिनमें भगवान जगन्नाथ जी और उनके भाई बलभद्र के आधे अधूरे हाथ हैं और उनकी बहन सुभद्रा के हाथ और पैर नहीं हैं।

वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 

वैसे तो जगन्नाथ मंदिर के निर्माण का नींव रखने का श्रेय राजा इंद्रद्युम्न को जाता है, परंतु वर्तमान मंदिर का निर्माण पूर्वी गंग राजवंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने 12वीं शताब्दी में शुरू किया था। उन्होंने 1077 से 1147 ई के बीच इसका निर्माण करवाया। बाद में उड़ीसा के शासक अनंग भीम देव ने 1230 ईस्वी में इसका वर्तमान रूप दिया।

जगन्नाथ मंदिर के रहस्य

मंदिर का ध्वज - इस मंदिर के ध्वज की विशेषता है कि यह सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराती है। यह अविश्वसनीय है। विज्ञान के अनुसार, ध्वज को हवा के दिशा में ही लहराना चाहिए, परंतु यहां ऐसा नहीं होता है। यह रहस्य विज्ञान को चुनौती देता है। इस ध्वज को 1800 वर्षों से प्रत्येक दिन बदला जाता आ रहा है। प्रतिदिन सायं काल मंदिर के ऊपर स्थापित इस ध्वजा को पुजारियों द्वारा बिना किसी सहायता के 214 फुट उल्टा चढ़कर बदला जाता है। मान्यता है कि यदि एक भी दिन इस ध्वज को बदला नहीं जाएगा, तो मंदिर अगले 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा।
मंदिर का ध्वज 

मंदिर का सुदर्शन चक्र - मंदिर पर लगा सुदर्शन चक्र भी एक रहस्य है। इस सुदर्शन चक्र को किसी भी दिशा से देखने पर यह अपनी ओर ही दिखता है। यह वास्तु कला का बहुत ही अद्भुत उदाहरण है। इसे मंदिर के निर्माण के समय ही लगाया गया था।
सुदर्शन चक्र 
मंदिर का रसोईघर - मंदिर का रसोईघर विश्व का सबसे बड़ा रसोइघर है। यहां भगवान जगन्नाथ को चढ़ाए जाने वाले महाप्रसाद निर्माण हेतु 500 रसोईए और 300 सहायक सहयोगी एक साथ काम करते हैं। इसमें प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तनों को एक दूसरे के ऊपर रखा जाता है और सब कुछ लकड़ी पर ही बनता है। इस प्रक्रिया में सबसे ऊपर वाला बर्तन पहले पकता है और फिर क्रमश: नीचे की ओर एक के बाद एक पकती जाती है और सबसे नीचे वाला बर्तन सबसे अंत में पकता है।

मंदिर का प्रसाद - मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। इसमें बनने वाला प्रसाद का एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है और जितने भी असंख्य भक्त आ जाएं, सभी को खिलाया जा सकता है।

मूर्तियों का रहस्य - मंदिर के मूर्तियों की विशेष बात यह है कि इन मूर्तियों को लकड़ी से बनाया जाता है। प्रत्येक 12 वर्षों में एक विशेष अनुष्ठान के तहत पुरानी मूर्तियों को बदलकर उनके स्थान पर नई मूर्तियों को स्थापित किया जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान पुरानी मूर्तियों को एक गुप्त स्थान में दफन किया जाता है और नई मूर्तियों का निर्माण किया जाता है। मूर्तियों में प्रयोग होने वाली लड़कियों का चयन विशेष रुप  से किया जाता है। इस प्रक्रिया को गोपनीयता के साथ ही किया जाता है। मूर्तियां बदलने के समय पुरी शहर के बिजलियां काट दी जाती है और मंदिर के आस पास भी अंधेरा कर दिया जाता है।

