रविवार, 22 फ़रवरी 2026

प्रेमानंद महाराज : एक ऐसा संत जिनकी दोनों किडनियां है खराब,

 संत वही जो भक्तों के जीवन में प्रकाश भरकर उनके जीवन को उज्ज्वल बनाएं और जिन्हें देखकर लोगों को कष्टों में भी संयम से लड़ने का शक्ति मिले।

          हमारे भारत देश में अनेक संत हैं। यहां जिस संत की बात हो रही है। वे हमारे देश के प्रसिद्ध संत और आध्यात्मिक गुरु हैं। ऊपर वर्णित सभी बातें उन पर सटीक बैठती है। वे वृंदावन की पावन भूमि से श्री कृष्ण भक्ति, साधना और सरल जीवन जीने का संदेश देते हैं। वे संत हैं प्रेमानंद महाराज जी।

जीवन परिचय

          प्रेमानंद महाराज जी का जन्म 30 मार्च 1969 अखरी गांव, कानपुर जिला, उत्तर प्रदेश में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका जन्म का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडेय था। उनके पिता का नाम श्री शंभूनाथ पांडेय और माता का नाम रमा देवी था और वे दोनों बहुत ही धार्मिक विचारों वाले थे। उनके परिवार में वातावरण ही ऐसा होता था कि उनके यहां साधु-संतों और सत्संगों का आगमन सदैव रहता था। उनके दादा जी एक सन्यासी थे और बाद में उनके पिताजी भी एक सन्यासी बन जाते हैं। इसी कारण से ही नन्हें अनिरुद्ध में भी बचपन से ही ईश्वर के पति अत्यंत ही भक्ति होती है। वे बचपन से ही अन्य बच्चों से बिल्कुल भिन्न थे। वे सदैव एकांत में ही रहना पसंद करते थे। जहां उनके आयु के बच्चों का ध्यान खेलकूद में होता था, वहीं उनका रुचि भक्ति गीतों, शास्त्र पाठन और ध्यान में होता था। वे नन्हे से आयु में ही कई सारे धार्मिक पुराणों का अध्ययन करने लगते हैं। उनके घर में जब कभी भजन कीर्तन होता, तो वे पूरे मन से हनुमान चालीसा, सुंदरकांड और श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी जैसे भजन बहुत ही अच्छे तरीके से गाया करते थे। 

          उनके मन में बचपन में एक विचार आता है क्या माता-पिता का प्रेम सदा ही रहेगा, एक दिन तो वे भी चले जाएंगे तब मेरा इस संसार में कौन होगा। धीरे-धीरे उनके मन में उत्तर स्पष्ट हो जाता है कि उनका तो केवल ईश्वर ही है। अपने इसी विचार से वे 13 वर्ष के होने पर एक बहुत बड़ा निर्णय लेते हैं। वे घर छोड़कर ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चलने का निश्चय करते हैं। वे इसके विषय में सबसे पहले अपने मां को बताते हैं। इस पर उनके मां उन्हें कहते हैं कि ईश्वर प्राप्ति के लिए घर से भागा थोड़ी जाता है, यदि ईश्वर प्राप्त करना है, तो भजन करो। इस पर नन्हे अनिरुद्ध उन्हें कहते हैं कि उनका मन उन्हें एक संन्यासी बनने को कह रहा है। उस समय उनकी मां को लगता है कि इसने किसी बाबा का सत्संग सुन लिया होगा इसलिए इसके मन में ऐसे विचार आ रहे हैं। इसके बाद उनकी मां घर के कार्यों में व्यस्त हो जाती है। परंतु दृढ़ इच्छा लिए नन्हे अनिरुद्ध अगले ही सुबह 3:00 बजे के आस-पास जब उनके माता-पिता गहरी नींद में होते हैं उन्हें प्रणाम करके घर से निकल जाते हैं। अपने घर से निकलते समय वे एक संन्यासी जीवन की मूलभूत आवश्यकता वाली चीज़ें एक गीता, दूसरा कुशा का आसान, तीसरा पीतल का लोटा और चौथा चादर ले जाते हैं। वे अपने साथ कोई भी खाने-पीने का समान, पैसे और अतिरिक्त कपड़े नहीं हैं। वे अंधेरे में चलते