जगन्नाथ मंदिर : मंदिर जहां है श्री कृष्ण का हृदय और जिसकी मूर्तियां है अधूरी

 हमारे भारत देश में असंख्य मंदिर हैं जो अपने अद्भुत वस्तुकला और अपने रहस्यों के लिए प्रसिद्ध होने के साथ लोगों को अपनी और आकर्षित करते हैं। साथ ही लोगों को उनके रहस्यों को जानने का रुचि भी होता है। ऐसा ही एक मंदिर है जो भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। यह मंदिर है श्री जगन्नाथ मंदिर।

जगन्नाथ मंदिर पुरी 
जगन्नाथ मंदिर उड़ीसा के पुरी शहर में स्थित एक विशेष हिंदू मंदिर है। यह भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। साथ ही यह मंदिर चार धामों में से एक है। मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु अपने चारों धामों के यात्रा के दौरान पुरी में भोजन करते हैं। यह मंदिर प्रत्येक वर्ष अपने विशाल रथ यात्रा के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है जिसमें भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने रथों पर सवार होकर पुरी नगरी का भ्रमण करते है। इसकी वास्तुकला कलिंग शैली की है। इसे विश्व के रहस्यमय मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर का उल्लेख प्राचीन ग्रंथो जैसे -ब्रह्म पुराण, नारद पुराण, स्कंद पुराण और पद्म पुराण में भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का अस्तित्व सतयुग के आरंभ से है। स्कंद पुराण में भगवान विष्णु का नील माधव के रूप में नीलांचल पर्वत में अवतरण का उल्लेख है। ब्रह्म पुराण और नारद पुराण में पुरी को पुरुषोत्तम क्षेत्र कहा गया है। पद्म पुराण में भगवान राम के भाई शत्रुघ्न का इस पवित्र स्थान की यात्रा का वर्णन है। इस मंदिर में केवल सनातनी हिंदुओं को ही प्रवेश करने की अनुमति है। यह मंदिर कई तरह के विज्ञान को भी चुनौती देता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर के मूर्ति में भगवान श्री कृष्ण का हृदय है। साथ ही यह मंदिर अपने कई तरह के रहस्यों से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस मंदिर में पूजा की जाने वाली मूर्तियां अधूरी बनी हुई है।