ब्रह्म पदार्थ का रहस्य - मंदिर के रहस्यों में ब्रह्म पदार्थ का रहस्य सबसे बड़ा रहस्य है। मान्यता है कि यही ब्रह्म पदार्थ श्री कृष्ण का हृदय है। मूर्तियां बदलने के प्रक्रिया के समय जब मूर्तियों को बदल जाता है, तो सब कुछ बदल दिया जाता है, परंतु इस ब्रह्म पदार्थ को नहीं बदला जाता है। इसको पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में स्थापित किया जाता है। इस दौरान मंदिर के बाहर CRPF के जवानों को तैनात किया जाता है। किसी का भी मंदिर में आना-जाना मना रहता है। केवल मुख्य पुजारियों को ही अंदर आने की अनुमति होती है, परंतु उन्हें भी ब्रह्म पदार्थ का रहस्य जानने का अनुमति नहीं होता है। इस दौरान उनके आंखों में पट्टियां बांधकर हाथों में मोटे दस्ताने पहनाए जाते हैं और उन्हीं के द्वारा पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में ब्रह्म पदार्थ को स्थापित किया जाता है। कुछ पुजारी अपने अनुभव से बताते हैं कि जब उन्होंने ब्रह्म पदार्थ को छुआ, तो उन्हें ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे कोई सजीव वस्तु हो और वह खरगोश की तरह उछल रहा है। इस ब्रह्म पदार्थ को कोई भी  नहीं देख सकता है, यदि कोई भी उसे देखने का प्रयास करेगा, तो उसी क्षण उसकी मृत्यु हो जाएगी। 

मंदिर के ऊपर पक्षियों और विमानों का न उड़ना - इस मंदिर के ऊपर कभी भी कोई भी विमान नहीं उड़ता है और पक्षी भी कभी भी नहीं उड़ते हैं। यह रहस्य भी वैज्ञानिकों को बहुत ही आश्चर्यचकित करता है।

उल्टी हवा - साधारणता कहीं भी समुद्र के आसपास दिन में हवा समुद्र से जमीन की ओर और रात में जमीन से समुद्र की ओर बहती है, परंतु जगन्नाथ मंदिर के आसपास दिन में हवा जमीन से समुद्र की ओर और रात में समुद्र से जमीन की ओर बहती है।

समुद्र का आवाज न सुनाई देना - यह मंदिर समुद्र के किनारे स्थित है।इस मंदिर के बाहर समुद्र के लहरों की आवाज सुनाई देती है, परंतु इस मंदिर में प्रवेश करने पर आवाज सुनाई नहीं देता है।

मंदिर का परछाई न बनना - यह मंदिर 215 फीट ऊंचा है, परंतु फिर भी इसकी परछाई कभी भी नहीं बनती है। यह आश्चर्य करने वाली बात है और विज्ञान को भी चुनौती देती है। 

यमशिला - मंदिर में 22 सीढ़ियां हैं जिसमें तीसरी सीढ़ी को 'यमशिला' कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पर पैर रखने से मनुष्य के पुण्य नष्ट हो जाते हैं इसलिए भक्तगण इससे बचते हैं। 