हुए बहुत दूर तक निकल जाते हैं। सुबह होने तक वे एक शिव मंदिर में पहुंच जाते हैं। मंदिर पहुंचकर वे कई घंटों तक वहीं भूखे प्यासे बैठे रहते हैं। जब थोड़ा समय बीतता है, तो उन्हें थोड़े समय के लिए अपने घर का विचार आता है। घर में तो उनकी माता उन्हें प्रेम पूर्वक खाना खिला देती था, परंतु यहां उन्हें खिलाने के लिए कोई नहीं था। वे थोड़े समय के लिए सोचते हैं कि आगे क्या होगा? परंतु वे स्वयं  से कहते हैं कि चाहे मृत्यु आ जाए, तो भी घर नहीं जाऊंगा और ईश्वर प्राप्त करके ही रहूंगा। वे शिवलिंग के सामने ध्यान में मगन हो जाते हैं‌। तभी एक व्यक्ति उन्हें आवाज देकर उनका ध्यान तोड़ता है। वे उस व्यक्ति को दरवाजे के सामने खड़े देखते हैं। वह व्यक्ति उनसे पूछते हैं कि वहां एक सूरदास जी रहते हैं, क्या उन्होंने उसे कहीं देखा है। नन्हे अनिरुद्ध उन्हें उत्तर देते हैं कि उन्हें नहीं पता और वे अभी-अभी वहां आए हैं। वह व्यक्ति उनसे कहता है कि वह स्वामी जी के लिए दही लाया है, वे यहां नहीं है तो आप ही पी लीजिए। ऐसा कहते हुए वह व्यक्ति दही का बर्तन नन्हे अनिरुद्ध के हाथों में थमा देते हैं। नन्हे अनिरुद्ध दही पी लेते हैं। इससे उनका भूख मिट जाता है। साथ ही हृदय और आत्मा भी भर जाता है। वे सोचते हैं कि उन्होंने किसी से कुछ भी नहीं मांगा था फिर जब उनका शरीर भूख से टूट रहा था, तब उन्हें दही कैसे मिल गया। वे समझ जाते हैं कि वह अवश्य ही भगवान शिव का संकेत है और उनके हर कदम पर भगवान शिव है। दूसरी ओर जब नन्हे अनिरुद्ध के माता-पिता को पता चलता है कि उनका पुत्र भाग गया है, तो वे चिंतित हो जाते हैं। उनके माता-पिता उन्हें तीन दिन तक तलाश करते रहें, तब उन्हें कोई बताता है कि एक गोरा सा लड़का वहां मंदिर में बैठा है। उनके माता-पिता और भाई वहां तुरंत ही जाते हैं। जैसे ही नन्हे अनिरुद्ध उन्हें देखते हैं उन्हें भय लगने लगता है। वे पिता के सख्ती और डांट से बहुत डरते थे। उनके पिता उन्हें उठने के लिए कहते हैं परंतु अनिरुद्ध चुपचाप वहीं बैठे रहते हैं। जब उनके पिता उन्हें दूसरी और तीसरी बार कठोरता से उन्हें उठने के लिए कहते हैं, तो वे उन्हें दृढ़ता से उत्तर देते हैं कि उनका जीवन अब ईश्वर के नाम है, चाहे जो हो जाए अब वे घर नहीं जाएंगे। उनकी ये बातें सुनकर पिता भावुक हो जाते हैं। उनके पिता उन्हें भावुक होकर उन्हें गले लगाते हैं और तीन बार राम का नाम लेते हैं। वे अपने पुत्र को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं जाओ पुत्र यदि तुम ऊष्ण भूमि पर भी बैठोगे, तो वहां फूलों की वर्षा होगी, संसार का कोई भी शक्ति तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर पाएगी। साथ ही वे किसी की बेटी या स्त्री को कुदृष्टि से देखने के लिए भी उन्हें माना करते हैं। नन्हे अनिरुद्ध अपने पिता से कहते हैं कि वे जीवन भर ब ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे और कभी भी किसी को कुदृष्टि से नहीं देखेंगे। उस दिन से वे कभी भी अपने परिवार से नहीं मिलते हैं। उनके पिता का आशीर्वाद उन्हें आज भी संभाला हुआ है।