जगन्नाथ मंदिर की पौराणिक कथा 

कलयुग के शुरू होने से कुछ समय पहले भगवान श्री कृष्ण वन में विश्राम कर रहे होते हैं। उसी समय एक साबर कबीले का जरा नामक एक आदिवासी वन में शिकार करने के लिए आता है। वह श्री कृष्ण को हिरण समझकर तीर चलाता है। तीर श्री कृष्ण के पैर में लग जाता है। जब जरा सामने जाकर देखता है, तो उसे पता चलता है कि उसने जिस पर तीर चलाया वह श्री कृष्ण है। जरा उनसे अपनी भूल के लिए क्षमा मांगते हैं। इस पर श्री कृष्ण उसे कहते हैं कि उन्होंने त्रेता युग में श्री राम के रूप में बालि को छुप कर तीर मारा था और तुम पूर्व जन्म में वानर राज बालि थे। इसलिए मैंने वैसी ही मृत्यु चुनी। इसके बाद श्री कृष्ण की मृत्यु हो जाती है। जब पांडवों तक श्रीकृष्ण की मृत्यु की खबर पहुंचती है, तो वे श्री कृष्ण के अंतिम दर्शन के लिए आते हैं और उनका अंतिम संस्कार कर देते हैं। श्री कृष्ण का अंतिम संस्कार में अग्नि से उनका शरीर तो जल जाता है, परंतु उनका हृदय नहीं जलता। इसे देखकर पांडव आश्चर्य चकित हो जाते हैं। वे उनके हृदय को लकड़ी के लट्ठे में बांध कर नदी में बहा देते हैं। लेकिन सब्र कबीले का जरा नामक आदिवासी उस हृदय को लट्ठे से निकाल लेता है जिसमें से नीले रंग की तेज रोशनी निकल रही होती है। फिर उसे अपने साथ एक गुफा में ले जाकर उसकी पूजा करने लगता है। कुछ समय बाद इसे सब्र कबीले के लोगों द्वारा नील माधव के रूप में पूजा जाने लगता है। यह भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इस कबीले का मुखिया विश्वासु था। वे भगवान नील माधव को नीलांचल पर्वत की एक गुफा में पूजा किया करते थे। उस समय मालवा में इंद्रद्युम्न नामक एक राजा था। वे धर्म रक्षक और दान पुण्य का काम सदैव करते रहते थे। वे भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। एक दिन उन्हें एक सपना आता है जिसमें वे नीलांचल पर्वत के एक गुफा में नीले रंग के रूप में भगवान विष्णु के विग्रह को देखते हैं। जब वे सुबह उठते हैं, तो वे कुछ जानकारों, ज्योतिषीयों और चित्रकारों को बुलाते हैं। वे उन्हें अपने सपने के बारे में बताते हैं ताकि उनके सपने में देखे गये दृश्य का वह चित्र बना सके। उनमें से एक विद्वान राजा को बताता है कि वे जिस जगह के विषय में पुछ रहे हैं उसका वर्णन पुराणों में मिलता है। उस क्षेत्र को नीलांचल पर्वत कहा जाता है, परंतु उस पर्वत के विषय में कोई नहीं जानता है। आपको इस तरह के सपने का आना भगवान विष्णु की कोई लीला भी हो सकती है। फिर राजा ने अपने सैनिकों को नीलांचल पर्वत और उस पवित्र गुफा को ढूंढने के लिए सभी दिशाओं में भेज दिया। दूसरी ओर राजा को एक और सपना आता है जिसमें वे समुद्र की लहरों के साथ एक मंदिर देखते हैं। उन्हें लगता है कि ईश्वर उनसे एक मंदिर के निर्माण के लिए कह रहे हैं। राजा अगले दिन से ही मंदिर के निर्माण का कार्य प्रारंभ कर देते हैं, परंतु समुद्र की लहरों के कारण मंदिर का निर्माण नहीं हो पता है। मंदिर का निर्माण होने के बाद भी समुद्र के लहरों के कारण मंदिर बार-बार ध्वस्त हो जा रहा था। फिर राजा हनुमान जी का स्तुति कर मंदिर निर्माण में उनका सहायता मांगते हैं। हनुमान जी राजा का अनुरोध मान लेते हैं और वे सूक्ष्म रुप से वहां विराजमान हो जाते हैं। इसके बाद हनुमान जी समुद्र की ओर मुख करके बैठ जाते हैं। फिर मंदिर का निर्माण शुरू किया जाता है। इस बार हनुमान जी की उपस्थिति होने से मंदिर के निर्माण में कोई विघ्न नहीं आता है और मंदिर का निर्माण पूरा हो जाता है। इसके बाद राजा मंदिर के गर्भगृह में ईश्वर के विग्रह को स्थापित करने के विषय में सोचते हैं। नीलांचल पर्वत की खोज में गए सभी सैनिक खाली हाथ लोटते हैं। इन सभी सैनिकों में ब्राह्मण विद्यापति नामक एक सैनिक था जो एक आध्यात्मिक व्यक्ति था। वह नीलांचल पर्वत को खोज लेता है। उसे यह भी पता चल जाता है कि उस पर्वत में एक गुफा है जहां ईश्वर के विग्रह का नील माधव के रूप में सब्र कबीले का मुखिया विश्वासु पूजा करता है और उन्होंने अपने ईश्वर को नीलांचल पर्वत के एक गुफा में छुपाया है। विश्वासु नील माधव का बहुत बड़ा भक्त था। विद्यापति को पता चलता है कि विश्वासु नील माधव को किस गुफा में छुपा कर रखा है, इसके बारे में किसी को नहीं बताएगा। इसलिए विद्यापति विश्वासु की पुत्री को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उससे विवाह कर लेते हैं। विद्यापति उनकी पुत्री से नील माधव का दर्शन कराने के लिए कहते हैं। परंतु विश्वासु अपनी पुत्री से दर्शन कराने के लिए मना करते हैं। विश्वासु को केवल एक ही संतान था, तो उनकी पुत्री उनसे कहती है कि आपके बाद हमें ही नील माधव का पुजा करना है इसलिए उनका पता बता दीजिए। विश्वासु अपने पुत्री की बात मान लेते हैं और विद्यापति के आंखों में पट्टी बांधकर उन्हें नील माधव का दर्शन कराने