जगन्नाथ जी का रथ यात्रा

प्रत्येक वर्ष पूरी में जगन्नाथ मंदिर की ओर से एक रथ यात्रा का आयोजन होता है। प्रत्येक वर्ष यह यात्रा आषाढ़ में शुक्ल पक्ष के द्वितीय तिथि को निकाली जाती है और शुक्ल पक्ष के 11 वे दिन यह यात्रा समाप्त होता है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियों को विशाल रथों पर बैठ कर पूरे पूरी नगर का भ्रमण कराया जाता है। इनमें सबसे आगे बलभद्र का रथ, बीच में बहन सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे जगन्नाथ जी का रथ होता है। 
          पौराणिक कथा के अनुसार, रथ यात्रा से एक बार भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने मौसी के घर जाते हैं। 
          माना जाता है कि बहन सुभद्रा ने रथ में बैठकर नगर यात्रा की इच्छा जताई थी। तब वे अपने भाई बलभद्र के साथ सुभद्रा को रथ पर नगर दिखाने ले गए थे और अपने मौसी के घर पहुंच कर वहां 7 दिन ठहरे थे। तभी से इस रथ यात्रा का आयोजन होता है। यह यात्रा भगवान जगन्नाथ के दर्शन का प्रतीक है। रथ बनाने वाली लकड़ी को विशेष रुप से चुना जाता है। लकड़ियों को जंगलों से लाकर पुरी में काटा और बनाया जाता है। प्रत्येक पुराने रथों को तोड़कर नया रथ तैयार किया जाता है। यात्रा के दौरान कई चमत्कारी घटनाएं होती है। रथ खींचने के दौरान एक अदृश्य शक्ति का अनुभव होता है जो रथ को गति देता है। ऐसा भी देखा जाता है कि जब भक्तों की कमी होती है, तो रथ स्वयं ही चलने लगता है।
           भगवान जगन्नाथ की यात्रा के दौरान रथ को एक मजार में रोका जाता है। इसके पीछे भी एक कहानी है। एक समय की बात है जहांगीर का एक सूबेदार हुआ करता था। वह एक ब्राह्मण विधवा महिला का धर्म परिवर्तन करके उससे विवाह कर लेता है। उनके पांच पुत्र होते हैं जिनमें से केवल सालबेग ही बचता है। माता का हिंदू होने के कारण सालबेग का हिंदू धर्म में आस्था जागने लगता है। उनकी माता भगवान जगन्नाथ जी की बहुत बड़ी भक्त थी। एक युद्ध के दौरान सालबेग के पिता की मृत्यु हो जाती है। इस युद्ध में सालबेग भी घायल हो जाता है और उसकी तबीयत काफी खराब हो जाती है। तब उनकी माता उससे भगवान जगन्नाथ जी का जाप करने के लिए कहते हैं। भगवान जगन्नाथ जी उसके सपने में आकर उसे एक धूप देते हैं और लगाने के लिए कहते हैं। जब वह नींद से उठता है, तो उसे सामने धूप रखा हुआ दिखता है। वह जैसे ही उसे अपने शरीर पर लगाता है, वह तुरंत ही ठीक हो जाता है। इसके बाद सालबेग का आस्था और मजबूत हो जाता है और वह भगवान जगन्नाथ जी का भक्त बन जाता है। वह इस घटना के बाद भगवान जगन्नाथ जी का दर्शन करने के लिए निकल जाता है।, परंतु मुस्लिम होने के कारण उसे मंदिर में प्रवेश करने नहीं दिया जाता है। इससे सालबेग दुखी होकर वृंदावन चले जाते हैं और वहीं श्री कृष्ण का भक्ति करने लगते हैं। जब रथ यात्रा का समय आता है, तो भगवान जगन्नाथ जी के रथ यात्रा के बारे में उसे जैसे ही पता चलता है वह रथ यात्रा के दर्शन के लिए वृंदावन से पैदल ही निकल जाता है। अचानक से बीच रास्ते में उसका तबीयत खराब होने लगता है और वह समय पर नहीं पहुंच पाता है। भगवान जगन्नाथ जी का रथ अचानक ही बालकंठी में रुक जाता है। रथ को अनेकों तरीकों से खींचने का प्रयास किया जाता है, परंतु रथ आगे बढ़ता ही नहीं है। लगभग 7 दिन बीतने पर भी रथ वहीं रुका रहता है। इससे लोग और राजा भी चिंतित हो जाते हैं। राजा को एक सपना आता है जिसमें भगवान जगन्नाथ जी उन्हें कहते हैं कि वे चिंतित न हो, वे अपने भक्त सालबेग का प्रतीक्षा कर रहे हैं। सालबेग थोड़ा ठीक होने पर बालकंठी पहुंचता है और भगवान जगन्नाथ जी का दर्शन करता है। इस बार उन्हें दर्शन करने से कोई नहीं रोकता है। जब उसे पता चलता है कि भगवान जगन्नाथ जी उनके लिए ही रुके हैं, तो वह भावुक हो जाता है। इसके बाद वह जगन्नाथ जी के लिए कई भक्ति गीत लिखता है जिन्हें आज भी मंदिर के गर्भगृह में सुबह के प्रार्थना के रूप में गाया जाता है। जहां भगवान जगन्नाथ जी का रथ रुका हुआ था वहां सालबेग की मृत्यु के बाद उसका समाधि बना दिया गया। यह आज भी मौजूद है।
भक्त सालबेग का समाधि 
इसलिए आज भी रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के रथ को उसकी समाधि के पास रोक दिया जाता है। 