            इसके बाद नन्हे अनिरुद्ध का उद्देश्य केवल और केवल ईश्वर प्राप्ति होता है। इसी उद्देश्य से वे भगवान शिव की नगरी काशी की ओर प्रस्थान करते हैं। काशी पहुंच कर वे सर्वप्रथम नैष्टिक ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं। इससे उन्हें आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी का नाम मिलता है। बाद में उन्हें पूर्ण सन्यास होने के बाद स्वामी आनंद आश्रम का उपाधि मिलता है। वे काशी के तुलसी घाट में ही अपना तपस्थल बनाते हैं। तुलसी घाट में स्थित एक प्राचीन पीपल वृक्ष के नीचे वे निवास करने लगते हैं‌। वे वहीं अपनी गहरी साधना करते। रात के समय वे इसी वृक्ष के नीचे सोया करते और सर्दियों के समय वे गेहूं की पुरानी बोरियों को ओढ़ कर सोते। किसी भी परिस्थिति में यही उनका आश्रम होता था। उस समय उनका दिनचर्या बहुत ही सख्त और अनुशासित होता था। वे रात के 2:00 बजे उठ जाते थे और पहला गंगा स्नान वे सुबह 3:00 बजे, दूसरा दोपहर 12:00 बजे और तीसरा शाम 6:00 बजे करते थे। कैसी भी परिस्थिति हो चाहे कड़ाके की ठंड , तपती गर्मी या मूसलाधार वर्षा वे कभी भी गंगा स्नान करना नहीं छोड़ते थे। उनका यही नियम होता था। स्नान के बाद वे तुलसी घाट वापस आकर अपना आसन लगाकर गहरा ध्यान में लग जाते थे। दोपहर के स्नान के बाद वे भिक्षा के लिए निकला करते थे। भिक्षा के लिए भी वे भिखारियों की पंक्तियों में 10-15 मिनट बैठकर प्रतीक्षा करते। यदि उस दौरान उन्हें कुछ मिल जाता, तो वे उसे स्वीकार कर लेते और यदि उन्हें कुछ नहीं मिलता, तो ईश्वर का ध्यान कर गंगाजल पीकर उठ जाते थे।
           रोज की तरह एक दिन प्रेमानंद महाराज जी बैठे हुए थे। तभी उनके मन में वृंदावन का विचार आता है। वे सोचते हैं कि वृंदावन का नाम तो बहुत सुना है पर कभी गए नहीं, उसकी महिमा कैसी होगी। फिर वे वहां से उठकर रोज की तरह भिक्षा मांगने चले जाते हैं। फिर वहां से तुलसीघाट जाकर बैठ जाते हैं। तभी वहां एक संत आकर उनसे कहता है कि काशी में एक धार्मिक अनुष्ठान हो रहा है जिसमें दिन में श्री चैतन्य लीला और रात में रासलीला का आयोजन होगा। वह संत अपने साथ उन्हें चलने के लिए कहता है। महाराज जी ने कभी भी रासलीला नहीं देखी थी, परंतु उन्होंने अपने गांव का रामलीला देखा था। उन्हें लगता है कि रासलीला भी रामलीला जैसे ही होगा। महाराज जी हमेशा अकेले में ही रहते थे। इसलिए वे उनसे कहते हैं कि उन्हें आवश्यकता नहीं है। वह संत उनसे कहता है कि वृंदावन से कलाकार आए हैं मेरे साथ एक बार चलिए। वृंदावन का नाम सुनते ही महाराज जी को लगता है कि शायद भोलेनाथ जी की कोई कृपा है और उस संत के साथ रासलीला देखने के लिए चले जाते हैं। जब प्रेमानंद महाराज जी दिन के समय चैतन्य लीला देखते हैं तो उन्हें बहुत ही आनंद मिलता है और बाबाजी को शाम के रासलीला के विषय में कहने की आवश्यकता भी नहीं होती है। महाराज जी रासलीला शुरू होने से पहले ही वहां पहुंच जाते हैं। श्री चैतन्य लीला और श्री रासलीला से प्रभावित होकर वे इसे ही अपना नियम 1 महीने के लिए बना लेते हैं। इस आनंद में उन्हें एक महीना कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता है। एक महीना बीत जाने पर जब सभी कलाकार वृंदावन जाने लगते हैं, तो उन्हें आभास होता है कि सभी कलाकार जा रहे हैं, अब उनका क्या होगा और वे बहुत ही दुखी हो जाते हैं। वे भीतर से वृंदावन जाने का मन बना लेते हैं। वे सोचते हैं कि यदि वे वृंदावन चले