के लिए उस गुफा में ले जाते हैं। विद्यापति बहुत ही बुद्धिमान था। आंखों में पट्टी बंधी होने के कारण रास्ते का पता लगाने के लिए वह अपने हाथों में सरसों का बीज रख लेता है और रास्ते में थोड़ा-थोड़ा करके गिराते हुए जाता है। जब वर्षा का मौसम आता है, तो सरसों का बीज अंकुरित होकर उग जाता है। फिर विद्यापति राजा इंद्रद्युम्न के साथ आता है और अंकुरित बीजों के जरिए रास्ते का पता लगाकर नील माधव के गुफा तक पहुंच जाता है। वह राजा के साथ नील माधव के विग्रह को चुराकर भाग जाता है। जब विश्वासु को पता चलता है कि गुफा में भगवान का विग्रह नहीं है, तो वह बहुत दुखी हो जाता है। राजा इंद्रद्युम्न भगवान के विग्रह को मंदिर में तो स्थापित कर देते हैं, परंतु उस विग्रह से निकलने वाली तेज नीली रोशनी के कारण कोई भी उसका दर्शन नहीं कर पाता है। इसके कारण राजा चिंतित हो जाते हैं। फिर एक दिन भगवान विष्णु फिर से राजा के सपने में आकर उनसे कहते हैं कि उन्हें समुद्र के किनारे बहकर आने वाली एक पेड़ के लट्ठे को लाना होगा। वह लट्ठा द्वारिका से बहकर आ रहा है और तुम्हें उसी लट्ठे से मूर्ति बनाकर मेरे विग्रह को स्थापित करना है। राजा अपने सैनिकों से उस पेड़ के लट्ठे को लाने के लिए कहते हैं। उनके सैनिक पेड़ के लट्ठे को तो ढूंढ लेते हैं, परंतु उसे वे हिला भी नहीं पाते हैं। हनुमान जी उनसे आकर कहते हैं कि उन्होंने नील माधव के विग्रह को चुराकर लाया है इसलिए वे पाप के भागी हैं और पेड़ के लट्ठे को नहीं ले जा सकते। यदि वे इस पेड़ के लट्ठे को ले जाना चाहते हैं, तो उन्हें विश्वासु से क्षमा याचना करनी होगी। राजा को अपने भुल का आभास होता है। वे विश्वासु के पास जाकर उनसे क्षमा मांगते हैं और उस लट्ठे को लाने के लिए कहते हैं। विश्वासु उन्हें क्षमा कर देते हैं और बिना किसी के सहायता से उस लट्ठे को उठा कर ले आते हैं। सभी लोग इस दृश्य को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। विश्वासु उस लट्ठे को मंदिर के बाहर लाकर छोड़ देते हैं। फिर राजा बड़े से बड़ा कुशल मूर्तिकार को बुलाता है, परंतु जब लट्ठे से मूर्ति बनाने की बारी आती है, तो कोई भी मूर्तिकार उस लट्ठे में थोड़ा सा भी छेद नहीं कर पाता है। राजा इससे बहुत दुखी हो जाते हैं। तब तीनों लोकों के कुशल कारीगर कहे जाने वाले विश्वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धारण करके उस लकड़ी के लट्ठे से मूर्ति बनाने का निर्णय लेते हैं। विश्वकर्मा वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण करके राजा के पास पहुंचते हैं और उनसे कहते हैं कि वे उस लकड़ी के लट्ठे से मूर्ति बना सकते हैं। राजा उनसे पूछते हैं कि उस लकड़ी से कितनी मूर्तियां बनेंगी, तो वे उत्तर देते हैं कि तीन मूर्तियां बनेंगी। पहली मूर्ति जगन्नाथ जी की, दूसरी उनकी बहन सुभद्रा की और तीसरी उनके भाई बलभद्र की। यह सुनकर राजा अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उन्हें मूर्ति बनाने की अनुमति दे देते हैं। परंतु इसके लिए वृद्ध व्यक्ति के रूप में आए विश्वकर्मा जी राजा से एक शर्त रखते हैं कि वे अकेले ही 21 दिनों तक गर्भ गृह में मूर्ति का निर्माण करेंगे, कोई भी व्यक्ति उसे नहीं देखेगा और इस दौरान गर्भगृह का दरवाजा बंद रहेगा। यदि इन 21 दिनों में कोई भी व्यक्ति उसे देखने के लिए अंदर आएगा, तो वे उसी क्षण मूर्ति छोड़कर चले जाएंगे। राजा उनकी शर्तें मान लेते हैं। बंद गर्भगृह में विश्वकर्मा जी मूर्ति बनाने का काम शुरू कर देते हैं। उस गर्भगृह से छेनी और हथौड़े की आवाज आती है। कोई भी व्यक्ति उसके आसपास भटकने का प्रयास नहीं करता है, परंतु 15 दिन होने पर अंदर से छेनी और हथौड़े का आवाज आना बंद हो जाता है। इससे राजा की गुड़िचा नामक रानी चिंतित हो जाती हैं। वे राजा को बुलाकर उस दरवाजे को खोलने के लिए कहती हैं। राजा आवाज देते हैं, परंतु अंदर से कोई भी आवाज नहीं आता है। राजा को लगता है कि वृद्ध व्यक्ति भूख प्यास से कहीं मर तो नहीं गया। इसलिए राजा अपने सभी शर्तों को एक तरफ कर अपने सैनिकों को दरवाजा खोलने का आदेश देते हैं। विश्वकर्मा जी आधी अधूरी मूर्ति में श्री कृष्ण के हृदय को स्थापित कर देते हैं। जैसे ही दरवाजा खोला जाता है सभी देख कर चौंक जाते हैं कि वृद्ध व्यक्ति वहां नहीं है और कमरे में तीन आधी अधूरी मर्तियां हैं। जगन्नाथ जी और उनके भाई बलभद्र के छोटे-छोटे हाथ बने हुए थे, परंतु उनके पैर गायब थे। साथ ही उनकी बहन सुभद्रा की हाथ और पैर दोनों ही नहीं थे। राजा को लगता है कि शायद यही ईश्वर की इच्छा है। वे तीनों मूर्तियां को उसी अवस्था में मंदिर में स्थापित कर देते हैं। आज उसी अवस्था में तीनों मूर्तियां मंदिर में विराजमान है जिनमें भगवान जगन्नाथ जी और उनके भाई बलभद्र के आधे अधूरे हाथ हैं और उनकी बहन सुभद्रा के हाथ और पैर नहीं हैं।

वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 

वैसे तो जगन्नाथ मंदिर के निर्माण का नींव रखने का श्रेय राजा इंद्रद्युम्न को जाता है, परंतु वर्तमान मंदिर का निर्माण पूर्वी गंग राजवंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने 12वीं शताब्दी में शुरू किया था। उन्होंने 1077 से 1147 ई के बीच इसका निर्माण करवाया। बाद में उड़ीसा के शासक अनंग भीम देव ने 1230 ईस्वी में इसका वर्तमान रूप दिया।

जगन्नाथ मंदिर के रहस्य

मंदिर का ध्वज - इस मंदिर के ध्वज की विशेषता है कि यह सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराती है। यह अविश्वसनीय है। विज्ञान के अनुसार, ध्वज को हवा के दिशा में ही लहराना चाहिए, परंतु यहां ऐसा नहीं होता है। यह रहस्य विज्ञान को चुनौती देता है। इस ध्वज को 1800 वर्षों से प्रत्येक दिन बदला जाता आ रहा है। प्रतिदिन सायं काल मंदिर के ऊपर स्थापित इस ध्वजा को पुजारियों द्वारा बिना किसी सहायता के 214 फुट उल्टा चढ़कर बदला जाता है। मान्यता है कि यदि एक भी दिन इस ध्वज को बदला नहीं जाएगा, तो मंदिर अगले 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा।
मंदिर का ध्वज 

मंदिर का सुदर्शन चक्र - मंदिर पर लगा सुदर्शन चक्र भी एक रहस्य है। इस सुदर्शन चक्र को किसी भी दिशा से देखने पर यह अपनी ओर ही दिखता है। यह वास्तु कला का बहुत ही अद्भुत उदाहरण है। इसे मंदिर के निर्माण के समय ही लगाया गया था।
सुदर्शन चक्र 
मंदिर का रसोईघर - मंदिर का रसोईघर विश्व का सबसे बड़ा रसोइघर है। यहां भगवान जगन्नाथ को चढ़ाए जाने वाले महाप्रसाद निर्माण हेतु 500 रसोईए और 300 सहायक सहयोगी एक साथ काम करते हैं। इसमें प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तनों को एक दूसरे के ऊपर रखा जाता है और सब कुछ लकड़ी पर ही बनता है। इस प्रक्रिया में सबसे ऊपर वाला बर्तन पहले पकता है और फिर क्रमश: नीचे की ओर एक के बाद एक पकती जाती है और सबसे नीचे वाला बर्तन सबसे अंत में पकता है।

मंदिर का प्रसाद - मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। इसमें बनने वाला प्रसाद का एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है और जितने भी असंख्य भक्त आ जाएं, सभी को खिलाया जा सकता है।

मूर्तियों का रहस्य - मंदिर के मूर्तियों की विशेष बात यह है कि इन मूर्तियों को लकड़ी से बनाया जाता है। प्रत्येक 12 वर्षों में एक विशेष अनुष्ठान के तहत पुरानी मूर्तियों को बदलकर उनके स्थान पर नई मूर्तियों को स्थापित किया जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान पुरानी मूर्तियों को एक गुप्त स्थान में दफन किया जाता है और नई मूर्तियों का निर्माण किया जाता है। मूर्तियों में प्रयोग होने वाली लड़कियों का चयन विशेष रुप  से किया जाता है। इस प्रक्रिया को गोपनीयता के साथ ही किया जाता है। मूर्तियां बदलने के समय पुरी शहर के बिजलियां काट दी जाती है और मंदिर के आस पास भी अंधेरा कर दिया जाता है।

ब्रह्म पदार्थ का रहस्य - मंदिर के रहस्यों में ब्रह्म पदार्थ का रहस्य सबसे बड़ा रहस्य है। मान्यता है कि यही ब्रह्म पदार्थ श्री कृष्ण का हृदय है। मूर्तियां बदलने के प्रक्रिया के समय जब मूर्तियों को बदल जाता है, तो सब कुछ बदल दिया जाता है, परंतु इस ब्रह्म पदार्थ को नहीं बदला जाता है। इसको पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में स्थापित किया जाता है। इस दौरान मंदिर के बाहर CRPF के जवानों को तैनात किया जाता है। किसी का भी मंदिर में आना-जाना मना रहता है। केवल मुख्य पुजारियों को ही अंदर आने की अनुमति होती है, परंतु उन्हें भी ब्रह्म पदार्थ का रहस्य जानने का अनुमति नहीं होता है। इस दौरान उनके आंखों में पट्टियां बांधकर हाथों में मोटे दस्ताने पहनाए जाते हैं और उन्हीं के द्वारा पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में ब्रह्म पदार्थ को स्थापित किया जाता है। कुछ पुजारी अपने अनुभव से बताते हैं कि जब उन्होंने ब्रह्म पदार्थ को छुआ, तो उन्हें ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे कोई सजीव वस्तु हो और वह खरगोश की तरह उछल रहा है। इस ब्रह्म पदार्थ को कोई भी  नहीं देख सकता है, यदि कोई भी उसे देखने का प्रयास करेगा, तो उसी क्षण उसकी मृत्यु हो जाएगी। 

मंदिर के ऊपर पक्षियों और विमानों का न उड़ना - इस मंदिर के ऊपर कभी भी कोई भी विमान नहीं उड़ता है और पक्षी भी कभी भी नहीं उड़ते हैं। यह रहस्य भी वैज्ञानिकों को बहुत ही आश्चर्यचकित करता है।