भगवान जगन्नाथ जी का बीमार होना

भारत में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान भी बीमार हो जाते हैं। रथ यात्रा के 15 दिन से पहले भगवान जगन्नाथ बीमार हो जाते हैं। इस परंपरा को प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। जगन्नाथ यात्रा शुरू होने से पहले ज्येष्ठ माह के पूर्णिमा तिथि के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को 108 घड़ों के जल से स्नान कराया जाता है। इसे सहस्त्र धारा स्नान कहा जाता  है। ऐसा माना जाता है कि ठंडे पानी से स्नान करने से तीनों बीमार हो जाते हैं। फिर इन्हें 15 दिनों के लिए एकांतवास में रखा जाता है। इस दौरान मंदिर के कपाट को भी बंद रखा जाता है। इस समय भगवान को आयुर्वेदिक जड़ी बूटी और काढ़ा दिया जाता है। जब 15 दिनों बाद भगवान ठीक हो जाते हैं, तो उनका रथ यात्रा निकाला जाता है।
           पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय की बात है पुरी में माधव दास नामक भगवान जगन्नाथ जी का एक परम भक्त हुआ करता था। वह प्रतिदिन जगन्नाथ जी का भक्ति भाव से पूजा किया करता था। एक दिन वह बीमार हो जाता है और उन्हें उल्टी दस्त होने लगता है। वह बहुत कमजोर हो जाते हैं। साथ वह चल फिर भी नहीं पाते हैं। वह किसी का भी सहायता नहीं लेते हैं और अपना काम स्वयं ही करते हैं। जब उनका बीमारी ज्यादा गंभीर हो जाता है, तब भगवान जगन्नाथ जी स्वयं सेवक बनकर उनका सेवा करते हैं। माधव दास जी को होश आने पर वह पहचान जाते हैं कि यह तो उनके प्रभु हैं। वह उनसे कहते हैं आप तीनों लोकों के स्वामी होकर मेरी सेवा कर रहे हैं। आप चाहे तो मेरा यह रोग भी ठीक कर सकते हैं। तब भगवान जगन्नाथ जी उनसे कहते हैं कि उनसे अपने किसी भी भक्त का पीड़ा नहीं देखा जाता। इसलिए मैं सेवा कर रहा हूं। वे अपने परम भक्त को समझाते हुए कहते हैं कि हमारे भाग्य में लिखे हुए दुख हमें भुगतना ही पड़ता है। तुम्हारे पीड़ा को इस जन्म में मेरे ठीक करने पर भी तुम्हें अगले जन्म में भुगतना ही पड़ता। परंतु तुम्हारे 15 दिन के बचे हुए रोग को मैं स्वयं ले रहा हूं। इसी कारण से भगवान जगन्नाथ जी 15 दिनों के लिए बीमार पड़ जाते हैं। इस घटना को प्रतिवर्ष दोहराया जाता है।

 विपरीत दिशा में लहराने की पौराणिक कथा 

पौराणिक मान्यता के अनुसार, ध्वज का हवा के विपरीत दिशा में लहराने का संबंध हनुमान जी से माना जाता है। समुद्र की लहरों के कारण भगवान जगन्नाथ जी को विश्राम करने में परेशानी होती थी। जब हनुमान जी को यह पता चलता है, तो तो वे समुद्र को अपने शोर बंद करने के लिए कहते हैं। समुद्र देव उनसे कहते हैं कि वह उनके वश में नहीं है। जहां तक हवा की गति चलेगी उनकी आवाज वहीं तक चलेगा। इसके लिए वे हनुमान जी को अपने पिता पवन देव से विनती करने के लिए कहते हैं कि वे मंदिर की दिशा की ओर न बहें। पवन देव उनसे कहते हैं कि यह नहीं हो सकता है। इसके लिए वे उन्हें एक उपाय बताते हैं। उनके बताए उपाय अनुसार हनुमान जी स्वयं को दो भागों में विभाजित करके मंदिर के आसपास चक्कर लगाने लगते हैं। इससे वायु का एक ऐसा चक्र बनता है कि वायु मंदिर की ओर न जाकर मंदिर के आसपास ही घूमती रहती है और भगवान जगन्नाथ जी विश्राम करते रहते हैं। इसी कारण से मंदिर का ध्वज हवा के विपरीत दिशा में लहरता है।

बेड़ी हनुमान मंदिर 

भारत में कई सारे हनुमान मंदिर है। परंतु जगन्नाथ जी के पश्चिम में समुद्र तट पर मौजूद हनुमान जी का मंदिर स्वयं में विशेष महत्व रखता है। यह मंदिर समुद्र किनारे होने के कारण ही इसे दरिया महावीर मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति जंजीरों से बंधी रहती है। इसलिए इसे बेड़ी हनुमान मंदिर कहा जाता है। हनुमान जी का बेड़ियों से बंधना अजीब लगता है। परंतु ऐसा भगवान जगन्नाथ यानी श्री कृष्ण के कारण है। प्राचीन ग्रंथो के अनुसार जगन्नाथ मंदिर को समुद्र के प्रकोप से बचाने के लिए हनुमान जी को समुद्र किनारे तैनात किया गया था। परंतु हनुमान जी को प्रभु दर्शन की इच्छा होने पर शहर छोड़कर नगर में चले जाते थे। अवसर देखकर समुद्र भी नगर में चले आता था जिससे मंदिर को कई बार नुकसान हुआ था। भगवान जगन्नाथ हनुमान जी को कई बार समझने का प्रयास करते हैं, परंतु भगवान का दर्शन करने से वे स्वयं को रोक नहीं पाते थे। तब भगवान जगन्नाथ जी हनुमान जी को नगर में आने से रोकने के लिए समुद्र किनारे उन्हें बेड़ियों से बांध दिया। साथ ही उन्हें वहीं समुद्र किनारे रहकर मंदिर की सुरक्षा करने के लिए कहा। तब से हनुमान जी का मंदिर उसी समुद्र किनारे बना हुआ है और हनुमान जी वहां बंधे हुए हैं। माना जाता है कि इससे मंदिर में लहरों का आना बंद हो गया और मंदिर सुरक्षित रह गया। 
बेड़ी हनुमान मंदिर 