जाएं, तो उन्हें रोज रासलीला देखने को मिलेगा। इस भाव से महाराज जी टीम संचालक के पास पहुंचते हैं। वे बड़े ही विनम्र भाव से उनसे स्वयं को वृंदावन ले जाने के लिए कहते हैं। संचालक उनसे कहते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता है। परंतु महाराज जी उनसे कहते हैं कि उन्हें केवल रासलीला देखना है। इस पर संचालक उन्हें कहते हैं कि अगर ऐसा है, तो वे एक बार वृंदावन आ जाए फिर बिहार जी उन्हें नहीं छोड़ेंगे। यही एक वाक्य प्रेमानंद महाराज जी का जीवन बदल देते हैं। वे इसी को अपना गुरु मंत्र मान लेते हैं। इसके बाद तो उनके मन में केवल एक ही विचार था कि उन्हें वृंदावन जाना है। उन्हें ऐसा आभास होने लगता है कि उनके आत्मा का घर वृंदावन ही है जहां श्रीकृष्ण का प्रेम रस सदा ही प्रवाहित होता रहता है। यह ईश्वर की कृपा थी जो महाराज जी कभी एकांत में रहना पसंद करते थे अब वे वृंदावन जाने के इच्छुक बन गए थे। पूरे 1 महीने का श्रीकृष्णा लीला का आनंद लेने के बाद रोज की तरह अपने नियम अनुसार गंगा जी में स्नान कर रोज की तरह तुलसी घाट में ध्यान करने लगते हैं और साथ ही भिक्षा के लिए भी जाते हैं। परंतु अपने इस नियम में वे सदैव वृंदावन के विषय में सोचते रहते हैं।
         एक बार वे सुबह गंगा स्नान कर रोज की तरह तुलसी घाट में बैठे थे तभी पास के ही हनुमान मंदिर से युगल किशोर जी उनके लिए प्रसाद लेकर आते हैं। प्रेमानंद महाराज जी एकांतवासी थे उनका किसी से कोई परिचय नहीं था। उन्हें प्रसाद मिलने पर वे इसे अनुचित समझते हैं। जब महाराज जी प्रसाद लेने से उन्हें मना करते हैं, तो युगल किशोर जी उन्हें उत्तर देते हैं कि उनके मन में विचार आया कि संकट मोचन जी का प्रसाद उन्हें ही देना है। महाराज जी को युगल किशोर जी का विनम्र व्यवहार बहुत प्रभावित करता है और वे वह प्रसाद ले लेते हैं। महाराज जी के प्रसाद ग्रहण करने के बाद युगल किशोर जी उन्हें अपनी कुटिया में चलने के लिए कहते हैं। महाराज जी उन्हें कहते हैं कि उनके नियमानुसार वे किसी गृहस्थ के घर नहीं जाते हैं। तब युगल किशोर जी उन्हें कहते हैं कि वह कोई गृहस्थ नहीं है वह भी एक सन्यासी ही है। उनके प्रेम पूर्वक बोलने पर महाराज जी उनके कुटिया में चले जाते हैं। वह स्वयं अपने हाथों से महाराज जी को भोजन बनाकर खिलाते हैं। यहां भी वे वृंदावन के विषय में ही विचार करते रहते हैं कि उन्हें वृंदावन जाना है। महाराज जी युगल किशोर जी को अपने वृंदावन जाने के विषय में पूछते हैं कि क्या वह उन्हें वृंदावन पहुंचा सकते हैं। वह उत्तर देते हैं कि हां बाबा जरूर पहुंचा सकता हूं, आपको कब जाना है। महाराज जी कहते हैं कि हम तो तैयार ही बैठे हैं जब आप व्यवस्था कर दो। युगल किशोर जी उन्हें कहते हैं कि ठीक है कल ही आपको वृंदावन ले चलूंगा। इतना सुनते ही महाराज जी आनंद से भर जाते हैं। उस समय कोई भी ट्रेन सीधे बनारस से मथुरा के लिए नहीं जाती थी। इसलिए महाराज जी पहले युगल किशोर जी के साथ चित्रकूट आ जाते हैं। यहां वे दोनों तीन-चार दिन ठहरते हैं फिर चित्रकूट से युगल किशोर जी महाराज जी को मथुरा जाने वाली रेलगाड़ी में बैठा देते हैं‌‌। रेलगाड़ी में यात्रा के दौरान महाराज जी का दो लोगों से परिचय होता है जो महाराज जी के विचारों से प्रभावित होकर