उल्टी हवा - साधारणता कहीं भी समुद्र के आसपास दिन में हवा समुद्र से जमीन की ओर और रात में जमीन से समुद्र की ओर बहती है, परंतु जगन्नाथ मंदिर के आसपास दिन में हवा जमीन से समुद्र की ओर और रात में समुद्र से जमीन की ओर बहती है।

समुद्र का आवाज न सुनाई देना - यह मंदिर समुद्र के किनारे स्थित है।इस मंदिर के बाहर समुद्र के लहरों की आवाज सुनाई देती है, परंतु इस मंदिर में प्रवेश करने पर आवाज सुनाई नहीं देता है।

मंदिर का परछाई न बनना - यह मंदिर 215 फीट ऊंचा है, परंतु फिर भी इसकी परछाई कभी भी नहीं बनती है। यह आश्चर्य करने वाली बात है और विज्ञान को भी चुनौती देती है। 

यमशिला - मंदिर में 22 सीढ़ियां हैं जिसमें तीसरी सीढ़ी को 'यमशिला' कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पर पैर रखने से मनुष्य के पुण्य नष्ट हो जाते हैं इसलिए भक्तगण इससे बचते हैं। 

जगन्नाथ जी का रथ यात्रा

प्रत्येक वर्ष पूरी में जगन्नाथ मंदिर की ओर से एक रथ यात्रा का आयोजन होता है। प्रत्येक वर्ष यह यात्रा आषाढ़ में शुक्ल पक्ष के द्वितीय तिथि को निकाली जाती है और शुक्ल पक्ष के 11 वे दिन यह यात्रा समाप्त होता है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियों को विशाल रथों पर बैठ कर पूरे पूरी नगर का भ्रमण कराया जाता है। इनमें सबसे आगे बलभद्र का रथ, बीच में बहन सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे जगन्नाथ जी का रथ होता है। 
          पौराणिक कथा के अनुसार, रथ यात्रा से एक बार भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने मौसी के घर जाते हैं। 
          माना जाता है कि बहन सुभद्रा ने रथ में बैठकर नगर यात्रा की इच्छा जताई थी। तब वे अपने भाई बलभद्र के साथ सुभद्रा को रथ पर नगर दिखाने ले गए थे और अपने मौसी के घर पहुंच कर वहां 7 दिन ठहरे थे। तभी से इस रथ यात्रा का आयोजन होता है। यह यात्रा भगवान जगन्नाथ के दर्शन का प्रतीक है। रथ बनाने वाली लकड़ी को विशेष रुप से चुना जाता है। लकड़ियों को जंगलों से लाकर पुरी में काटा और बनाया जाता है। प्रत्येक पुराने रथों को तोड़कर नया रथ तैयार किया जाता है। यात्रा के दौरान कई चमत्कारी घटनाएं होती है। रथ खींचने के दौरान एक अदृश्य शक्ति का अनुभव होता है जो रथ को गति देता है। ऐसा भी देखा जाता है कि जब भक्तों की कमी होती है, तो रथ स्वयं ही चलने लगता है।
           भगवान जगन्नाथ की यात्रा के दौरान रथ को एक मजार में रोका जाता है। इसके पीछे भी एक कहानी है। एक समय की बात है जहांगीर का एक सूबेदार हुआ करता था। वह एक ब्राह्मण विधवा महिला का धर्म परिवर्तन करके उससे विवाह कर लेता है। उनके पांच पुत्र होते हैं जिनमें से केवल सालबेग ही बचता है। माता का हिंदू होने के कारण सालबेग का हिंदू धर्म में आस्था जागने लगता है। उनकी माता भगवान जगन्नाथ जी की बहुत बड़ी भक्त थी। एक युद्ध के दौरान सालबेग के पिता की मृत्यु हो जाती है। इस युद्ध में सालबेग भी घायल हो जाता है और उसकी तबीयत काफी खराब हो जाती है। तब उनकी माता उससे भगवान जगन्नाथ जी का जाप करने के लिए कहते हैं। भगवान जगन्नाथ जी उसके सपने में आकर उसे एक धूप देते हैं और लगाने के लिए कहते हैं। जब वह नींद से उठता है, तो उसे सामने धूप रखा हुआ दिखता है। वह जैसे ही उसे अपने शरीर पर लगाता है, वह तुरंत ही ठीक हो जाता है। इसके बाद सालबेग का आस्था और मजबूत हो जाता है और वह भगवान जगन्नाथ जी का भक्त बन जाता है। वह इस घटना के बाद भगवान जगन्नाथ जी का दर्शन करने के लिए निकल जाता है।, परंतु मुस्लिम होने के कारण उसे मंदिर में प्रवेश करने नहीं दिया जाता है। इससे सालबेग दुखी होकर वृंदावन चले जाते हैं और वहीं श्री कृष्ण का भक्ति करने लगते हैं। जब रथ यात्रा का समय आता है, तो भगवान जगन्नाथ जी के रथ यात्रा के बारे में उसे जैसे ही पता चलता है वह रथ यात्रा के दर्शन के लिए वृंदावन से पैदल ही निकल जाता है। अचानक से बीच रास्ते में उसका तबीयत खराब होने लगता है और वह समय पर नहीं पहुंच पाता है। भगवान जगन्नाथ जी का रथ अचानक ही बालकंठी में रुक जाता है। रथ को अनेकों तरीकों से खींचने का प्रयास किया जाता है, परंतु रथ आगे बढ़ता ही नहीं है। लगभग 7 दिन बीतने पर भी रथ वहीं रुका रहता है। इससे लोग और राजा भी चिंतित हो जाते हैं। राजा को एक सपना आता है जिसमें भगवान जगन्नाथ जी उन्हें कहते हैं कि वे चिंतित न हो, वे अपने भक्त सालबेग का प्रतीक्षा कर रहे हैं। सालबेग थोड़ा ठीक होने पर बालकंठी पहुंचता है और भगवान जगन्नाथ जी का दर्शन करता है। इस बार उन्हें दर्शन करने से कोई नहीं रोकता है। जब उसे पता चलता है कि भगवान जगन्नाथ जी उनके लिए ही रुके हैं, तो वह भावुक हो जाता है। इसके बाद वह जगन्नाथ जी के लिए कई भक्ति गीत लिखता है जिन्हें आज भी मंदिर के गर्भगृह में सुबह के प्रार्थना के रूप में गाया जाता है। जहां भगवान जगन्नाथ जी का रथ रुका हुआ था वहां सालबेग की मृत्यु के बाद उसका समाधि बना दिया गया। यह आज भी मौजूद है।
भक्त सालबेग का समाधि 
इसलिए आज भी रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के रथ को उसकी समाधि के पास रोक दिया जाता है। 