जगन्नाथ मंदिर में हुए हमले

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के चमत्कारों और रहस्यों से तो सभी सुपरिचित हैं। परंतु हम में से बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मंदिर पर कई बड़े हमले भी हुए हैं। इसके बावजूद इस बांध दिया मंदिर के प्रति समर्पण भक्त और राजाओं ने अपने प्राणों से खेल कर इस मंदिर का रक्षा किया और इस मंदिर के अस्तित्व को कुछ नहीं होने दिया। साथ ही मंदिर के चमत्कारों पर भी कोई असर नहीं होने दिया।
         इतिहासकारों के अनुसार, हमलों के कारण भगवान जगन्नाथ जी को 144 वर्षों तक मंदिर से दूर रहना पड़ा। 

           जगन्नाथ मंदिर पर हुए प्रमुख हमले 

पहला हमला - जगन्नाथ मंदिर को नष्ट करने के लिए बंगाल के सुल्तान इलियास शाह ने वर्ष 1340 में पहला हमला किया था। उस समय उड़ीसा को उत्कल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। उस समय उत्कल साम्राज्य के राजा नरसिंह देव तृतीय थे। उन्होंने मंदिर की रक्षा के लिए इलियास शाह से युद्ध किया था। इलियास शाह के सैनिकों ने मंदिर के परिसर में निर्दोष लोगों को मार कर बहुत खून बहाया। उस समय राजा नरसिंह देव ने मूर्तियों को छुपाने का आदेश दिया और भगवान जगन्नाथ जी के
मूर्तियों को सफलता पूर्वक बचा लिया। 

दूसरा हमला - 20 वर्ष बाद वर्ष 1360 में दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुग़लक़ ने जगन्नाथ मंदिर पर दूसरा हमला किया। 

तीसरा हमला - जगन्नाथ मंदिर पर तीसरा हमला वर्ष 1509 में बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह के कमांडर इस्माइल गाज़ी ने किया। उस समय सूर्यवंशी प्रताप रुद्रदेव का उड़ीसा पर शासन था। मंदिर के पुजारियों को हमले का खबर मिलते ही उन्होंने मूर्तियों को मंदिर से दूर बंगाल की खाड़ी में मौजूद चिल्का लेक नामक द्वीप पर छुपा दिया और प्रताप रुद्रदेव हुगली में आक्रमणकारियों की सेनाओं को हराकर भागने पर विवश कर देते हैं। 

चौथा हमला - वर्ष 1568 में काला पहाड़ नामक एक अफगान आक्रमणकारी जगन्नाथ मंदिर पर सबसे बड़ा हमला करता है। हमले से पहले ही एक बार फिर से पुजारियों द्वारा मूर्तियों को चिल्का लेक नामक द्वीप पर छुपा दिया जाता है। परंतु फिर भी आक्रमणकारी मंदिर के कुछ मूर्तियों को जलाकर नष्ट कर देते हैं। इस हमले में मंदिर के वास्तुकला को काफी नुकसान पहुंचता है। इस युद्ध के बाद उड़ीसा इस्लामिक शासन के अधीन आ जाता है।

पांचवा हमला - वर्ष 1592 में उड़ीसा के सुल्तान ईशा के बेटे उस्मान और कुथू खान के बेटे सुलेमान जगन्नाथ मंदिर पर पांचवा हमला करते हैं। इस युद्ध में लोगों को बेरहमी से मार कर मूर्तियों को अपवित्र किया जाता है और मंदिर की संपत्ति को लूट लिया जाता है। 