उन्हें कुछ पैसे देने लगते हैं, परंतु वे पैसे लेने से मना कर देते हैं। वे दोनों व्यक्ति उन्हें कहते हैं कि वे उनके साथ चले और उस रात उनके साथ ठहर कर अगले दिन वृंदावन चले जाएं। महाराज की सरल स्वभाव वाले होने के तुरंत मान जाते हैं। वे दोनों व्यक्ति मथुरा में राधेश्याम गेस्ट हाउस के बाहर उन्हें बिठाकर कहते हैं कि वे दोनों अंदर जाकर उन्हें थोड़ी देर में बुलाएंगे। उस समय ठंड और रात का समय था। महाराज जी वहीं बैठकर उनके बुलावे का प्रतीक्षा करते रहते हैं, परंतु बहुत समय बीत जाने पर भी उन्हें कोई बुलाने नहीं आता है। रात के समय एक व्यक्ति उनके पास आता है और उन्हें जय श्रीकृष्णा कहकर उनके वहां बैठने के विषय में पूछता है। महाराज जी अपनी पूरी कहानी उस व्यक्ति को बताते हैं। वह व्यक्ति उन्हें अपने घर ले जाकर उन्हें भोजन करवाते हैं और उन्हें विश्राम भी करवाते हैं। अगले सुबह होते ही एकादशी के दिन महाराज जी यमुना नदी पहुंचते हैं। वे यमुना नदी में स्नान कर द्वारकाधीश का दर्शन करने पहुंच जाते हैं। उनके दर्शन करते ही उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे जो चाहते थे उन्हें मिल गया हो। वे द्वारकाधीश को देख रोने लगते हैं और उन्हें ऐसा लगता है जैसे उनका अब तक का जीवन व्यर्थ हो गया हो, उनका पूरा जीवन भागदौड़ में बीत गया, आखिर मंजिल मिल ही गया। उन्हें इस बात का आभास भी नहीं होता है कि उन्हें कौन-कौन से लोग देख रहे हैं, आसपास के सभी लोग चर्चा करने लगते हैं कि अरे बाबा जी को देखो कैसे ईश्वर की याद में रो रहे हैं। देखते ही देखते उनके चारों ओर भीड़ उमड़ने लगता है। कोई उन्हें फूलों की माला पहनने लगता है तो कोई उनके चरण स्पर्श करने लगता है। तभी एक दर्शनार्थी उनसे कहता है कि वह उनकी सेवा करना चाहता है और उन्हें आदेश दें। महाराज जी की तो केवल एक ही इच्छा थी वृंदावन जाना। वे कहते हैं कि उन्हें वृंदावन पहुंचा दो। वह भक्त साधन का व्यवस्था करके महाराज जी को वृंदावन के लिए रवाना कर देता है। गाड़ी वाला उन्हें वृंदावन के रमन नीति पर उतार देता है। महाराज जी स्वयं को सौभाग्य मानकर कहते हैं कि उनका वृंदावन में एकादशी के दिन प्रवेश हुआ। वे देखते हैं कि वहां रमण नीति में परिक्रमा मार्ग में बहुत से भक्त परिक्रमा कर रहे थे। यहां सब कुछ महाराज जी के लिए नया था। परिक्रमा के भीड़ को देखकर उन्हें लगता है कि यहां ऐसा ही होता होगा। वे उस दिन रमन नीति का भ्रमण करते हैं। इस दौरान वे संत श्री श्याम सखा जी से मिलते हैं। महाराज जी उनसे निवेदन करते हैं कि वे बनारस से आए हैं और बिहारी जी के दर्शन करना चाहते हैं। उन्हें यदि कुछ दिन रहने की व्यवस्था मिल जाए, तो बड़ी कृपा होगी। वे इस तरह से वृंदावन भ्रमण का आनंद लेते हैं।
            महाराज जी का स्वभाव एकांतवास में रहने का था। कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि यहां के भीड़ से उनका एकांतवास प्रभावित हो रहा है। इसलिए महाराज जी पुनः बनारस लौटने का निर्णय लेते हैं और वे वापस बनारस लौट आते हैं। वृंदावन से बनारस की यात्रा के दौरान उन्हें एक अजीब बेचैनी होती है। बनारस पहुंचकर वे अपने पुराने नियम अनुसार ही रोज गंगा स्नान कर भिक्षा मांगने जाते और वापस तुलसी घाट में एकांतवास में ही रहते। परंतु