भगवान जगन्नाथ जी का बीमार होना

भारत में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान भी बीमार हो जाते हैं। रथ यात्रा के 15 दिन से पहले भगवान जगन्नाथ बीमार हो जाते हैं। इस परंपरा को प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। जगन्नाथ यात्रा शुरू होने से पहले ज्येष्ठ माह के पूर्णिमा तिथि के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को 108 घड़ों के जल से स्नान कराया जाता है। इसे सहस्त्र धारा स्नान कहा जाता  है। ऐसा माना जाता है कि ठंडे पानी से स्नान करने से तीनों बीमार हो जाते हैं। फिर इन्हें 15 दिनों के लिए एकांतवास में रखा जाता है। इस दौरान मंदिर के कपाट को भी बंद रखा जाता है। इस समय भगवान को आयुर्वेदिक जड़ी बूटी और काढ़ा दिया जाता है। जब 15 दिनों बाद भगवान ठीक हो जाते हैं, तो उनका रथ यात्रा निकाला जाता है।
           पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय की बात है पुरी में माधव दास नामक भगवान जगन्नाथ जी का एक परम भक्त हुआ करता था। वह प्रतिदिन जगन्नाथ जी का भक्ति भाव से पूजा किया करता था। एक दिन वह बीमार हो जाता है और उन्हें उल्टी दस्त होने लगता है। वह बहुत कमजोर हो जाते हैं। साथ वह चल फिर भी नहीं पाते हैं। वह किसी का भी सहायता नहीं लेते हैं और अपना काम स्वयं ही करते हैं। जब उनका बीमारी ज्यादा गंभीर हो जाता है, तब भगवान जगन्नाथ जी स्वयं सेवक बनकर उनका सेवा करते हैं। माधव दास जी को होश आने पर वह पहचान जाते हैं कि यह तो उनके प्रभु हैं। वह उनसे कहते हैं आप तीनों लोकों के स्वामी होकर मेरी सेवा कर रहे हैं। आप चाहे तो मेरा यह रोग भी ठीक कर सकते हैं। तब भगवान जगन्नाथ जी उनसे कहते हैं कि उनसे अपने किसी भी भक्त का पीड़ा नहीं देखा जाता। इसलिए मैं सेवा कर रहा हूं। वे अपने परम भक्त को समझाते हुए कहते हैं कि हमारे भाग्य में लिखे हुए दुख हमें भुगतना ही पड़ता है। तुम्हारे पीड़ा को इस जन्म में मेरे ठीक करने पर भी तुम्हें अगले जन्म में भुगतना ही पड़ता। परंतु तुम्हारे 15 दिन के बचे हुए रोग को मैं स्वयं ले रहा हूं। इसी कारण से भगवान जगन्नाथ जी 15 दिनों के लिए बीमार पड़ जाते हैं। इस घटना को प्रतिवर्ष दोहराया जाता है।