छठा हमला - वर्ष 1601 में बंगाल का नवाब इस्लाम खान का कमांडर मिर्ज़ा खुर्रम जगन्नाथ मंदिर पर छठा हमला करता है। इस युद्ध से मंदिर के पुजारी मूर्तियों को बचाने के लिए भार्गवी नदी के रास्ते से नाव के द्वारा पुरी के पास एक गांव कपिलेश्वर में छुपा देते हैं। वे मूर्तियों को बचाने के लिए उन्हें दूसरी जगह भी स्थानांतरित करते हैं।

सातवां हमला - जगन्नाथ मंदिर पर सातवां हमला उड़ीसा का सूबेदार हाशिम खान करता है। परंतु हमले से पहले ही मूर्तियों को खुर्दा के गोपाल मंदिर में छुपा लिया जाता है। इस हमले में भी मंदिर को काफी नुकसान पहुंचाया जाता है। वर्ष 1608 में जगन्नाथ मंदिर में दोबारा मूर्तियों को वापस लाया जाता है।

आठवां हमला - मंदिर पर आठवां हमला हाशिम खान की सेना में काम करने वाला एक हिंदू जागीरदार करता है। उस समय सौभाग्य से मंदिर में मूर्तियां मौजूद नहीं थी। इस हमले में मंदिर का धन लूट लिया जाता है और उसे एक किले में बदल दिया जाता है। 

नौंवा हमला -  मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल राजा टोडरमल का बेटा राजा कल्याणमल वर्ष 1611 में मंदिर पर नौंवा हमला करता है। इस बार भी पुजारियों द्वारा मूर्तियों को बंगाल की खाड़ी में मौजूद एक द्वीप में छुपा दिया जाता है‌।

दसवां हमला - दसवां हमला भी कल्याणमल ही करता है और हमले में मंदिर को बुरी तरह से लूट लेता है। 

ग्यारहवां हमला - दिल्ली का बादशाह जहांगीर का सेनापति मुकर्रम खान वर्ष 1617 में मंदिर पर 11वां हमला करता है। उस समय मंदिर के मूर्तियों की रक्षा के लिए उन्हें गोबापदार नामक जगह पर छुपा लिया जाता है।

बारहवां हमला - उड़ीसा का मुगल गवर्नर मिर्ज़ा अहमद बेग 1621 में मंदिर पर 12वां हमला करता है। उस समय मुगल बादशाह शाहजहां एक बार उड़ीसा का दौरा करता है। इस बार भी पुजारियों द्वारा मूर्तियों को छुपा लिया जाता है।

तेरहवां हमला - जगन्नाथ मंदिर पर तेरहवां हमला वर्ष 1641 में मुगल गवर्नर मिर्ज़ा मक्की द्वारा किया जाता है।

चौदहवां हमला - मिर्ज़ा मक्की ही जगन्नाथ मंदिर पर 14वां हमला भी करता है और कई निर्दोष लोगों को मारता है।
 
पन्द्रहवां हमला - मंदिर पर 15वां हमला आमिर फतेह खान करता है और मंदिर के रत्नभंडार में मौजूद हीरे, मोती और सोने जैसी अपार संपत्ति को लूटता है। 

सोलहवां हमला - मंदिर पर सोलहवां हमला मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश पर वर्ष 1692 में होता है। औरंगजेब मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त करने का आदेश देता है। उस समय उड़ीसा का नवाब इकरम खान मुगलों के अधीन था। इकरम खान मंदिर पर हमला कर भगवान का सोने का मुकुट लूट लेता है। उस समय मूर्तियों को श्री मंदिर नामक एक जगह के बिमला मंदिर में छुपाया जाता है।

17 वां हमला - मुहम्मद तकी खान वर्ष 1699 में मंदिर पर 17 वां और आखिरी हमला करता है। वह 1727 से 1734 तक उड़ीसा का नायब सूबेदार रहता है। इस बार भी मंदिर के पुजारियों को संदेह होने पर वे मूर्तियों को छुपा लेते हैं और लगातार अन्य जगहों पर स्थानांतरित करते रहते हैं। कुछ समय के लिए मूर्तियों को हैदराबाद में भी छुपाया जाता है।

इजरायल : एक छोटा परंतु विश्व का एक शक्तिशाली देश

 आज हम एक देश के बारे में बताने जा रहे हैं जो विश्व के मानचित्र में तो बहुत छोटा है परंतु यह विश्व के शक्तिशाली देश में से एक है। इस देश के ...