उनके भीतर वृंदावन से दूर होने की बेचैनी समाप्त नहीं होती है। वे यह बात शीघ्र ही समझ जाते हैं। इसलिए वे शीघ्र ही वृंदावन वापस आ जाते हैं और वहीं रमन नीति आश्रम में रहने लगते हैं। तभी उनके भीतर की बेचैनी समाप्त होती है। तब से लेकर आज तक महाराज जी वृंदावन में रह रहे हैं और अपने लाडले जी की सेवा कर रहे हैं। इस दौरान वे वृंदावन में कई आश्रमों की परिक्रमा करते हैं। उनका यहां नियम होता है वृंदावन का परिक्रमा करना और बांके बिहारी जी का सेवा करना। एक बार महाराज जी परिक्रमा कर रहे थे तभी वे एक सखी को एक पद का गायन करते देखे हैं। वे ध्यान पूर्वक उस सखी के गायन को सुनने लगते हैं। जब उसका गायन समाप्त होता है, तो वे उससे गायन का अर्थ पूछते हैं। सखी उनसे कहती है कि यदि उन्हें उस गायन का भाव जानना है, तो उन्हें श्री राधा वल्लभ संप्रदाय से जुड़ना होगा। इसके पश्चात् वे श्री राधावल्लभ संप्रदाय चले जाते हैं। वहां वे श्री मोहित गोस्वामी जी से मिलते हैं। श्री मोहित गोस्वामी जी महाराज जी के गुरु भी थे। वे महाराज जी को श्री राधावल्लभ संप्रदाय की दीक्षा देते हैं और मंत्र भी सिखाते हैं। कुछ समय बाद महाराज जी को अपने वर्तमान गुरु श्री हित गोविंद शरण जी का सानिध्य प्राप्त होता है। श्री हित गोविंद शरण जी महाराज सहचारी भाव में रहने वाले संतों में से एक थे। अपने सहचारी गुरु के सानिध्य में रहकर और वृंदावन धाम की अपार महिमा के कारण महाराज जी शीघ्र ही बिहारी जी और राधा रानी के श्री चरणों में श्रद्धा विकसित करते हुए सहचारी भाव में लीन रहने लगते हैं। आज महाराज जी हम सभी भक्तों को राधा जी के विषय में बताते हैं।

उनकी दोनों किडनियां है खराब

महाराज जी अपने एक सत्संग के दौरान बताते हैं कि जब वे 35 वर्ष के हुए उस समय उनके पेट में बहुत ज्यादा पीड़ा बढ़ गया था। इस कारण जब वे 'रामकृष्ण मिशन' में जांच कराने गए, तो डॉक्टर उन्हें बताते हैं कि उनकी आधे से ज्यादा किडनी खराब हो चुकी है और उन्हें 'Polycystic Kidney Disease' नामक बीमारी है। इस बीमारी में किडनी में असंख्य की संख्या में गांठे बनने लगती है और किडनी फटने का भी खतरा रहता है। यह रोग जींस से आता है यानी अपनी पीढ़ियों से। साथ ही डॉक्टर उन्हें यह भी कहते हैं कि उनके पास केवल 4 वर्ष तक का समय ही है और इसके बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। उस समय महाराज जी को ऐसा लगता है कि वे कभी भी मर सकते हैं। इसलिए वे राधा वल्लभ के फोटो को चुनरी से अपने छाती में बांधकर रोज सोने लगते हैं। उन्हें राधा वल्लभ जी की ऐसी कृपा होती है कि दो दशक बीत जाने के बाद भी वे आज भी जीवित हैं‌। आज महाराज जी के हजारों की संख्या में भक्त हैं जो उन्हें अपनी किडनी देना चाहते हैं, महाराज जी कहते हैं कि वे उन्हें कष्ट देकर स्वयं क्यों सुखी रहें, शरीर जितने दिन चलता है, चलना है उनका जीवन समाज के कल्याण के लिए है।
            प्रेमानंद महाराज जी का जीवन आज उनके हजारों भक्तों को प्रेरणा देती है। उनसे मिलने के लिए छोटे से लेकर बड़े सभी लोग उनके पास जाते हैं और अपनी समस्याओं के विषय में उनसे पूछते हैं। महाराज जी सभी को उनके प्रश्नों का संतुष्ट पूर्वक उत्तर देते हैं।

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