 विपरीत दिशा में लहराने की पौराणिक कथा 

पौराणिक मान्यता के अनुसार, ध्वज का हवा के विपरीत दिशा में लहराने का संबंध हनुमान जी से माना जाता है। समुद्र की लहरों के कारण भगवान जगन्नाथ जी को विश्राम करने में परेशानी होती थी। जब हनुमान जी को यह पता चलता है, तो तो वे समुद्र को अपने शोर बंद करने के लिए कहते हैं। समुद्र देव उनसे कहते हैं कि वह उनके वश में नहीं है। जहां तक हवा की गति चलेगी उनकी आवाज वहीं तक चलेगा। इसके लिए वे हनुमान जी को अपने पिता पवन देव से विनती करने के लिए कहते हैं कि वे मंदिर की दिशा की ओर न बहें। पवन देव उनसे कहते हैं कि यह नहीं हो सकता है। इसके लिए वे उन्हें एक उपाय बताते हैं। उनके बताए उपाय अनुसार हनुमान जी स्वयं को दो भागों में विभाजित करके मंदिर के आसपास चक्कर लगाने लगते हैं। इससे वायु का एक ऐसा चक्र बनता है कि वायु मंदिर की ओर न जाकर मंदिर के आसपास ही घूमती रहती है और भगवान जगन्नाथ जी विश्राम करते रहते हैं। इसी कारण से मंदिर का ध्वज हवा के विपरीत दिशा में लहरता है।

बेड़ी हनुमान मंदिर 

भारत में कई सारे हनुमान मंदिर है। परंतु जगन्नाथ जी के पश्चिम में समुद्र तट पर मौजूद हनुमान जी का मंदिर स्वयं में विशेष महत्व रखता है। यह मंदिर समुद्र किनारे होने के कारण ही इसे दरिया महावीर मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति जंजीरों से बंधी रहती है। इसलिए इसे बेड़ी हनुमान मंदिर कहा जाता है। हनुमान जी का बेड़ियों से बंधना अजीब लगता है। परंतु ऐसा भगवान जगन्नाथ यानी श्री कृष्ण के कारण है। प्राचीन ग्रंथो के अनुसार जगन्नाथ मंदिर को समुद्र के प्रकोप से बचाने के लिए हनुमान जी को समुद्र किनारे तैनात किया गया था। परंतु हनुमान जी को प्रभु दर्शन की इच्छा होने पर शहर छोड़कर नगर में चले जाते थे। अवसर देखकर समुद्र भी नगर में चले आता था जिससे मंदिर को कई बार नुकसान हुआ था। भगवान जगन्नाथ हनुमान जी को कई बार समझने का प्रयास करते हैं, परंतु भगवान का दर्शन करने से वे स्वयं को रोक नहीं पाते थे। तब भगवान जगन्नाथ जी हनुमान जी को नगर में आने से रोकने के लिए समुद्र किनारे उन्हें बेड़ियों से बांध दिया। साथ ही उन्हें वहीं समुद्र किनारे रहकर मंदिर की सुरक्षा करने के लिए कहा। तब से हनुमान जी का मंदिर उसी समुद्र किनारे बना हुआ है और हनुमान जी वहां बंधे हुए हैं। माना जाता है कि इससे मंदिर में लहरों का आना बंद हो गया और मंदिर सुरक्षित रह गया। 
बेड़ी हनुमान मंदिर 

जगन्नाथ मंदिर में हुए हमले

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के चमत्कारों और रहस्यों से तो सभी सुपरिचित हैं। परंतु हम में से बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मंदिर पर कई बड़े हमले भी हुए हैं। इसके बावजूद इस बांध दिया मंदिर के प्रति समर्पण भक्त और राजाओं ने अपने प्राणों से खेल कर इस मंदिर का रक्षा किया और इस मंदिर के अस्तित्व को कुछ नहीं होने दिया। साथ ही मंदिर के चमत्कारों पर भी कोई असर नहीं होने दिया।
         इतिहासकारों के अनुसार, हमलों के कारण भगवान जगन्नाथ जी को 144 वर्षों तक मंदिर से दूर रहना पड़ा। 

           जगन्नाथ मंदिर पर हुए प्रमुख हमले 

पहला हमला - जगन्नाथ मंदिर को नष्ट करने के लिए बंगाल के सुल्तान इलियास शाह ने वर्ष 1340 में पहला हमला किया था। उस समय उड़ीसा को उत्कल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। उस समय उत्कल साम्राज्य के राजा नरसिंह देव तृतीय थे। उन्होंने मंदिर की रक्षा के लिए इलियास शाह से युद्ध किया था। इलियास शाह के सैनिकों ने मंदिर के परिसर में निर्दोष लोगों को मार कर बहुत खून बहाया। उस समय राजा नरसिंह देव ने मूर्तियों को छुपाने का आदेश दिया और भगवान जगन्नाथ जी के
मूर्तियों को सफलता पूर्वक बचा लिया। 

दूसरा हमला - 20 वर्ष बाद वर्ष 1360 में दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुग़लक़ ने जगन्नाथ मंदिर पर दूसरा हमला किया। 

तीसरा हमला - जगन्नाथ मंदिर पर तीसरा हमला वर्ष 1509 में बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह के कमांडर इस्माइल गाज़ी ने किया। उस समय सूर्यवंशी प्रताप रुद्रदेव का उड़ीसा पर शासन था। मंदिर के पुजारियों को हमले का खबर मिलते ही उन्होंने मूर्तियों को मंदिर से दूर बंगाल की खाड़ी में मौजूद चिल्का लेक नामक द्वीप पर छुपा दिया और प्रताप रुद्रदेव हुगली में आक्रमणकारियों की सेनाओं को हराकर भागने पर विवश कर देते हैं। 

चौथा हमला - वर्ष 1568 में काला पहाड़ नामक एक अफगान आक्रमणकारी जगन्नाथ मंदिर पर सबसे बड़ा हमला करता है। हमले से पहले ही एक बार फिर से पुजारियों द्वारा मूर्तियों को चिल्का लेक नामक द्वीप पर छुपा दिया जाता है। परंतु फिर भी आक्रमणकारी मंदिर के कुछ मूर्तियों को जलाकर नष्ट कर देते हैं। इस हमले में मंदिर के वास्तुकला को काफी नुकसान पहुंचता है। इस युद्ध के बाद उड़ीसा इस्लामिक शासन के अधीन आ जाता है।

पांचवा हमला - वर्ष 1592 में उड़ीसा के सुल्तान ईशा के बेटे उस्मान और कुथू खान के बेटे सुलेमान जगन्नाथ मंदिर पर पांचवा हमला करते हैं। इस युद्ध में लोगों को बेरहमी से मार कर मूर्तियों को अपवित्र किया जाता है और मंदिर की संपत्ति को लूट लिया जाता है। 

छठा हमला - वर्ष 1601 में बंगाल का नवाब इस्लाम खान का कमांडर मिर्ज़ा खुर्रम जगन्नाथ मंदिर पर छठा हमला करता है। इस युद्ध से मंदिर के पुजारी मूर्तियों को बचाने के लिए भार्गवी नदी के रास्ते से नाव के द्वारा पुरी के पास एक गांव कपिलेश्वर में छुपा देते हैं। वे मूर्तियों को बचाने के लिए उन्हें दूसरी जगह भी स्थानांतरित करते हैं।

सातवां हमला - जगन्नाथ मंदिर पर सातवां हमला उड़ीसा का सूबेदार हाशिम खान करता है। परंतु हमले से पहले ही मूर्तियों को खुर्दा के गोपाल मंदिर में छुपा लिया जाता है। इस हमले में भी मंदिर को काफी नुकसान पहुंचाया जाता है। वर्ष 1608 में जगन्नाथ मंदिर में दोबारा मूर्तियों को वापस लाया जाता है।

आठवां हमला - मंदिर पर आठवां हमला हाशिम खान की सेना में काम करने वाला एक हिंदू जागीरदार करता है। उस समय सौभाग्य से मंदिर में मूर्तियां मौजूद नहीं थी। इस हमले में मंदिर का धन लूट लिया जाता है और उसे एक किले में बदल दिया जाता है। 

नौंवा हमला -  मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल राजा टोडरमल का बेटा राजा कल्याणमल वर्ष 1611 में मंदिर पर नौंवा हमला करता है। इस बार भी पुजारियों द्वारा मूर्तियों को बंगाल की खाड़ी में मौजूद एक द्वीप में छुपा दिया जाता है‌।

दसवां हमला - दसवां हमला भी कल्याणमल ही करता है और हमले में मंदिर को बुरी तरह से लूट लेता है। 

ग्यारहवां हमला - दिल्ली का बादशाह जहांगीर का सेनापति मुकर्रम खान वर्ष 1617 में मंदिर पर 11वां हमला करता है। उस समय मंदिर के मूर्तियों की रक्षा के लिए उन्हें गोबापदार नामक जगह पर छुपा लिया जाता है।

बारहवां हमला - उड़ीसा का मुगल गवर्नर मिर्ज़ा अहमद बेग 1621 में मंदिर पर 12वां हमला करता है। उस समय मुगल बादशाह शाहजहां एक बार उड़ीसा का दौरा करता है। इस बार भी पुजारियों द्वारा मूर्तियों को छुपा लिया जाता है।

तेरहवां हमला - जगन्नाथ मंदिर पर तेरहवां हमला वर्ष 1641 में मुगल गवर्नर मिर्ज़ा मक्की द्वारा किया जाता है।

चौदहवां हमला - मिर्ज़ा मक्की ही जगन्नाथ मंदिर पर 14वां हमला भी करता है और कई निर्दोष लोगों को मारता है।
 
पन्द्रहवां हमला - मंदिर पर 15वां हमला आमिर फतेह खान करता है और मंदिर के रत्नभंडार में मौजूद हीरे, मोती और सोने जैसी अपार संपत्ति को लूटता है। 

सोलहवां हमला - मंदिर पर सोलहवां हमला मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश पर वर्ष 1692 में होता है। औरंगजेब मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त करने का आदेश देता है। उस समय उड़ीसा का नवाब इकरम खान मुगलों के अधीन था। इकरम खान मंदिर पर हमला कर भगवान का सोने का मुकुट लूट लेता है। उस समय मूर्तियों को श्री मंदिर नामक एक जगह के बिमला मंदिर में छुपाया जाता है।

17 वां हमला - मुहम्मद तकी खान वर्ष 1699 में मंदिर पर 17 वां और आखिरी हमला करता है। वह 1727 से 1734 तक उड़ीसा का नायब सूबेदार रहता है। इस बार भी मंदिर के पुजारियों को संदेह होने पर वे मूर्तियों को छुपा लेते हैं और लगातार अन्य जगहों पर स्थानांतरित करते रहते हैं। कुछ समय के लिए मूर्तियों को हैदराबाद में भी छुपाया जाता है।

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